मात्र 82.12 रुपये प्रति लीटर वाले इस सस्ते तेल की हकीकत, सामान्य इंजनों में भरवाने पर पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी आपकी कार या बाइक

देश के भीतर लगातार बढ़ती जा रही पेट्रोल और डीजल की कीमतों से परेशान आम उपभोक्ताओं और वाहन चालकों के लिए

Jun 8, 2026 - 15:38
Jun 8, 2026 - 16:21
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मात्र 82.12 रुपये प्रति लीटर वाले इस सस्ते तेल की हकीकत, सामान्य इंजनों में भरवाने पर पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी आपकी कार या बाइक
मात्र 82.12 रुपये प्रति लीटर वाले इस सस्ते तेल की हकीकत, सामान्य इंजनों में भरवाने पर पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी आपकी कार या बाइक
  • पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के बीच बेहद सस्ता विकल्प बनकर उभरा E85 ईंधन, लेकिन हर वाहन के लिए नहीं है यह वरदान
  • भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में फिलहाल मौजूद हैं सिर्फ तीन विशेष दोपहिया वाहन, फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक के बिना अधूरा है यह सपना

देश के भीतर लगातार बढ़ती जा रही पेट्रोल और डीजल की कीमतों से परेशान आम उपभोक्ताओं और वाहन चालकों के लिए वैकल्पिक ईंधनों को लेकर एक बेहद आकर्षक खबर इन दिनों चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई है। बाजार में पारंपरिक ईंधन के मुकाबले लगभग बीस रुपये प्रति लीटर सस्ता एक नया विकल्प मौजूद है, जिसे तकनीकी भाषा में E85 फ्यूल कहा जा रहा है। वर्तमान समय में जहां सामान्य पेट्रोल की कीमतें देश के विभिन्न हिस्सों में सौ रुपये के आंकड़े को पार कर चुकी हैं, वहीं यह विशेष ईंधन मात्र 82.12 रुपये प्रति लीटर की बेहद किफायती दर पर उपलब्ध है। इस भारी अंतर को देखकर स्वाभाविक रूप से हर कोई अपनी कार या मोटरसाइकिल में इस सस्ते तेल को भरवाने के लिए उत्सुक नजर आ रहा है। हालांकि, इस लुभावनी कीमत के पीछे एक बहुत बड़ा तकनीकी पेंच छिपा हुआ है, जिसे समझे बिना यदि किसी ने अपने वाहन में यह ईंधन डलवाया, तो उसे फायदे की जगह बहुत बड़े वित्तीय और यांत्रिक नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

इस पूरे विषय की तकनीकी गहराई को समझना प्रत्येक वाहन मालिक के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि E85 कोई साधारण या नियमित ईंधन नहीं है। यह असल में पचासी प्रतिशत एथिल अल्कोहल यानी एथेनॉल और मात्र पंद्रह प्रतिशत पारंपरिक गैसोलीन यानी पेट्रोल का एक बेहद जटिल मिश्रण होता है। एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने के रस, मक्के और अन्य कृषि जनित अपशिष्टों से तैयार किया जाने वाला एक जैव-ईंधन (बायो-फ्यूल) है, जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ काफी सस्ता भी पड़ता है। चूंकि इसमें एथेनॉल की मात्रा बहुत अधिक होती है, इसलिए इसकी रासायनिक और दहन प्रवृत्तियां सामान्य पेट्रोल से बिल्कुल भिन्न होती हैं। यही कारण है कि भारत की सड़कों पर दौड़ने वाले नब्बे प्रतिशत से अधिक पारंपरिक वाहन इस अत्यधिक गाढ़े और अलग प्रकृति के ईंधन को पचाने या इसका सही ढंग से उपभोग करने के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह अक्षम हैं।

यदि कोई वाहन चालक इस सस्ते तेल के लालच में आकर इसे अपनी सामान्य कार या मोटरसाइकिल के ईंधन टैंक में भरवा लेता है, तो उसके वाहन का पूरा इंजन तंत्र चंद दिनों के भीतर ही पूरी तरह से कबाड़ में तब्दील हो सकता है। सामान्य वाहनों के ईंधन टैंक, पाइपलाइन, फ्यूल पंप और इंजन के आंतरिक हिस्से एल्यूमीनियम, रबर और सामान्य प्लास्टिक सामग्री से बने होते हैं। एथेनॉल की अत्यधिक उच्च मात्रा इन रबर के पाइपों और सील को बहुत तेजी से गला देती है, जिससे वाहन के भीतर ईंधन रिसाव (लीकेज) की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है जो किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इसके अलावा, एथेनॉल में नमी यानी पानी को सोखने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, जिसके कारण इंजन के आंतरिक हिस्सों और सिलेंडर वाल्व में बहुत तेजी से जंग लगने लगती है, और इंजन पूरी तरह से सीज हो जाता है। सामान्य इंजन में अत्यधिक एथेनॉल युक्त ईंधन डालने से वाहन के भीतर कंबशन यानी दहन की प्रक्रिया पूरी तरह असंतुलित हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप गाड़ी में अचानक गंभीर रूप से 'नॉकिंग' की समस्या शुरू हो जाती है, पिस्टन असंतुलित होकर टूट जाते हैं और वाहन का सबसे कीमती हिस्सा यानी इंजन ब्लॉक पूरी तरह से क्रैक हो जाता है, जिसके सुधार पर लाखों रुपये का खर्च आता है।

