Hardoi : हरदोई के पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष का चुनावी संदेश- बंगाल में कमल खिलने के पीछे कार्यकर्ताओं का 'लहू'
विपक्ष के उन दावों को नकारते हुए जिसमें भाजपा की जीत को 'उपहार' बताया जाता है, सिंह ने कहा कि यह जीत उन अज्ञात कार्यकर्ताओं के नाम है जिनकी शहादत पर उनकी माताओं ने विलाप करने के बजाय कमल के झंडे को थामे रखा। उन्होंने कहा कि जो लोग इसे प्रशासनिक सह
- सत्ता की दहलीज तक पहुँचने का मार्ग मशीन नहीं बलिदान है: राम बहादुर सिंह
- शून्यता से शिखर तक का सफर: 15 वर्षों के संघर्ष और शहादत की अनकही कहान
हरदोई : जिले के पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष राम बहादुर सिंह का एक संदेश इन दिनों खासा चर्चा में है, जिसमें उन्होंने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घटनाक्रम और वहां भारतीय जनता पार्टी की स्थिति को लेकर अपनी बात रखी है। सिंह ने स्पष्ट किया है कि बंगाल में भाजपा का जो विस्तार हुआ है, वह किसी चुनाव आयोग की मेहरबानी या केवल ईवीएम मशीनों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे भाजपा कार्यकर्ताओं का भारी बलिदान और कठिन परिश्रम छिपा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बंगाल की तासीर को समझने के लिए वहां के जमीनी संघर्ष को देखना आवश्यक है, जहां कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर संगठन को सींचा है। पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभार की कहानी को सिंह ने आंकड़ों और घटनाओं के माध्यम से विस्तार से समझाया है। उनके अनुसार, वर्ष 2011 में जब भाजपा के पास केवल एक विधायक था, तब से लेकर 2026 तक का सफर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। उन्होंने बताया कि 2016 में पार्टी ने 3 विधायकों के साथ संघर्ष की शुरुआत की, जो 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सांसदों तक पहुंचा। 2021 के विधानसभा चुनाव में 77 विधायकों के साथ पार्टी मुख्य विपक्ष की ताकत बनी और 2024 में भारी दबाव के बावजूद 12 सीटें बचाने में सफल रही। अंततः 2026 के चुनाव परिणामों में पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, जिसे वे कार्यकर्ताओं के 15 साल के तप का प्रतिफल मानते हैं।
बंगाल की राजनीतिक हिंसा का जिक्र करते हुए पूर्व जिलाध्यक्ष ने अत्यंत भावुक और गंभीर घटनाओं को साझा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां लोकतंत्र की दुहाई देने वालों ने कार्यकर्ताओं को पेड़ों से लटकाया और बम धमाकों से उड़ाया। कई कार्यकर्ताओं के शव खेतों और तालाबों में मिले। नंदीग्राम से लेकर कूचबिहार और बशीरहाट तक, भाजपा को समर्थन देने के नाम पर पूरे के पूरे गांव जला दिए गए। महिलाओं के खिलाफ हिंसा को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया ताकि लोगों के मन में दहशत पैदा की जा सके। इन कठिन परिस्थितियों में भी कार्यकर्ताओं ने हार नहीं मानी और डटे रहे। राम बहादुर सिंह ने कार्यकर्ताओं के मनोबल की सराहना करते हुए कहा कि जिस बूथ अध्यक्ष की लाश सुबह पेड़ पर लटकी मिलती है, उसी का बेटा दोपहर में अपने आंसू पोंछकर और कलेजे पर पत्थर रखकर उसी बूथ पर पोलिंग एजेंट बनकर खड़ा हो जाता है। यह साहस और हिम्मत किसी मशीन से नहीं बल्कि अटूट राष्ट्रभक्ति और बलिदान की भावना से आती है। उन्होंने उन माताओं का भी उल्लेख किया जिनके घर जला दिए गए, लेकिन वे अगले ही दिन हाथों में पार्टी का झंडा लेकर गलियों में निकल पड़ीं। वामपंथियों के 34 साल के शासन और उसके बाद के वर्षों के दौरान हुए उत्पीड़न को कार्यकर्ताओं ने अपनी छाती पर झेला है।
विपक्ष के उन दावों को नकारते हुए जिसमें भाजपा की जीत को 'उपहार' बताया जाता है, सिंह ने कहा कि यह जीत उन अज्ञात कार्यकर्ताओं के नाम है जिनकी शहादत पर उनकी माताओं ने विलाप करने के बजाय कमल के झंडे को थामे रखा। उन्होंने कहा कि जो लोग इसे प्रशासनिक सहयोग मानते हैं, उन्हें उन जले हुए घरों की राख को छूकर देखना चाहिए जहां आज भी अपनों को खोने का दर्द मौजूद है। बंगाल में मिली सत्ता किसी को थाली में परोसकर नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे अदालतों की फटकार और केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा उजागर किए गए कड़वे सच भी शामिल हैं। हरदोई से जारी इस संदेश में राम बहादुर सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि 15 वर्षों तक अपना खून-पसीना बहाने और अपनों की लाशें ढोने के बाद आज बंगाल की गलियों से जो हुंकार निकली है, उसे मेहरबानी कहना उन शहीदों का अपमान है। यह जीत बंगाल के आत्मसम्मान की जीत है। उन्होंने फर्जी मुकदमों, जेल की सलाखों और सामाजिक बहिष्कार जैसी प्रताड़नाओं का जिक्र करते हुए कहा कि इन सब ने भी भाजपा कार्यकर्ताओं के कदमों को डिगने नहीं दिया। कार्यकर्ताओं की इसी जिद ने आज बंगाल की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह से बदल दिया है।
What's Your Reaction?


