हरदोई जिला अस्पताल में बिजली कटौती का कहर: गर्मी में मरीजों का हाल बेहाल, टॉर्च की रोशनी में इलाज।
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में मेडिकल कॉलेज के अधीन संचालित जिला अस्पताल की स्थिति इन दिनों बेहद चिंताजनक बनी हुई है। भीषण ...
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में मेडिकल कॉलेज के अधीन संचालित जिला अस्पताल की स्थिति इन दिनों बेहद चिंताजनक बनी हुई है। भीषण गर्मी और लगातार बिजली कटौती ने मरीजों और उनके तीमारदारों को दोहरी मार झेलने पर मजबूर कर दिया है। अस्पताल में जेनरेटर और इंवर्टर जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने के कारण मरीजों को गर्मी से राहत देने के लिए परिजनों को हाथ से पंखा झलना पड़ रहा है। स्थिति इतनी गंभीर है कि मरीजों का इलाज टॉर्च और मोबाइल की रोशनी में किया जा रहा है। इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर सवाल उठने लगे हैं।
20 जून 2025 की रात हरदोई जिला अस्पताल में उस समय हड़कंप मच गया, जब आंधी और बारिश के कारण अस्पताल की बिजली आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई। यह घटना मंगलवार रात की है, जब बिजली कटौती ने अस्पताल के पीडियाट्रिक वार्ड, आईसीयू, और नवजात गहन चिकित्सा कक्ष (एनआईसीयू) को अंधेरे में डुबो दिया। अस्पताल में बैकअप के लिए जेनरेटर या इंवर्टर की कोई व्यवस्था नहीं थी, जिसके कारण मरीजों को भीषण गर्मी में तड़पना पड़ा।
स्थानीय सपा नेता और समाजवादी व्यापार सभा के प्रदेश सचिव रामज्ञान गुप्ता ने इस स्थिति का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा किया, जो देखते ही देखते वायरल हो गया। वीडियो में दिख रहा है कि तीमारदार अपने मरीजों को गर्मी से राहत देने के लिए हाथ से पंखा झल रहे हैं, जबकि कुछ लोग टॉर्च और मोबाइल की रोशनी में मरीजों की देखभाल कर रहे हैं। पीडियाट्रिक वार्ड में भर्ती बच्चे गर्मी से बिलबिला रहे थे, और नवजात शिशुओं की हालत भी नाजुक थी।
- बदहाली के कारण
यह स्थिति कोई नई बात नहीं है। अस्पताल पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहा है। प्रमुख कारणों में शामिल हैं:
बिजली कटौती और बैकअप की कमी: अस्पताल में 24 घंटे बिजली आपूर्ति के लिए रिजर्व फीडर होने के बावजूद, बिजली कटौती की समस्या बनी रहती है। जेनरेटर या तो खराब हैं या उनके संचालन के लिए ईंधन उपलब्ध नहीं है। इंवर्टर भी केवल कुछ लाइटें चला पाते हैं, जो गंभीर वार्डों की जरूरतों के लिए अपर्याप्त हैं।
अस्पताल का अपूर्ण ढांचा: हरदोई जिला अस्पताल अब मेडिकल कॉलेज के अधीन है, लेकिन इसका बुनियादी ढांचा अभी तक पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है। ऑपरेशन थिएटर और सर्जिकल वार्ड तोड़ दिए गए थे, और नए निर्माण की प्रक्रिया धीमी है। पंखे और एयर कंडीशनर जैसे उपकरण या तो खराब हैं या अपर्याप्त हैं।
प्रशासनिक उदासीनता: मरीजों और तीमारदारों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर रहा है। बिजली कटौती के दौरान कोई अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा, और न ही कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया।
डॉक्टरों और संसाधनों की कमी: अस्पताल में डॉक्टरों की कमी और समय पर उनकी अनुपस्थिति भी एक बड़ी समस्या है। मरीजों को अक्सर रेफर कर दिया जाता है, जिसके कारण गंभीर मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।
इस बिजली कटौती का सबसे ज्यादा असर पीडियाट्रिक वार्ड, आईसीयू, और एनआईसीयू पर पड़ा। पीडियाट्रिक वार्ड में भर्ती बच्चों को गर्मी के कारण सांस लेने में तकलीफ हुई, और तीमारदारों को उन्हें हाथ से पंखा झलना पड़ा। एनआईसीयू में चारों एयर कंडीशनर बंद थे, जिसके कारण नवजात शिशुओं की स्थिति बिगड़ने लगी। परिजनों के विरोध के बाद स्टाफ ने दो एसी की सर्विसिंग करवाई, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था।
आईसीयू में जिंदगी और मौत से जूझ रहे मरीजों को भीषण गर्मी और अंधेरे में समय बिताना पड़ा। सर्जिकल वार्ड में भी मरीजों को मोबाइल और टॉर्च की रोशनी में इलाज दिया गया। इन हालातों ने न केवल मरीजों के स्वास्थ्य को खतरे में डाला, बल्कि तीमारदारों और डॉक्टरों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।
वायरल वीडियो ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं। X पर कई यूजर्स ने योगी सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने वीडियो साझा करते हुए सरकार की आलोचना की। कांग्रेस ने लिखा, "ये है 4 ट्रिलियन इकॉनमी की सच्चाई। प्रचार पर करोड़ों खर्च, लेकिन जमीन पर ढेले भर का काम नहीं।" वहीं, आप ने कहा, "योगी जी, हर रोज मरीजों की मौत हो रही है, आपको फर्क क्यों नहीं पड़ता?"
