हाजी वारिस अली शाह की मजार पर बिखरे होली के रंग: हिंदू-मुस्लिम युवाओं ने मिलकर निभाई 100 साल पुरानी परंपरा। 

होली के रंगों के बीच एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल देखने को मिली। वर्षों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए

Mar 5, 2026 - 12:29
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हाजी वारिस अली शाह की मजार पर बिखरे होली के रंग: हिंदू-मुस्लिम युवाओं ने मिलकर निभाई 100 साल पुरानी परंपरा। 
हाजी वारिस अली शाह की मजार पर बिखरे होली के रंग: हिंदू-मुस्लिम युवाओं ने मिलकर निभाई 100 साल पुरानी परंपरा। 

होली के रंगों के बीच एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल देखने को मिली। वर्षों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस बार युवाओं ने कमान संभाली और हिंदू-मुस्लिम युवकों ने मिलकर महान सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार पर होली मनाई।

मजार परिसर में दोनों समुदायों के युवाओं ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं और अमन-चैन की दुआ की। इस दौरान माहौल पूरी तरह भाईचारे और आपसी सौहार्द से भरा रहा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा करीब 100 साल से भी ज्यादा समय से चली आ रही है। हर साल होली के अवसर पर लोग मजार पर पहुंचते हैं और रंग-गुलाल के साथ एक-दूसरे को बधाई देते हैं। इस बार भी नई पीढ़ी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए साबित कर दिया कि सामाजिक एकता और आपसी प्रेम की यह मिसाल आज भी उतनी ही मजबूत है।

मौके पर मौजूद लोगों ने कहा कि सूफी संत हाजी वारिस अली शाह का संदेश हमेशा प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का रहा है। इसी संदेश को याद करते हुए हर साल यहां होली मनाई जाती है। कार्यक्रम के दौरान युवाओं ने कहा कि यह परंपरा सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता की पहचान है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह आगे बढ़ाती रहेंगी।

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