Lucknow : कठवारा में मां चंद्रिका देवी मंदिर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं, चुनरी और घंटी बांधकर व्यक्त होती श्रद्धा

मान्यता है कि त्रेता युग में लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ आदि गंगा गोमती नदी के तट पर कटकबासा के घने जंगल में रुके थे। अमावस्या की आधी रात में भय होने पर उन्हों

Mar 21, 2026 - 21:24
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Lucknow : कठवारा में मां चंद्रिका देवी मंदिर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं, चुनरी और घंटी बांधकर व्यक्त होती श्रद्धा
Lucknow : कठवारा में मां चंद्रिका देवी मंदिर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं, चुनरी और घंटी बांधकर व्यक्त होती श्रद्धा

लखनऊ। राजधानी लखनऊ के बीकेटी विकासखंड के कठवारा गांव में स्थित सिद्धपीठ मां चंद्रिका देवी मंदिर क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। एक बार दर्शन करने के बाद भक्त बार-बार आने की इच्छा रखते हैं। यह मंदिर ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक मान्यताओं के कारण प्रदेश के साथ देश-विदेश से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यहां भक्त पिंडी रूप में मां की पूजा करते हैं। मंदिर श्रद्धा का मजबूत प्रतीक बन चुका है। हर महीने अमावस्या और नवरात्र में लाखों भक्त यहां आते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्ति से भर जाता है। रोज होने वाली आरती और पूजन भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा देता है।

मान्यता है कि त्रेता युग में लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ आदि गंगा गोमती नदी के तट पर कटकबासा के घने जंगल में रुके थे। अमावस्या की आधी रात में भय होने पर उन्होंने मां उर्मिला द्वारा बताए मंत्रों से देवी का जाप किया। तभी जंगल में चंद्रघटा छा गई और उनका भय दूर हुआ। इसी जगह मां की स्थापना हुई। द्वापर युग में स्कंद पुराण में इस तीर्थ का जिक्र मिलता है। अमावस्या पर मेला लगने का इतिहास ढाई सौ साल से ज्यादा पुराना है। कटकबासा अब कठवारा कहलाता है। मंदिर की तीन दिशाओं में गोमती नदी बहती है, जो इसे और आकर्षक बनाती है।

हर महीने अमावस्या पर मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु आते हैं। भक्त मनोकामना पूरी करने के लिए चुनरी की गांठ बांधते हैं। मन्नत पूरी होने पर चुनरी प्रसाद चढ़ाकर मंदिर परिसर में घंटी बांधते हैं। अमीर-गरीब, अगड़ा-पिछड़ा सभी मां के दरबार में मत्था टेककर मन की मुराद मांगते हैं। मां सभी की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। नवरात्र में रोज मेला लगता है। सूखे मेवे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। नव दंपति नए जीवन की शुरुआत से पहले मां का आशीर्वाद लेते हैं। मुंडन, नामकरण और जनेऊ जैसे संस्कार भी यहां संपन्न होते हैं।

नवरात्र में मंदिर परिसर में विशेष चहल-पहल रहती है। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए मेला कमेटी और प्रशासन जरूरी व्यवस्थाएं करता है। सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। स्थानीय पुलिस, पीएसी और जल पुलिस तैनात रहती है। मंदिर के पास गोमती नदी तट पर सुधन्वा कुंड या महीसागर संगम तीर्थ है। पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति के श्राप से प्रभावित चंद्रमा को श्राप मुक्ति के लिए यहां स्नान करना पड़ा। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान से कुष्ठ जैसे रोग दूर होते हैं।

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