महाकुंभ की 'वायरल गर्ल' निकली नाबालिग: 16 साल की निकली मोनालिसा की असली उम्र, फरमान खान पर लटकी गिरफ्तारी की तलवार।
प्रयागराज महाकुंभ के पवित्र संगम तट से शुरू हुआ मोनालिसा और फरमान खान का सफर अब पुलिस थानों और अदालती गलियारों तक पहुंच
- सोशल मीडिया सनसनी के पीछे का कड़वा सच: मोनालिसा के दस्तावेजों ने खोली पोल, पति के खिलाफ पॉक्सो एक्ट में मुकदमा दर्ज।
- कानूनी शिकंजे में फरमान खान: नाबालिग से शादी और पहचान छिपाने के आरोप, महाकुंभ से शुरू हुआ विवाद अब पहुंचेगा सलाखों के पीछे।
प्रयागराज महाकुंभ के पवित्र संगम तट से शुरू हुआ मोनालिसा और फरमान खान का सफर अब पुलिस थानों और अदालती गलियारों तक पहुंच गया है। वायरल वीडियो में हिंदू वेशभूषा और माथे पर तिलक लगाकर रील बनाने वाली मोनालिसा की असल पहचान को लेकर शुरुआती दौर से ही संदेह जताया जा रहा था। जब पुलिस ने इस मामले की गहराई से पड़ताल की और लड़की के मूल निवास स्थान से उसके शैक्षणिक प्रमाण पत्र और जन्म संबंधी दस्तावेज मंगवाए, तो सच्चाई सबके सामने आ गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लड़की की जन्म तिथि उसे अभी भी कानूनन नाबालिग की श्रेणी में रखती है। इस जानकारी के सामने आते ही पुलिस प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मामले को बाल विवाह और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के दायरे में ले लिया है।
मोनालिस और फरमान खान के बीच के संबंधों की प्रकृति अब पूरी तरह से बदल गई है, क्योंकि भारतीय कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह अमान्य है और इसे एक गंभीर अपराध माना जाता है। फरमान खान, जिसने खुद को मोनालिसा का पति बताकर कई वीडियो साझा किए थे, अब कानून की नजर में एक अपराधी के रूप में देखा जा रहा है। पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में अपहरण, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम और विशेष रूप से पॉक्सो एक्ट की संगीन धाराएं शामिल की गई हैं। जांच टीम का मानना है कि फरमान ने न केवल एक नाबालिग को गुमराह किया, बल्कि उसकी धार्मिक पहचान को भी सोशल मीडिया फुटेज के जरिए भ्रमित करने का प्रयास किया, जिससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया था।
इस मामले में सबसे गंभीर पहलू लड़की की सुरक्षा और उसके भविष्य का है। पुलिस ने नाबालिग लड़की को अपनी कस्टडी में लेकर उसे बाल कल्याण समिति (CWC) के सामने पेश करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। चिकित्सा परीक्षण के जरिए लड़की की उम्र का पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने के लिए 'ऑसिफिकेशन टेस्ट' की भी तैयारी की जा रही है, ताकि अदालत में फरमान खान के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश किए जा सकें। जांच के दौरान यह भी पता चला है कि फरमान खान उसे विभिन्न शहरों में लेकर घूम रहा था और सोशल मीडिया से होने वाली कमाई के लालच में उसे एक ऐसी पहचान देने की कोशिश कर रहा था जो वास्तविकता से कोसों दूर थी। पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत नाबालिग के साथ किसी भी तरह का शारीरिक संबंध या विवाह का दिखावा करना गैर-जमानती अपराध है। इसमें अपराधी को कम से कम 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त, बाल विवाह कराने या उसमें सहायता करने वालों को भी जेल की हवा खानी पड़ सकती है।
फरमान खान की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की कई टीमें गठित की गई हैं और उसके संभावित ठिकानों पर छापेमारी की जा रही है। प्रारंभिक पूछताछ में लड़की के परिजनों ने भी कुछ ऐसे तथ्य साझा किए हैं जो फरमान के दावों को झूठा साबित करते हैं। परिजनों का कहना है कि लड़की को बहला-फुसलाकर ले जाया गया था और उन्हें उसके इस तरह के सोशल मीडिया चित्रण के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इस पूरे मामले के पीछे कोई संगठित गिरोह है जो नाबालिग लड़कियों को वायरल करने और उनके जरिए आर्थिक लाभ कमाने का काम कर रहा है।
महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजन का उपयोग कर सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के इस प्रयास ने प्रशासन को भी सतर्क कर दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रील बनाने के शौक की आड़ में कानून का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मोनालिसा के मामले में पहचान छिपाने और नाबालिग होने के बावजूद उसे विवाहित दिखाने के कृत्य को समाज और कानून दोनों के लिए घातक माना जा रहा है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, फरमान खान के पिछले रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वह पहले भी इस तरह की गतिविधियों में शामिल रहा है या नहीं।
इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी हलचल तेज है। कई डिजिटल विशेषज्ञों का मानना है कि वायरल होने की होड़ में लोग बुनियादी कानूनों को नजरअंदाज कर रहे हैं। मोनालिसा और फरमान के मामले ने यह सबक दिया है कि इंटरनेट पर दिखने वाली हर चीज सच नहीं होती और ग्लैमर के पीछे अक्सर अपराध की गहरी जड़ें छिपी हो सकती हैं। पुलिस अब उन लोगों पर भी नजर रख रही है जिन्होंने इस मामले में भ्रामक सूचनाएं फैलाने और नाबालिग की पहचान को उजागर करने में भूमिका निभाई है, क्योंकि पॉक्सो एक्ट के तहत पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करना भी अपराध की श्रेणी में आता है।
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