Lucknow : उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया मोड़- रोहिणी घावरी ने अखिलेश यादव का साथ लिया, दलित वोट बैंक में होगा बदलाव
समाजवादी पार्टी पहले से ही गैर-यादव ओबीसी और नॉन-जाटव दलितों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। रोहिणी घावरी की एंट्री इस रणनीति को और मजबूत बनाएगी। अखिलेश यादव की सोशल इंजीनियरिंग में यह कद
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति में एक नया विकास हुआ है। चंद्रशेखर आजाद की पूर्व साथी डॉक्टर रोहिणी घावरी अब समाजवादी पार्टी के साथ सक्रिय रूप से जुड़ रही हैं। उन्होंने अखिलेश यादव से बातचीत की है और दोनों पक्षों के बीच सहमति बन गई है। रोहिणी घावरी स्विट्जरलैंड में नौकरी कर रही हैं लेकिन जल्द ही भारत लौटकर यूपी में काम शुरू करेंगी। उनका प्लान है कि पूरे राज्य में करीब 200 सभाएं करें और फिर अखिलेश यादव की मौजूदगी में आगरा या लखनऊ में एक बड़ी रैली आयोजित करें। रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज से आती हैं। उनके पिता इंदौर में सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते थे। रोहिणी ने अपनी मेहनत से उच्च शिक्षा हासिल की और स्विट्जरलैंड में पीएचडी की स्कॉलरशिप मिली। वह वहां एनजीओ भी चलाती हैं। अब वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित समुदाय खासकर नॉन-जाटव दलितों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने जा रही हैं।
समाजवादी पार्टी पहले से ही गैर-यादव ओबीसी और नॉन-जाटव दलितों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। रोहिणी घावरी की एंट्री इस रणनीति को और मजबूत बनाएगी। अखिलेश यादव की सोशल इंजीनियरिंग में यह कदम जमीनी स्तर पर असर डाल सकता है। रोहिणी ने बताया कि उन्होंने अखिलेश यादव से छह मुख्य मुद्दों पर चर्चा की है। इनमें वाल्मीकि समाज को टिकट देना, सफाई कर्मचारियों की सुविधाएं बढ़ाना, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार, मैनुअल स्कैवेंजिंग को पूरी तरह खत्म करना, एससी-एसटी एक्ट का सही क्रियान्वयन और दलितों को पीडीए फॉर्मूले के तहत उचित प्रतिनिधित्व देना शामिल है।
यूपी में दलित आबादी करीब 20 से 21 प्रतिशत है। इसमें जाटव समाज के अलावा पासी, वाल्मीकि, कोरी, दुसाध, धोबी, खटीक और धानुक जैसी कई उपजातियां हैं। पासी समाज की आबादी लगभग 65 लाख बताई जाती है जबकि वाल्मीकि समाज की करीब 13 लाख। इन समुदायों का सफाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में बड़ा योगदान है लेकिन राजनीति में इनका प्रतिनिधित्व कम रहा है। जाटव समाज को दलित राजनीति से सबसे ज्यादा फायदा मिला है जबकि अन्य उपजातियां पीछे रह गई हैं। रोहिणी घावरी का फोकस इन्हीं नॉन-जाटव दलितों को एकजुट करने पर है।
रोहिणी घावरी का कहना है कि दलित राजनीति में अब बदलाव की जरूरत है। वे चाहती हैं कि सभी दलित उपजातियों को बराबर मौका मिले। उनकी 200 सभाओं का प्लान इसी दिशा में है। ये सभाएं गांव-गांव तक पहुंचेंगी और लोगों को जागरूक करेंगी। इसके बाद बड़ी रैली में अखिलेश यादव मुख्य अतिथि होंगे। इससे समाजवादी पार्टी को नए सामाजिक आधार मिलने की उम्मीद है। यह विकास चंद्रशेखर आजाद की राजनीति के लिए चुनौती बन सकता है। चंद्रशेखर आजाद भीम आर्मी के संस्थापक हैं और नगीना से सांसद हैं। वे दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर जोर देते हैं। रोहिणी घावरी के सक्रिय होने से नॉन-जाटव दलित वोटों में पुनर्संरचना हो सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे चंद्रशेखर आजाद के प्रभाव वाले क्षेत्रों में सेंध लग सकती है।