सपा नेता रामज्ञान गुप्ता ने स्वास्थ्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके गृह जनपद में ही स्वास्थ्य सेवाएं इतनी बदहाल हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर स्थिति नहीं सुधरी, तो सपा सड़कों पर उतरेगी।
इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई करता है, जबकि वास्तविक स्थिति में सुधार नहीं हो रहा। बृजेश पाठक ने पहले भी हरदोई में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने का वादा किया था, लेकिन ये वादे हकीकत में नहीं बदले।
- मरीजों और तीमारदारों की पीड़ा
मरीजों और उनके परिजनों की स्थिति सबसे दयनीय है। एक तीमारदार ने बताया, "हम बच्चे को लेकर आए थे, लेकिन गर्मी और अंधेरे में उसकी हालत और खराब हो गई। न पंखा चला, न लाइट थी। हमें टॉर्च से देखना पड़ा कि बच्चा सांस ले रहा है या नहीं।" एक अन्य परिजन ने कहा, "अस्पताल में कोई व्यवस्था नहीं है। डॉक्टर समय पर नहीं आते, और बिजली चली जाए तो हालात और बदतर हो जाते हैं।"
- स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली
हरदोई जिला अस्पताल की यह स्थिति उत्तर प्रदेश के कई अन्य अस्पतालों की भी झलक है। गर्मी के मौसम में बिजली कटौती ने पूरे राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित किया है। बुलंदशहर, झांसी, और अन्य जिलों में भी ऐसी ही खबरें सामने आई हैं। यह स्थिति तब और गंभीर है, जब राज्य में स्वास्थ्य मंत्री खुद हरदोई से हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए तत्काल और दीर्घकालिक कदम उठाने की जरूरत है:
बिजली बैकअप की व्यवस्था: अस्पताल में 24x7 बिजली आपूर्ति के लिए विश्वसनीय जेनरेटर और इंवर्टर लगाए जाएं। इनके रखरखाव और ईंधन की नियमित जांच हो।
ढांचागत सुधार: मेडिकल कॉलेज के निर्माण को तेज किया जाए। पंखे, एसी, और अन्य उपकरणों की पर्याप्त व्यवस्था हो।
प्रशासनिक जवाबदेही: बिजली कटौती के दौरान तुरंत कार्रवाई के लिए एक आपातकालीन प्रोटोकॉल बनाया जाए। अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
जागरूकता और संसाधन: मरीजों और तीमारदारों को ऐसी स्थिति में शांत रहने की सलाह दी जाए। डॉक्टरों और स्टाफ की संख्या बढ़ाई जाए।
निगरानी तंत्र: सोशल मीडिया और स्थानीय शिकायतों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए एक विशेष सेल बनाया जाए।
हरदोई जिला अस्पताल में बिजली कटौती और गर्मी से मरीजों की बदहाली स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर खामियों को उजागर करती है। टॉर्च की रोशनी में इलाज और हाथ से पंखा झलने की मजबूरी न केवल मरीजों के लिए खतरनाक है, बल्कि यह सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाती है। यह घटना एक चेतावनी है कि अगर स्वास्थ्य सेवाओं को समय पर दुरुस्त नहीं किया गया, तो ऐसी स्थिति बार-बार सामने आएगी। सरकार, प्रशासन, और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हर मरीज को सम्मानजनक और सुरक्षित इलाज मिले।
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