असम विधानसभा चुनाव 2026: मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का बड़ा दांव, सत्ता में वापसी पर 5 लाख बीघा जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने का संकल्प.

असम में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर प्रचार अभियान अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता

Mar 27, 2026 - 15:48
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असम विधानसभा चुनाव 2026: मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का बड़ा दांव, सत्ता में वापसी पर 5 लाख बीघा जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने का संकल्प.
असम विधानसभा चुनाव 2026: मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का बड़ा दांव, सत्ता में वापसी पर 5 लाख बीघा जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने का संकल्प.
  • बजाली की जनसभा में गरजी भाजपा: अतिक्रमणकारियों के खिलाफ निर्णायक जंग का ऐलान, स्वदेशी समुदायों के अधिकारों की रक्षा का दिया भरोसा
  • मिशन 2026 के लिए असम में बिछी चुनावी बिसात, सरकारी जमीन और जनसांख्यिकीय सुरक्षा को मुख्यमंत्री ने बनाया सबसे बड़ा मुद्दा

असम में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर प्रचार अभियान अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बजाली जिले में आयोजित एक विशाल जनसभा के दौरान अपनी भावी योजनाओं का खाका प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि यदि जनता एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को सेवा का अवसर देती है, तो सरकार का प्राथमिक लक्ष्य राज्य की सरकारी भूमि को अवैध कब्जेदारों से पूरी तरह मुक्त कराना होगा। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में पूर्ववर्ती सरकारों की कार्यप्रणाली और वर्तमान सरकार के सख्त रुख के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी सरकार स्वदेशी लोगों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगी। इस घोषणा को असम की राजनीति में एक मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है, जो सीधे तौर पर मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल का लेखा-जोखा पेश करते हुए बताया कि उनकी सरकार ने अब तक लगभग 1.5 लाख बीघा सरकारी जमीन को अतिक्रमणकारियों के चंगुल से छुड़ाया है। उन्होंने इस उपलब्धि को केवल एक शुरुआत बताया और अगले पांच वर्षों के लिए एक बहुत बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया। हिमंता बिस्वा सरमा ने घोषणा की कि आगामी कार्यकाल में 5 लाख बीघा अतिरिक्त सरकारी भूमि को खाली कराया जाएगा। इस बड़े आंकड़े के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में राज्य में भूमि सुधार और अवैध बस्तियों के खिलाफ कार्रवाई और भी सघन होने वाली है। मुख्यमंत्री का यह रुख विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए एक चेतावनी की तरह है जहाँ बड़े पैमाने पर सरकारी और वन भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायतें लंबे समय से बनी हुई हैं।

जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री का लहजा काफी सख्त दिखाई दिया, विशेषकर उन लोगों के प्रति जिन्हें उन्होंने अतिक्रमणकारी की श्रेणी में रखा। उन्होंने सीधे तौर पर एक विशेष समुदाय का जिक्र करते हुए कहा कि पिछले पांच वर्षों में उठाए गए कड़े कदमों के कारण स्वदेशी समुदायों पर अतिक्रमणकारियों का दबदबा काफी कम हुआ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असम की धरती पर पहला हक यहाँ के मूल निवासियों का है और किसी भी बाहरी तत्व को राज्य के संसाधनों पर अवैध कब्जा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनके इस बयान ने राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना और भूमि अधिकारों के पुराने विवाद को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मुख्यमंत्री का मानना है कि अतिक्रमण मुक्त भूमि का उपयोग राज्य के विकास, कृषि और सार्वजनिक कल्याण के कार्यों के लिए किया जाना चाहिए। असम में भूमि अतिक्रमण का मुद्दा दशकों पुराना है। राज्य के कई हिस्सों में सरकारी चारागाहों, संरक्षित वनों और सत्रों (वैष्णव मठों) की भूमि पर अवैध कब्जों की खबरें आती रही हैं। वर्तमान सरकार ने 'प्रोजेक्ट वसुंधरा' और अन्य भूमि सुधार कार्यक्रमों के जरिए स्वदेशी लोगों को पट्टे देने और अवैध कब्जों को हटाने की मुहिम छेड़ी हुई है, जिसे अब चुनाव में एक बड़े वैचारिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

असम की चुनावी राजनीति में 'मिया' समुदाय को लेकर अक्सर तीखी बयानबाजी होती रही है। मुख्यमंत्री ने बजाली में अपने संबोधन के दौरान इस शब्द का प्रयोग करते हुए अतिक्रमणकारियों की पहचान को स्पष्ट करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि अधिकांश अतिक्रमणकारी इसी पृष्ठभूमि से आते हैं और उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई ने राज्य की कानून-व्यवस्था और सामाजिक संतुलन को बेहतर बनाने में मदद की है। मुख्यमंत्री के इस बयान को असमिया अस्मिता और स्वदेशी गौरव के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्ष ने हालांकि इस तरह की भाषा पर आपत्ति जताई है, लेकिन सत्ता पक्ष का तर्क है कि वे केवल सत्य बोल रहे हैं और राज्य की सुरक्षा के लिए कड़े निर्णय लेना अनिवार्य है। यह विवाद आने वाले दिनों में ध्रुवीकरण की स्थिति को और स्पष्ट कर सकता है।

चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि हिमंता बिस्वा सरमा का यह दांव ग्रामीण और जनजातीय मतदाताओं को एकजुट करने के लिए है। असम में भूमि को केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पहचान का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में 5 लाख बीघा जमीन मुक्त कराने का वादा सीधे तौर पर उन किसानों और स्थानीय समुदायों को प्रभावित करता है जो लंबे समय से बाहरी प्रभाव से डरे हुए थे। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने अतिक्रमणकारियों को उचित सबक सिखाया है और अब वे उस स्थिति में नहीं हैं कि राज्य के मूल निवासियों को डरा सकें। उनके अनुसार, यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि असम की संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित करने की है। सरकार की इस नीति का प्रभाव विशेष रूप से निचले और मध्य असम के इलाकों में देखने को मिल सकता है।

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि बेदखली की कार्रवाई किसी धर्म या जाति के खिलाफ नहीं, बल्कि अवैधता के खिलाफ है। हालांकि, उन्होंने बार-बार स्वदेशी लोगों के संरक्षण की बात कहकर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रखा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, असम में पिछले कुछ वर्षों में दरांग, लखीमपुर और सोनितपुर जैसे जिलों में बड़े स्तर पर अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाए गए हैं, जिनमें कई बार हिंसा और तनाव की स्थिति भी बनी। इसके बावजूद, मुख्यमंत्री का यह कहना कि वे अगले कार्यकाल में और भी बड़े पैमाने पर इस अभियान को ले जाएंगे, यह दर्शाता है कि भाजपा इस मुद्दे को अपनी जीत की गारंटी मान रही है। इस संकल्प को चुनावी घोषणापत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की तैयारी भी चल रही है।

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