इस सस्ते और क्रांतिकारी ईंधन का लाभ उठाने के लिए ऑटोमोबाइल निर्माताओं को एक विशेष प्रकार की तकनीक का उपयोग करना पड़ता है, जिसे वैश्विक स्तर पर फ्लेक्स-फ्यूल (फ्लेक्सिबल फ्यूल) तकनीक कहा जाता है। फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के भीतर एक विशेष प्रकार का स्मार्ट 'फ्यूल ब्लेंड सेंसर' और एक अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ईसीयू) सॉफ्टवेयर स्थापित किया जाता है। यह आधुनिक सेंसर ईंधन टैंक में मौजूद पेट्रोल और एथेनॉल के सटीक अनुपात को खुद-ब-खुद भांप लेता है और उसी के अनुसार इंजन के भीतर जाने वाले ईंधन के छिड़काव (फ्यूल इंजेक्शन) और स्पार्क प्लग के जलने के समय (इग्निशन टाइमिंग) को स्वचालित रूप से बदल देता है। इस तकनीक से लैस गाड़ियां शून्य प्रतिशत से लेकर पचासी प्रतिशत तक के किसी भी एथेनॉल मिश्रण पर बिना किसी रुकावट के पूरी क्षमता के साथ चल सकती हैं, जबकि सामान्य गाड़ियों में यह व्यवस्था पूरी तरह नदारद होती है।

भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार की वर्तमान जमीनी हकीकत पर दृष्टि डाली जाए तो यह सच्चाई बेहद चौंकाने वाली है कि देश में बिकने वाली लाखों गाड़ियों में से वर्तमान में केवल तीन विशेष मोटरसाइकिलें ही इस E85 ईंधन पर चलने के लिए वैधानिक रूप से प्रमाणित और सक्षम हैं। इनमें देश की अग्रणी दोपहिया वाहन निर्माता कंपनियों द्वारा विकसित की गई कुछ विशिष्ट फ्लेक्स-फ्यूल मोटरसाइकिलें शामिल हैं, जिन्हें हाल ही में वैश्विक ऑटो एक्सपो और सरकारी प्रदर्शनियों के दौरान देश के सामने पेश किया गया था। इन गिने-चुने मॉडलों के अलावा वर्तमान में भारत के भीतर ऐसी कोई भी कार या आम कम्यूटर बाइक व्यावसायिक रूप से शोरूमों में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है, जो इस अत्यधिक एथेनॉल वाले ईंधन को बिना किसी यांत्रिक खराबी के झेल सके, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह सुविधा अभी आम जनता की पहुंच से काफी दूर है।

इस ईंधन के उपयोग से जुड़े कुछ अन्य व्यावहारिक और आर्थिक पहलुओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता, जो इसकी कम कीमत के आकर्षण को थोड़ा कम कर देते हैं। तकनीकी अध्ययनों से यह बात पूरी तरह प्रमाणित हो चुकी है कि एथेनॉल का ऊर्जा घनत्व (एनर्जी डेंसिटी) शुद्ध गैसोलीन या पेट्रोल के मुकाबले लगभग तीस प्रतिशत कम होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि एक लीटर E85 ईंधन जलने पर उतनी ऊर्जा पैदा नहीं कर पाता जितनी ऊर्जा एक लीटर शुद्ध पेट्रोल से मिलती है। इसके परिणामस्वरूप, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का माइलेज सामान्य पेट्रोल वाहनों की तुलना में लगभग पच्चीस से तीस प्रतिशत तक कम हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि आपकी गाड़ी पेट्रोल पर चालीस किलोमीटर का माइलेज देती है, तो इस सस्ते ईंधन पर वह बमुश्किल तीस किलोमीटर ही चल पाएगी, जिससे प्रति किलोमीटर चलने का वास्तविक आर्थिक खर्च घूम-फिरकर लगभग सामान्य पेट्रोल के बराबर ही बैठता है।

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