भारत में 'राजनीति' परिवार का धंधा बन गई: शशि थरूर ने वंशवादी राजनीति को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारत की राजनीति पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि देश में राजनीति एक परिवार का धंधा बन चुकी है और वंशवादी राजनीति लोकतंत्र

Nov 4, 2025 - 13:24
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भारत में 'राजनीति' परिवार का धंधा बन गई: शशि थरूर ने वंशवादी राजनीति को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।
भारत में 'राजनीति' परिवार का धंधा बन गई: शशि थरूर ने वंशवादी राजनीति को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारत की राजनीति पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि देश में राजनीति एक परिवार का धंधा बन चुकी है और वंशवादी राजनीति लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। थरूर ने प्रोजेक्ट सिंडिकेट पोर्टल पर 'इंडियन पॉलिटिक्स आर ए फैमिली बिजनेस' शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने वंशवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कही। उनका मानना है कि नेतृत्व अब योग्यता पर नहीं, बल्कि जन्माधिकार पर आधारित हो गया है। यह बयान बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक दो दिन पहले आया, जब विपक्षी दलों में भी वंशवादी नेताओं की भरमार है। थरूर ने नेहरू-गांधी परिवार से लेकर अन्य पार्टियों के उदाहरण देकर कहा कि समय आ गया है कि भारत वंशवाद को छोड़कर योग्यता आधारित नेतृत्व की ओर बढ़े।

थरूर का यह लेख 3 नवंबर 2025 को प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने लिखा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और अब राहुल गांधी व प्रियंका गांधी वाड्रा तक ने यह धारणा मजबूत की है कि राजनीतिक नेतृत्व जन्मसिद्ध अधिकार है। थरूर ने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार ने इस विचार को पक्का कर दिया कि राजनीतिक नेतृत्व जन्मजात है। उन्होंने वंशवाद को लोकतंत्र की नींव हिला देने वाला बताया। थरूर ने तर्क दिया कि जब सत्ता वंश परंपरा से तय होती है, न कि क्षमता, समर्पण या जनसंपर्क से, तो शासन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि वंशवादी नेता हारने के बावजूद सत्ता में बने रहते हैं, क्योंकि उनका हक जन्म से जुड़ा होता है।

थरूर ने लेख में सभी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह समस्या सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं है। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना (यूबीटी) जैसे विपक्षी दलों में भी वंशवाद हावी है। बिहार चुनाव के संदर्भ में उन्होंने तेजस्वी यादव का नाम लिए बिना इशारा किया कि छोटे-छोटे वंशवादी नेता भी उभर रहे हैं। थरूर ने लिखा कि नेतृत्व चयन की प्रक्रिया अपारदर्शी है। फैसले छोटे गुट या एक व्यक्ति द्वारा लिए जाते हैं, जो विद्रोह से बचने के लिए वफादार रहते हैं। उन्होंने 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव लड़ने का अपना अनुभव साझा किया, जहां वे असफल रहे। थरूर ने कहा कि वंशवाद के कारण योग्य लोग पीछे छूट जाते हैं।

यह बयान राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रहा है। भाजपा ने तुरंत मौके का फायदा उठाया। प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने एक्स पर पोस्ट कर थरूर की तारीफ की। उन्होंने लिखा कि थरूर का लेख बहुत प्रासंगिक है, जिसमें उन्होंने भारत के नेपो किड राहुल गांधी और छोटे नेपो किड तेजस्वी यादव पर सीधा हमला बोला है। पूनावाला ने कहा कि यही कारण है कि कांग्रेस के नामदार चायवाले प्रधानमंत्री मोदी से नफरत करते हैं। भाजपा ने इसे विपक्ष पर तंज कसने का हथियार बना लिया। उन्होंने कहा कि एनडीए सरकार योग्यता पर चलती है, जबकि विपक्ष वंश पर। बिहार चुनाव में यह मुद्दा गरमाया हुआ है, जहां महागठबंधन में आरजेडी और अन्य दल वंशवादी छवि के हैं।

कांग्रेस के अंदर भी थरूर के बयान पर असहजता दिख रही है। पार्टी के कुछ नेता उन्हें फोन कर स्पष्टीकरण मांग रहे हैं। थरूर ने पहले भी विवादास्पद बयान दिए हैं। कुछ हफ्ते पहले भारत-पाकिस्तान संघर्ष और पहलगाम हमले पर उनके बयान पर विवाद हुआ था। तब पार्टी ने उन्हें फटकार लगाई थी। थरूर ने अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया यात्रा के बाद प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना की, जिस पर सवाल उठे। लेकिन थरूर ने साफ कहा कि वे पार्टी लाइन से अलग अपनी राय रखते हैं। उन्होंने कहा कि वंशवाद पर उनका लेख तथ्यों पर आधारित है, न कि किसी हमले पर।

