स्पेशल स्टोरी: मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम रूढ़ियों के चलते घुट घुट कर जीने पर मजबूर किया गया
बड़ा दुर्भाग्य रहा कि जिन महिलाओं के यश का परचम भारत ही नहीं पूरे विश्व में फहराता रहा उन प्रतिभाओं को भी इस समुदाय ने जीते जी कभी चैन से नहीं रहने दिया
स्पेशल स्टोरी..
समय के गर्त में देखा जाए तो जाने कितनी ही मुस्लिम महिलाएं जो असाधारण रूप से विलक्षण प्रतिभा की धनी थी उन्हें मुस्लिम रूढ़ियों के चलते घुट घुट कर जीने पर मजबूर किया गया...
मेरा अज़्म (इरादा) इतना बुलंद है
कि पराए शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल( फूलों से निकली आग/तेज) से है
ये कहीं चमन (बाग़ीचा) को जला न दे ..
बड़ा दुर्भाग्य रहा कि जिन महिलाओं के यश का परचम भारत ही नहीं पूरे विश्व में फहराता रहा उन प्रतिभाओं को भी इस समुदाय ने जीते जी कभी चैन से नहीं रहने दिया... मैं बात कर रही हूं बेगम अख्तर की... मल्लिका ए तरन्नुम.. शानदार आवाज की मल्लिका जिसकी गायकी के विश्व के कोने-कोने में लोग प्रशंसक हैं ..निजी जीवन में अख्तरी नाम से प्रसिद्ध यह गायिका किस प्रकार बंदिशें में रहने को मजबूर थी यह बहुत कम लोग जानते हैं....
वे लोग जिन्होंने उसे करीब से देखा वह बताते हैं कामयाबी के शिखर छूने वाली वह महिला ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से जिसकी गायकी पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई थी..जिसकी सुरीली आवाज और गजलों से देश भर ही नहीं विश्व भर में लोग दीवाने हुए जा रहे थे .. अपनी तन्हाई से घबराकर उसने अपने पसंद के युवक से शादी की.... लेकिन वह नायाबदार जो पेशे से एक वकील था इस बात के लिए हरगिज राजी नहीं था कि उसकी बेगम सार्वजनिक मंचों पर गजल की प्रस्तुति दे... निकाह के बाद वर्षों तक बेगम अख्तर ने रियाज नहीं किया... बहुत समय बीतने पर जब उसके अंदर की गायिका बेचैन होने लगी तो उसने अपने शौहर से इस बात की इजाजत मांगी... लखनऊ की उस हवेली में जिसके बाहर कार्यक्रमों का आमंत्रण देने के लिए आयोजकों की भीड़ रहती वहां रहने वाली गायिका इन प्रतिबंधों से तड़प उठी.. अंततः शोहर ने इजाजत दी कि लखनऊ को छोड़कर वह कहीं भी प्रस्तुति दे सकती है... कलाकार ना कभी बंदिश में रह सकता है ना उस बंदिशों में बांधा जा सकता है... वह सुरीली आवाज अब लाखों करोड़ों लोगों के दिलों के सुकून का माध्यम बन चुकी थी... हौसला इकट्ठा करके बेगम अख्तर ने लखनऊ से बाहर के कार्यक्रम में जाना शुरू किया.. इस बार यश और भी परवान चढ़ा उसकी आवाज में एक दर्द था एक टीस थी.. जो सीधा लोगों के दिलों से जाकर टकराई... सब कुछ ठीक था.. लेकिन वह एक अव्यक्त पीड़ा से गुजर रही थी.. उसे अपना मनपसंद जीवन साथी मिला था... लेकिन कहीं कुछ था जो उसे अंदर ही अंदर खा रहा था.. उसने अपने आप को शराब में डुबो दिया अंततः वह डिप्रेशन का शिकार हो गई और रोगग्रस्त हुई.. एक कलाकार के लिए उसकी कला उसके जीने का माध्यम होती है... रूढ़िवादी मुस्लिम समाज की बंदिशों ने विलक्षण प्रतिभा को समय से पहले ही काल का ग्रास बना दिया...
जिन मुस्लिम आततायियों ने वर्षों तक हिंदू स्त्रियों पर अत्याचार किया उन्हीं ने अपनी बेगमों को सख्त पर्दे में रखा चाहे वे कितना भी बड़ा नाम क्यों न थी... और केवल बेगम अख्तर ही नहीं उस जमाने की अनेकों नायिकाएं और विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही मुस्लिम महिलाओं की गाथाएं अत्याचारों से भरी पड़ी है जिन्हें लिखा जाना बेहद जरूरी है... क्या मालूम आज भी कहीं कोई आवाज दम तोड़ रही हो...!!
~ भावना वरदान शर्मा
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