महाराष्ट्र: अकोला के किसानों को पीएम फसल बीमा योजना में 3 से 21 रुपये का 'अपमानजनक' मुआवजा, कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन कर चेक लौटाए।
महाराष्ट्र के अकोला जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जो केंद्र सरकार की प्रमुख फसल बीमा योजना पीएम फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े
महाराष्ट्र के अकोला जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जो केंद्र सरकार की प्रमुख फसल बीमा योजना पीएम फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है। यहां भारी बारिश से फसल नष्ट होने वाले किसानों को योजना के तहत मात्र 3 से 21 रुपये तक का मुआवजा मिला। किसानों ने इसे अपनी मेहनत का अपमान बताते हुए गुरुवार को जिला कलेक्टर कार्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया। उन्होंने मुआवजे की राशि वाले चेक कलेक्टर को सौंप दिए और कहा कि यह 'मजाक' है। प्रदर्शनकारी किसानों ने मांग की कि या तो उचित मुआवजा दिया जाए या योजना को बंद कर दिया जाए। यह घटना दीपावली से ठीक पहले हुई जब किसान पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। अकोला जिले के पाटूर तहसील के कई गांवों के किसानों ने कपास और सोयाबीन की फसलें पूरी तरह खराब होने के बावजूद यह मामूली राशि प्राप्त की। स्थानीय प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है लेकिन किसान संतुष्ट नहीं हैं। विपक्षी दलों ने भी सरकार पर निशाना साधा है।
घटना अकोला जिले के पाटूर तहसील के कुछ गांवों से जुड़ी है। इस साल खरीफ सीजन में जुलाई-अगस्त में हुई भारी बारिश ने कपास और सोयाबीन की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। हजारों किसानों ने पीएमएफबीवाई के तहत बीमा कराया था। योजना के अनुसार, किसानों को फसल नुकसान पर दावा करने का अधिकार है और मुआवजा बीमित राशि के आधार पर मिलना चाहिए। लेकिन कई किसानों के बैंक खातों में मात्र 3 रुपये, 5 रुपये, 8 रुपये या अधिकतम 21.85 रुपये की राशि जमा हुई। एक किसान ने बताया कि उसकी दो एकड़ कपास की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। बीमा प्रीमियम के रूप में 2,500 रुपये दिए लेकिन मुआवजा 3 रुपये मिला। दूसरे किसान ने कहा कि 21 रुपये से क्या होगा जब कर्ज चुकाने के लिए लाखों की जरूरत है। किसानों का कहना है कि यह राशि उनकी मजबूरी का मजाक उड़ा रही है। वे पहले से ही बैंकों के कर्ज, बीज और खाद की लागत से परेशान हैं। दीपावली से पहले यह मुआवजा आने से उनकी उम्मीदें टूट गईं।
प्रदर्शन गुरुवार सुबह अकोला जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर हुआ। सैकड़ों किसान ट्रैक्टरों पर सवार होकर पहुंचे। उनके हाथों में बैनर थे जिन पर लिखा था 'पीएम फसल बीमा योजना किसानों का अपमान' और '3 रुपये का मुआवजा, सरकार का मजाक'। उन्होंने चेक निकाले जो मुआवजे की राशि दर्शा रहे थे। कलेक्टर को सौंपते हुए एक किसान ने कहा कि यह राशि लौटा रहे हैं क्योंकि यह हमारी गरीबी पर तंज है। प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा लेकिन किसानों ने चेतावनी दी कि यदि उचित मुआवजा न मिला तो जिले भर में आंदोलन तेज करेंगे। