नेपाल की नई 'भंसार' नीति से सीमा पर उबाल: 100 रुपये से अधिक के भारतीय सामान पर टैक्स के विरोध में सड़कों पर उतरे लोग।
नेपाल में हाल ही में गठित बालेन शाह समर्थित नई सरकार के एक कड़े फैसले ने सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी असंतोष और विरोध की लहर पैदा कर दी
- रोटी-बेटी के रिश्तों पर टैक्स का प्रहार: बालेन शाह सरकार की सख्ती के खिलाफ मधेश क्षेत्र में भारी प्रदर्शन, सशस्त्र पुलिस ने बढ़ाई सीमा पर चौकसी
- महंगाई की मार और सीमावर्ती व्यापार पर संकट: नेपाल सरकार के नए कस्टम नियम से आम नागरिक हलकान, भारत से जुड़ी सीमा चौकियों पर बढ़ाया गया कड़ा पहरा
नेपाल में हाल ही में गठित बालेन शाह समर्थित नई सरकार के एक कड़े फैसले ने सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी असंतोष और विरोध की लहर पैदा कर दी है। सरकार ने अपनी नई 'भंसार' (सीमा शुल्क) नीति के तहत भारत से आने वाले 100 नेपाली रुपये से अधिक मूल्य के किसी भी सामान पर अनिवार्य रूप से टैक्स वसूलने का निर्देश जारी किया है। यह आदेश विशेष रूप से नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाकों, जिन्हें मधेश क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, के नागरिकों के लिए एक बड़े संकट के रूप में उभरा है। वर्षों से भारत-नेपाल की खुली सीमा के कारण दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के बाजारों पर निर्भर रहे हैं, लेकिन अब महज 100 रुपये की मामूली सीमा तय किए जाने से दैनिक जीवन की छोटी-छोटी खरीदारी भी कर के दायरे में आ गई है। इस सख्ती के विरोध में रविवार, 19 अप्रैल 2026 को नेपाल के बीरगंज, सिरहा और धनुषा जैसे प्रमुख सीमावर्ती शहरों में सैकड़ों लोगों ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
नेपाल सरकार के इस कदम के पीछे मुख्य तर्क राजस्व की चोरी को रोकना और स्थानीय नेपाली व्यापारियों को संरक्षण देना बताया जा रहा है। सरकार का मानना है कि छोटे सामानों की आड़ में बड़े पैमाने पर तस्करी हो रही है, जिससे देश के खजाने को भारी नुकसान पहुँच रहा है। हालांकि, यह प्रावधान नेपाल के सीमा शुल्क अधिनियम में कई वर्षों से मौजूद था, लेकिन व्यावहारिक कठिनाइयों और आम जनता की सहूलियत को देखते हुए इसे कभी भी पूरी तरह लागू नहीं किया गया था। नई सरकार ने सत्ता संभालते ही अपनी 'जीरो टॉलरेंस' नीति का परिचय देते हुए सशस्त्र पुलिस बल (APF) को निर्देश दिए हैं कि वे हर छोटी-बड़ी वस्तु की सघन तलाशी लें और नियम का सख्ती से पालन कराएं। अब सीमा पर हर झोले और बैग की जांच की जा रही है, जिससे सीमा चौकियों पर लोगों की लंबी कतारें लगने लगी हैं और तनाव का माहौल व्याप्त है। इस नई नीति का सबसे गहरा प्रभाव उन गरीब परिवारों और निम्न आय वर्ग के लोगों पर पड़ रहा है जो दाल, नमक, तेल और कपड़ों जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं। भारत के जोगबनी, रक्सौल और बनबसा जैसे सीमावर्ती बाजारों में सामान नेपाल की तुलना में काफी सस्ता मिलता है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आज के महंगाई के दौर में 100 रुपये की कीमत कुछ भी नहीं है; यदि कोई व्यक्ति एक किलो चीनी या थोड़ा सा राशन भी लेकर आता है, तो उसकी कीमत 100 रुपये से ऊपर निकल जाती है। ऐसे में हर छोटी चीज पर टैक्स देना और लंबी जांच प्रक्रिया से गुजरना आम नागरिकों के लिए मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न जैसा हो गया है। स्थानीय लोगों का तर्क है कि सरकार को बड़े तस्करों पर लगाम लगानी चाहिए, न कि उन लोगों को परेशान करना चाहिए जो अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए सीमा पार से सामान लाते हैं।
- रोटी-बेटी के रिश्तों पर कूटनीतिक छाया
नेपाल के विभिन्न राजनीतिक दलों और नागरिक समाज संगठनों ने इस फैसले को भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने 'रोटी-बेटी' के रिश्तों के खिलाफ बताया है। उनका तर्क है कि इस तरह की सख्ती से न केवल व्यापार प्रभावित होगा, बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक संबंधों में भी दरार आ सकती है। मधेश क्षेत्र के सांसदों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस मामले में काठमांडू की केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। शनिवार को मधेश और लुंबिनी प्रांत के सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री से मुलाकात कर इस नीति को तुरंत वापस लेने या इसकी सीमा बढ़ाने की मांग की। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि काठमांडू में बैठकर लिए गए फैसले जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं। मधेश की अर्थव्यवस्था और जनजीवन पूरी तरह से सीमा पार के व्यापार से जुड़ा हुआ है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने घरेलू उपयोग की वस्तुओं पर से इस कर सीमा को नहीं हटाया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन को और भी उग्र बनाया जाएगा। उनका कहना है कि यह नियम केवल सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के प्रति भेदभावपूर्ण है।
प्रशासनिक स्तर पर, सशस्त्र पुलिस बल (APF) ने अपनी गतिविधियों को और भी सक्रिय कर दिया है। झापा, मोरंग और रुपन्देही जैसे जिलों में सुरक्षा बलों ने जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ निगरानी चौकियां बढ़ा दी हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, राजस्व अनुसंधान विभाग और सीमा शुल्क विभाग की संयुक्त टीमें अब लगातार गश्त कर रही हैं। अधिकारियों का दावा है कि कुछ लोग 'कैरियर' के रूप में काम करते हैं जो दिन भर में कई बार 100-100 रुपये का सामान लाकर बड़ा स्टॉक जमा कर लेते हैं और उसे अवैध रूप से बेचते हैं। सरकार का मुख्य लक्ष्य इन्हीं बिचौलियों पर नकेल कसना है। हालांकि, इस प्रक्रिया में आम जनता को हो रही परेशानी को लेकर प्रशासन अभी तक कोई ठोस समाधान पेश नहीं कर पाया है। इस विवाद का असर अब भारतीय सीमावर्ती बाजारों पर भी दिखने लगा है। रक्सौल और जोगबनी जैसे शहरों के व्यापारियों ने चिंता जताई है कि यदि नेपाली ग्राहकों का आना कम हुआ, तो उनका कारोबार ठप हो जाएगा। भारतीय व्यापारियों का मानना है कि इस तरह के कड़े नियमों से दोनों देशों के बीच होने वाला अनौपचारिक व्यापार समाप्त हो जाएगा, जिससे सीमावर्ती जिलों की अर्थव्यवस्था को बड़ा धक्का लगेगा। नेपाल के भीतर भी इस फैसले के बाद दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतों में अचानक उछाल देखने को मिल रहा है, क्योंकि अब स्थानीय दुकानदारों को सामान लाने के लिए अधिक कर चुकाना पड़ रहा है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं की जेब पर ही पड़ रहा है।
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