भारतीय राजनीति में वंशवाद कोई नई समस्या नहीं है। स्वतंत्रता के बाद नेहरू परिवार ने कांग्रेस को मजबूत किया, लेकिन बाद में यह परंपरा बनी रही। आजादी के समय कई नेता स्वतंत्र थे, लेकिन समय के साथ परिवारों ने कब्जा जमा लिया। आजादी के 78 साल बाद भी 30 प्रतिशत से ज्यादा सांसद परिवार से आते हैं। असदुद्दीन ओवैसी, अखिलेश यादव, अभिषेक सिंहवी जैसे कई नाम हैं। भाजपा में भी वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह, अनुराग ठाकुर जैसे वंशवादी हैं। थरूर ने लेख में कहा कि वंशवाद पार्टियों को कमजोर करता है। हार के बावजूद नेता सत्ता में बने रहते हैं, जो लोकतंत्र को कमजोर करता है। उन्होंने सुझाव दिया कि पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र बढ़े, प्राइमरी चुनाव हों और योग्यता पर चयन हो।

विशेषज्ञों का कहना है कि थरूर का बयान साहसी है। राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा कि वंशवाद भारतीय लोकतंत्र की बड़ी बीमारी है। यह जनता को विकल्प नहीं देता। प्रोफेसर आशीष नंदी ने कहा कि नेहरू युग से यह शुरू हुआ, लेकिन अब सभी दल इससे ग्रस्त हैं। थरूर ने लेख में उदाहरण दिए कि वंशवादी नेता ग्रासरूट से दूर रहते हैं। वे जनता की बजाय परिवार की रक्षा करते हैं। थरूर ने कहा कि भारत को अमेरिका या ब्रिटेन जैसी प्रणाली अपनानी चाहिए, जहां योग्यता प्रधान है। लेकिन भारत की जटिल सामाजिक संरचना में यह आसान नहीं। जाति, धर्म और क्षेत्रवाद वंशवाद को बढ़ावा देते हैं।

बिहार चुनाव के संदर्भ में थरूर का लेख समय पर आया। बिहार में तेजस्वी यादव लालू परिवार से हैं। महागठबंधन में कई वंशवादी चेहरे हैं। एनडीए ने इसे मुद्दा बनाया। नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार को सुशासन चाहिए, न कि वंशवाद। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेता भी वोट साध रहे हैं। थरूर का बयान विपक्ष को नुकसान पहुंचा सकता है। कांग्रेस ने इसे नजरअंदाज करने की कोशिश की। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि थरूर की राय उनकी निजी है। लेकिन सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। लाखों यूजर्स थरूर के लेख को शेयर कर रहे हैं। कुछ ने कहा कि थरूर खुद कांग्रेस में वंशवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं।

थरूर का राजनीतिक सफर दिलचस्प रहा है। वे थिरुवनंतपुरम से सांसद हैं। 2009 से लगातार जीतते आ रहे हैं। पूर्व कूटनीतिज्ञ होने से उनकी वैश्विक छवि है। 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव लड़कर वे सुर्खियों में आए। थरूर ने कहा कि वे पार्टी को मजबूत बनाना चाहते हैं। लेकिन वंशवाद पर उनका रुख साफ है। उन्होंने पहले भी कहा था कि पार्टियां कंपनियों जैसी हो गई हैं, जहां परिवार ही मालिक होता है। थरूर ने लेख के अंत में अपील की कि युवा नेता आगे आएं। जनता वोट से बदलाव लाए।

यह बयान राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकता है। 2024 लोकसभा चुनाव में वंशवाद मुद्दा रहा। अब 2025 के विधानसभा चुनावों में यह फिर उभरेगा। विशेषज्ञ कहते हैं कि वंशवाद के कारण राजनीति में नई सोच की कमी है। भ्रष्टाचार और अक्षमता बढ़ती है। थरूर ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता जनता की होनी चाहिए, न कि परिवार की। उनका यह कदम सराहनीय है, लेकिन कांग्रेस में उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है। फिर भी, थरूर ने साबित किया कि वे विचारों के सिपाही हैं।

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