शादी के सात जन्मों का बंधन टूटा तो पिता ने खिलाई मिठाई, टी-शर्ट पर 'आई लव माई डॉटर' लिखकर समाज को दिया बड़ा संदेश

कचहरी से घर तक का सफर किसी विदाई समारोह जैसा नहीं, बल्कि एक विजय जुलूस जैसा प्रतीत हो रहा था। ज्ञानेंद्र शर्मा ने विशेष रूप से ढोल-नगाड़ों का इंतजाम किया था। जैसे ही वे लोग घर की ओर बढ़े, ढोल की थाप पर परिवार के सदस्य नाचते-झूमते नज

Apr 5, 2026 - 11:42
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शादी के सात जन्मों का बंधन टूटा तो पिता ने खिलाई मिठाई, टी-शर्ट पर 'आई लव माई डॉटर' लिखकर समाज को दिया बड़ा संदेश
शादी के सात जन्मों का बंधन टूटा तो पिता ने खिलाई मिठाई, टी-शर्ट पर 'आई लव माई डॉटर' लिखकर समाज को दिया बड़ा संदेश
  • मेरठ में अनोखा जश्न: तलाक के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ बेटी की विदाई कराकर घर लाए रिटायर्ड जज पिता
  • अत्याचार और कलह से मिली मुक्ति का उत्सव: मेरठ की प्रणिता को मिला पिता का अटूट साथ, कचहरी से घर तक गूंजी शहनाई

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने वाली एक ऐसी हृदयस्पर्शी घटना सामने आई है, जिसने विवाह और तलाक जैसे विषयों पर समाज के पारंपरिक नजरिए को बदलने का काम किया है। आमतौर पर किसी बेटी का घर टूटना या तलाक होना परिवार के लिए दुख और शोक का विषय माना जाता है, लेकिन मेरठ के रहने वाले सेवानिवृत्त जज ज्ञानेंद्र शर्मा ने इस धारणा को पूरी तरह पलट दिया। शनिवार को जब उनकी बेटी प्रणिता का आधिकारिक तौर पर तलाक हुआ, तो वे दुखी होने के बजाय अत्यंत हर्षित नजर आए। उन्होंने कचहरी परिसर में ही अपनी बेटी को मिठाई खिलाकर इस नए अध्याय का स्वागत किया। यह केवल एक कानूनी अलगाव नहीं था, बल्कि एक पिता द्वारा अपनी बेटी को घुट-घुट कर जीने वाली जिंदगी से बाहर निकालने का गौरवमयी क्षण था।

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि साल 2018 से जुड़ी हुई है। प्रणिता का विवाह 14 दिसंबर 2018 को बड़े ही धूमधाम के साथ भारतीय सेना के एक मेजर के साथ संपन्न हुआ था। परिवार को उम्मीद थी कि बेटी एक सुरक्षित और खुशहाल वैवाहिक जीवन व्यतीत करेगी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शादी के कुछ समय बाद ही ससुराल पक्ष के साथ प्रणिता के संबंधों में खटास आने लगी। विवाद की स्थितियां इतनी गंभीर हो गईं कि छोटी-छोटी बातों पर कलह और मानसिक उत्पीड़न का दौर शुरू हो गया। प्रणिता ने अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के अथक प्रयास किए और इसी बीच उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति भी हुई, लेकिन बच्चे के आगमन के बाद भी ससुराल वालों के व्यवहार में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया।

वैवाहिक जीवन में कड़वाहट जब असहनीय सीमा तक पहुंच गई, तो अंततः मामला मेरठ के फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) की दहलीज तक पहुंचा। कई वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया और सुलह के तमाम प्रयासों के विफल होने के बाद, अदालत ने शनिवार को दोनों पक्षों की सहमति और तथ्यों के आधार पर तलाक की डिक्री जारी कर दी। जैसे ही अदालत का फैसला आया, ज्ञानेंद्र शर्मा ने अपनी बेटी का हाथ थामा और उसे यह विश्वास दिलाया कि यह उसके जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक गरिमापूर्ण शुरुआत है। उन्होंने समाज की उस सोच पर प्रहार किया जो तलाकशुदा महिला को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है। पिता के इस अटूट समर्थन ने प्रणिता के भीतर एक नया आत्मविश्वास भर दिया। इस पूरे जश्न के दौरान एक खास बात ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। रिटायर्ड जज ज्ञानेंद्र शर्मा और उनके परिवार के अन्य सदस्य एक ही रंग की विशेष काली टी-शर्ट पहने हुए थे। इन टी-शर्ट्स पर सफेद अक्षरों में गर्व के साथ लिखा था— "I Love My Daughter" (मुझे अपनी बेटी से प्यार है)। यह पहनावा केवल एक फैशन नहीं, बल्कि एक पिता का दुनिया को दिया गया कड़ा संदेश था कि उनकी बेटी उनके लिए बोझ नहीं, बल्कि उनका गौरव है।

कचहरी से घर तक का सफर किसी विदाई समारोह जैसा नहीं, बल्कि एक विजय जुलूस जैसा प्रतीत हो रहा था। ज्ञानेंद्र शर्मा ने विशेष रूप से ढोल-नगाड़ों का इंतजाम किया था। जैसे ही वे लोग घर की ओर बढ़े, ढोल की थाप पर परिवार के सदस्य नाचते-झूमते नजर आए। रास्ते भर प्रणिता को मिठाई खिलाई गई और फूलों से उसका स्वागत किया गया। मेरठ की गलियों में जिसने भी यह नजारा देखा, वह दंग रह गया। पिता का तर्क था कि यदि शादी धूमधाम से हो सकती है, तो एक दुखद और प्रताड़ना भरे रिश्ते से मुक्ति का उत्सव उससे भी बड़ा होना चाहिए। वे अपनी बेटी को यह महसूस कराना चाहते थे कि उसके मायके के दरवाजे उसके लिए हमेशा खुले हैं और उसे समाज से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

ज्ञानेंद्र शर्मा जो स्वयं न्यायपालिका का हिस्सा रहे हैं, भली-भांति जानते हैं कि अदालती कार्यवाही और सामाजिक ताने एक महिला को किस कदर तोड़ देते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी ने लंबे समय तक मानसिक पीड़ा सही है और एक जज होने के नाते उन्होंने कई ऐसे मामले देखे हैं जहां बेटियां चुप्पी साध लेती हैं। उन्होंने अपनी बेटी को सशक्त बनाने का निर्णय लिया ताकि वह अपने बच्चे के साथ एक स्वतंत्र और सुरक्षित भविष्य का निर्माण कर सके। इस जश्न का उद्देश्य उन पिताओं को प्रेरित करना भी था जो अपनी बेटियों को केवल इसलिए ससुराल में अपमान सहने के लिए मजबूर करते हैं कि 'लोग क्या कहेंगे'।

परिवार के इस कदम की सराहना पूरे शहर में हो रही है। प्रणिता ने भी भावुक होते हुए कहा कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है जिन्होंने अंधेरे वक्त में उनका साथ नहीं छोड़ा। अब प्रणिता अपने बेटे की परवरिश और अपने करियर पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं। यह घटना मेरठ के इतिहास में एक मिसाल के तौर पर दर्ज हो गई है, जहां एक पिता ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद मिले अनुभवों का उपयोग अपनी बेटी के जीवन में प्रकाश लाने के लिए किया। ढोल-नगाड़ों की वह गूंज केवल एक शोर नहीं थी, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज की उन बेड़ियों के टूटने की आवाज थी जो महिलाओं को असफल विवाहों में कैद रखती हैं।

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