रोहिणी घावरी और चंद्रशेखर आजाद के बीच पिछले कुछ समय से सार्वजनिक विवाद रहा है। रोहिणी घावरी ने चंद्रशेखर पर कई आरोप लगाए थे। उन्होंने सोशल मीडिया पर ऑडियो और वीडियो भी जारी किए। इन विवादों के बीच अब रोहिणी घावरी का समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ना राजनीतिक हलचल बढ़ा रहा है। रोहिणी ने कहा है कि चंद्रशेखर को वोट देना कुछ हद तक दूसरी ताकतों को मजबूत करना है। उनका फोकस अब दलित समाज की असली हिस्सेदारी पर है। उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति लंबे समय से जटिल रही है। बहुजन समाज पार्टी ने मायावती के नेतृत्व में दलितों को एकजुट किया लेकिन समय के साथ उपजातीय समीकरण उभरे। जाटव समाज बीएसपी का मुख्य आधार रहा। अन्य दलित समुदायों ने अलग-अलग दलों की ओर रुख किया। अब समाजवादी पार्टी इन नॉन-जाटव दलितों को साधने की कोशिश कर रही है। रोहिणी घावरी जैसे चेहरों की एंट्री इस रणनीति को नई ऊर्जा देगी।
वाल्मीकि समाज सफाई कार्य से जुड़ा है। इनके मुद्दे जैसे मैनुअल स्कैवेंजिंग खत्म करना, बेहतर वेतन, आवास और सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण हैं। पासी समाज भी कृषि और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय है। रोहिणी घावरी इन समुदायों की आवाज बनकर काम करेंगी। वे कहती हैं कि दलित राजनीति में केवल एक उपजाति का वर्चस्व नहीं होना चाहिए। सभी को शामिल करने वाला समावेशी नेतृत्व जरूरी है।
2027 के चुनाव में जातीय समीकरणों के साथ-साथ विकास, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के मुद्दे भी अहम होंगे। अगर रोहिणी घावरी का अभियान सफल होता है तो समाजवादी पार्टी को फायदा हो सकता है। साथ ही दलित वोट बैंक में नया ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ चेतावते हैं कि इससे दलित वोटों का बिखराव भी हो सकता है। अगर वोट बंटे तो चुनावी नतीजे प्रभावित होंगे।
रोहिणी घावरी की पृष्ठभूमि भी दिलचस्प है। इंदौर से आने वाली रोहिणी ने कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई की। स्विट्जरलैंड में उनकी सफलता युवाओं के लिए प्रेरणा है। अब वे राजनीति में उतरकर अपने समाज की सेवा करना चाहती हैं। उनका कहना है कि शिक्षा और जागरूकता से दलित समाज आगे बढ़ सकता है। समाजवादी पार्टी की रणनीति में रोहिणी घावरी की भूमिका सिर्फ सभाओं तक सीमित नहीं होगी। वे जमीनी स्तर पर संगठन भी खड़ी कर सकती हैं। अखिलेश यादव की टीम इस नए साथी को लेकर उत्साहित है। इससे पार्टी की पहुंच गांवों तक बढ़ेगी। दलित राजनीति में नेतृत्व की टक्कर अब और तीखी हो गई है। चंद्रशेखर आजाद एक तरफ जहां युवा दलितों को आकर्षित करते हैं वहीं रोहिणी घावरी नॉन-जाटव समुदायों पर फोकस कर रही हैं। यह टक्कर केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि दलित आंदोलन के भविष्य को तय करेगी। कौन असली प्रतिनिधि है यह सवाल अब और मजबूत हो गया है।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि यूपी में दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अगर नॉन-जाटव दलित एकजुट होते हैं तो कई सीटों पर असर पड़ेगा। रोहिणी घावरी का अभियान इसी दिशा में है। वे चाहती हैं कि सफाई कर्मचारियों को सम्मान मिले, उनकी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और समाज में उनकी स्थिति मजबूत हो। यह नया विकास यूपी राजनीति को प्रभावित करेगा। समाजवादी पार्टी को नए सहयोगी मिल रहे हैं जबकि चंद्रशेखर आजाद को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। आने वाले महीनों में रोहिणी घावरी की गतिविधियां देखना दिलचस्प होगा। दलित समाज में समावेशी नेतृत्व की मांग बढ़ रही है। रोहिणी घावरी का कदम इसी मांग को मजबूत करता है। अगर उनका प्लान जमीन पर उतरा तो 2027 का चुनाव दलित राजनीति के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।
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