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था की। कलेक्टर ने किसानों से बात की और आश्वासन दिया कि जांच होगी। लेकिन किसान भरोसा नहीं कर रहे। उन्होंने कहा कि पहले भी ऐसी शिकायतें आईं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पीएम फसल बीमा योजना 2016 में शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं, कीटों या बीमारियों से फसल नुकसान पर किसानों को वित्तीय सहायता देना है। योजना के तहत किसान बीमित राशि का मात्र 2 प्रतिशत प्रीमियम देते हैं, बाकी केंद्र और राज्य सरकार वहन करती हैं। खरीफ फसल के लिए प्रीमियम 2 प्रतिशत, रबी के लिए 1.5 प्रतिशत और जायद के लिए 5 प्रतिशत है। लेकिन कई राज्यों में योजना की आलोचना हो रही है। महाराष्ट्र में 2020 के बाढ़ में भी किसानों को मामूली मुआवजा मिला था। विशेषज्ञों का कहना है कि बीमा कंपनियां सर्वेक्षण में लापरवाही बरतती हैं। नुकसान का आकलन क्षेत्रीय आधार पर होता है, जो व्यक्तिगत नुकसान को नजरअंदाज कर देता है। अकोला में कपास और सोयाबीन क्षेत्रों में नुकसान 70-80 प्रतिशत था लेकिन मुआवजा प्रणाली में गड़बड़ी से राशि कम आई। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में महाराष्ट्र में योजना के तहत 798 करोड़ रुपये प्रीमियम लिया गया लेकिन क्लेम सेटलमेंट मात्र 13 करोड़ रहा।
किसानों की नाराजगी जायज लग रही है। एक बुजुर्ग किसान ने बताया कि बीमा कराने के लिए बैंक गए, दस्तावेज जमा किए लेकिन नतीजा यह। अब कर्ज चुकाने के लिए मजबूर हैं। महिलाएं भी प्रदर्शन में शामिल हुईं। एक महिला किसान ने कहा कि हमारा परिवार फसल पर निर्भर है। यह राशि से क्या होगा। किसान संगठनों ने समर्थन दिया। ऑल इंडिया किसान सभा के नेता ने कहा कि योजना बीमा कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाली है। प्रीमियम इकट्ठा कर क्लेम कम देते हैं। विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार पर हमला बोला। महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता कपिल धोके ने कहा कि यह दिखावे की योजना है। किसानों के खाते में कुछ रुपये डालकर राहत का दावा करना विश्वासघात है। उन्होंने मांग की कि मुआवजा दोगुना किया जाए और बीमा प्रक्रिया पारदर्शी बने। एनसीपी (एसपी) ने भी समर्थन किया।
अकोला जिला प्रशासन ने कहा कि मुआवजा बीमित राशि और नुकसान आकलन पर आधारित है। कलेक्टर ने जांच समिति गठित की। बीमा कंपनी के प्रतिनिधियों को बुलाया जाएगा। लेकिन किसान कहते हैं कि पहले भी जांच हुई लेकिन फायदा नहीं। राज्य सरकार ने कहा कि योजना केंद्र प्रायोजित है। महाराष्ट्र में 2025-26 तक इसे जारी रखा गया है। बजट 69,515 करोड़ रुपये का है। लेकिन जमीनी स्तर पर समस्या बनी हुई। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सर्वेक्षण को ड्रोन और सैटेलाइट से मजबूत करें। व्यक्तिगत नुकसान का आकलन हो। प्रीमियम कम रखें लेकिन क्लेम समय पर दें।
यह घटना महाराष्ट्र के अन्य जिलों में भी देखी जा रही। विदर्भ क्षेत्र में बारिश से फसलें बर्बाद हुईं। किसान संगठनों ने राज्य स्तर पर आंदोलन की चेतावनी दी। सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज माफी का ऐलान किया लेकिन मुआवजा मुद्दा हल नहीं। स्थानीय लोग कहते हैं कि योजना का लाभ छोटे किसानों को नहीं मिलता। बड़े किसान ही कवर होते। एक एनजीओ ने जागरूकता कैंप लगाया। वहां किसानों को बीमा दावा भरने की ट्रेनिंग दी। लेकिन इस घटना ने विश्वास कम किया।
प्रदर्शन के बाद किसान घर लौटे लेकिन नाराजगी बरकरार। वे कहते हैं कि दीपावली अंधेरी हो गई। कलेक्टर कार्यालय पर सुरक्षा बढ़ा दी गई। मीडिया ने इसे प्रमुखता से दिखाया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल। एक यूजर ने लिखा कि सरकार किसानों को भूल गई। दूसरे ने कहा कि योजना का नाम बदलो। यह किसानों की पीड़ा है। उम्मीद है कि जांच से न्याय मिले। अन्यथा आंदोलन तेज होगा। महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि जल्द समाधान निकाला जाएगा। लेकिन किसान इंतजार कर रहे। फसल बीमा योजना का मूल उद्देश्य किसानों की आय स्थिर करना है।
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