दिल्ली हाईकोर्ट ने मीडिया को चेतावनी दी: अदालती टिप्पणियों को सनसनीखेज बनाकर रिपोर्टिंग न करें, यह गलत और जनता को भ्रमित करने वाला है।
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने मीडिया की एक चिंताजनक प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा है कि कोर्ट की सुनवाई के दौरान होने वाली मामूली या सामान्य टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने मीडिया की एक चिंताजनक प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा है कि कोर्ट की सुनवाई के दौरान होने वाली मामूली या सामान्य टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर सनसनी पैदा करने के लिए खबरों में जगह दी जा रही है। यह न केवल गलत है, बल्कि जनता को भ्रमित करने और वकीलों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला भी है। जस्टिस सुनीता विगा की बेंच ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक वरिष्ठ वकील की टिप्पणी को गलत तरीके से प्रचारित किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी रिपोर्टिंग से न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा प्रभावित होती है।
यह टिप्पणी 4 नवंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट की एक बेंच ने की। मामला एक सिविल डिस्प्यूट से जुड़ा था, जहां याचिकाकर्ता ने एक कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील संजय पाहवा ने अदालत से कुछ स्पष्टीकरण मांगा। जस्टिस विगा ने सामान्य टिप्पणी की कि वकीलों को तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए, न कि अनावश्यक बहस पर। लेकिन मीडिया ने इसे तोड़-मरोड़कर हेडलाइंस बनाईं। खबरों में लिखा गया कि अदालत ने पाहवा को विशेष रूप से निशाना बनाया और उनकी दलीलों को खारिज किया। अदालत ने इसे गलत बताते हुए कहा कि यह टिप्पणी पूरे मामले के संदर्भ में थी, न कि किसी एक व्यक्ति पर।
अदालत ने कहा, मामूली टिप्पणियों को सनसनी पैदा करने के लिए रिपोर्टिंग करना चिंताजनक प्रवृत्ति है। इससे जनता को गुमराह किया जाता है और कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। जस्टिस विगा ने जोर दिया कि मीडिया को संपूर्ण संदर्भ समझकर रिपोर्ट करना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी गलत रिपोर्टिंग से वकीलों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है, जो न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अदालत ने मीडिया हाउसों से अपील की कि वे सनसनीखेज खबरों से बचें और तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता करें। यह टिप्पणी लाइव लॉ और बार एंड बेंच जैसे विश्वसनीय स्रोतों में प्रकाशित हुई।
यह पहला मौका नहीं है जब दिल्ली हाईकोर्ट ने मीडिया की रिपोर्टिंग पर सवाल उठाए हैं। पिछले महीनों में कई मामले सामने आए हैं। अगस्त 2025 में एक ट्रायल कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को चेतावनी दी थी कि सोशल मीडिया पर जानकारी सटीक और सनसनी मुक्त होनी चाहिए। जज ने कहा कि भ्रामक तथ्य आर्टिकल 21 का उल्लंघन कर सकते हैं और सत्ता के दुरुपयोग को बढ़ावा देते हैं। ईडी को निर्देश दिया गया कि आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर सनसनीखेज सामग्री न डालें। यह मामला मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा था, जहां ईडी की पोस्ट को गलत तरीके से प्रचारित किया गया।
अक्टूबर 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया यूजर्स को चेतावनी दी। अभिनेता अजाज खान को जमानत देते हुए जस्टिस रविंदर दुदेजा ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं हैं। यौन टिप्पणियों वाले पोस्ट से दूसरों की गरिमा प्रभावित होती है। अदालत ने कहा कि बड़े फॉलोअर्स वाले लोग जिम्मेदारी से कंटेंट बनाएं। यह मामला सोशल मीडिया पर विवादास्पद पोस्ट से जुड़ा था। जस्टिस ने जोर दिया कि आर्टिकल 19 की आजादी गरिमा पर हावी नहीं हो सकती।
सितंबर 2025 में एक अन्य मामले में जस्टिस सचिन दत्ता ने आरटीआई के दुरुपयोग पर टिप्पणी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री और स्मृति ईरानी के स्कूल रिकॉर्ड की जानकारी मांगने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि आरटीआई सनसनी या जिज्ञासा के लिए नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसी मांगें बाढ़ की तरह आ सकती हैं, जो सार्वजनिक हित से अलग हैं। जस्टिस ने चेतावनी दी कि मामूली खुलासे भी अनियंत्रित मांगों को जन्म दे सकते हैं। यह फैसला वेबइंडिया123 में विस्तार से छपा।
ये घटनाएं दिखाती हैं कि न्यायिक व्यवस्था मीडिया की भूमिका पर सतर्क है। दिल्ली हाईकोर्ट ने कई बार कहा है कि रिपोर्टिंग निष्पक्ष होनी चाहिए। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने भी मीडिया को चेताया था कि कोर्ट की टिप्पणियों को संदर्भ से बाहर न निकालें। लेकिन डिजिटल युग में सनसनीखेज खबरें तेजी से वायरल होती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे जनता का कोर्ट पर विश्वास कम होता है। कानूनी पत्रकारिता पर जोर दिया जा रहा है।
मीडिया की दुनिया में यह बहस पुरानी है। टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर रेटिंग के चक्कर में हेडलाइंस आकर्षक बनाई जाती हैं। लेकिन अदालतें कहती हैं कि तथ्य सबसे ऊपर हैं। इस मामले में वकील संजय पाहवा ने भी सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनकी दलीलें मजबूत थीं और अदालत ने सामान्य टिप्पणी की। मीडिया ने इसे व्यक्तिगत बना दिया। पाहवा ने कहा कि ऐसी रिपोर्टिंग से वकीलों का मनोबल गिरता है।
सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हो गई। लोग अदालत की टिप्पणी से सहमत हैं। एक यूजर ने लिखा, मीडिया को संदर्भ समझना चाहिए, वरना भ्रम फैलता है। दूसरे ने कहा, सनसनी के लिए न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाना बंद हो। कुछ ने मीडिया की आलोचना की, कहा कि ट्रूथ चेकिंग जरूरी है। हैशटैग #MediaSensationalism ट्रेंड कर रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह बयान स्वागतयोग्य है। वे कहते हैं कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को सक्रिय होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2024 में गाइडलाइंस जारी कीं कि कोर्ट रिपोर्टिंग में संतुलन रखें। लेकिन अमल में कमी है। जस्टिस विगा ने कहा कि मीडिया को जिम्मेदार बनना होगा। अन्यथा अदालतें सख्त कदम उठा सकती हैं।
यह घटना पत्रकारिता की नैतिकता पर सवाल उठाती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज बढ़ रही है। सरकार ने भी आईटी एक्ट के तहत सख्ती की है। लेकिन अदालतें कहती हैं कि आत्मसंयम सबसे अच्छा है। इस मामले में अदालत ने याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है। सुनवाई जारी रहेगी।
भारत में मीडिया की भूमिका लोकतंत्र की चौथी स्तंभ है। लेकिन सनसनी से उसकी विश्वसनीयता घटती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ट्रेनिंग प्रोग्राम चलें। कानूनी रिपोर्टिंग के कोर्स शुरू हों। युवा पत्रकारों को संदर्भ समझाया जाए। अदालत का यह संदेश सभी के लिए है।
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