Lucknow : गोमती पुस्तक महोत्सव में शीला रोहेकर से विशेष बातचीत, यहूदी समाज की त्रासदी पर जोर

साक्षात्कार में रोहेकर ने कहा, "साहित्य हमेशा इतिहास और उससे जुड़ी राजनीतिक घटनाओं को साथ लेकर चलता है। इनके बिना आपकी रचना में कोई महत्व नहीं। आपको सिर्फ घटना का वर्णन नहीं करना,

Sep 24, 2025 - 10:33
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Lucknow : गोमती पुस्तक महोत्सव में शीला रोहेकर से विशेष बातचीत, यहूदी समाज की त्रासदी पर जोर
गोमती पुस्तक महोत्सव में शीला रोहेकर से विशेष बातचीत, यहूदी समाज की त्रासदी पर जोर

लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव के दौरान हिंदी साहित्य की प्रमुख लेखिका शीला रोहेकर ने अपनी रचनाओं और लेखन प्रक्रिया पर खुलकर बात की। यह महोत्सव पुस्तक प्रेमियों का बड़ा समागम है, जहां विभिन्न भाषाओं की सैकड़ों किताबें उपलब्ध हैं। रोहेकर, जो बेने इस्राइल यहूदी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं, अपनी कहानियों और उपन्यासों के जरिए समाज की गहराइयों को छूती हैं। उन्होंने बताया कि साहित्य इतिहास और राजनीतिक घटनाओं से गहराई से जुड़ा होता है। महोत्सव में अन्य लेखकों जैसे अरुण मोहन शैरी, गुलाब कोठारी और शिवमूर्ति के साथ वे चर्चाओं का हिस्सा बनीं। रोहेकर का पहला उपन्यास "दिनांत" (1977) ने यशपाल पुरस्कार जीता था, और उनकी नवीनतम रचना "मिस सैमुअल: एक यहूदी गाथा" (2013) में भारतीय यहूदी जीवन को दर्शाया गया है। यह किताब यहूदी समुदाय की चुनौतियों को सामने लाती है।साक्षात्कार में रोहेकर ने कहा, "साहित्य हमेशा इतिहास और उससे जुड़ी राजनीतिक घटनाओं को साथ लेकर चलता है। इनके बिना आपकी रचना में कोई महत्व नहीं। आपको सिर्फ घटना का वर्णन नहीं करना, बल्कि उससे पात्रों और समाज पर क्या असर पड़ता है, यह भी दर्शाना पड़ता है।" उनकी रचनाओं में यहूदी समुदाय की पीड़ा बार-बार झलकती है, जो होलोकॉस्ट और सामाजिक भेदभाव से प्रेरित है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे साहित्य को अपने समुदाय का दस्तावेज बनाने का प्रयास कर रही हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, "जो अपमान और परेशानी यहूदी समाज ने देखी है, उन तकलीफों को मैंने जाना है और निराशा भी देखी है। मेरे साहित्य में मेरे यहूदी समाज का आना सिर्फ दस्तावेजीकरण तक सीमित नहीं है। त्रासदी हर एक इंसान के लिए अलग होती है।" रोहेकर ने स्वीडन के प्रोफेसर हेंज वर्नर वेसलर के सवाल से प्रेरित होकर यहूदी विषयों पर लिखना शुरू किया। उनकी शादी हिंदू लेखक से होने के बावजूद वे यहूदी पहचान को बनाए रखती हैं।

युवा लेखकों को संदेश देते हुए रोहेकर ने सलाह दी, "मैं सिर्फ यह सीख देना चाहूंगी कि खूब पढ़िए, अच्छी किताबें पढ़िए, धीरे-धीरे पढ़िए, उन्हें ग्रहण कीजिए और मनन कीजिए, तभी आपके लेखन में चमक आएगी। हम चांद की रोशनी में पढ़ते थे। तब जाकर भाषा में स्वतंत्रता आती है।" उन्होंने बताया कि बचपन में सीमित संसाधनों के बावजूद पढ़ाई ने उनकी रचनात्मकता को निखारा। महोत्सव में छात्रों ने उनकी किताबें खरीदीं और सवाल पूछे। रोहेकर ने कहा कि साहित्य में विज्ञान का उपयोग बहुत काम आता है। "जब मैं कुछ भी लिखती हूं, तो उसका पुष्टिकरण करके लिखती हूं।" यह दृष्टिकोण उनकी रचनाओं को तथ्यात्मक और विश्वसनीय बनाता है।

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