बिना इंटरनेट वाले सस्ते रिचार्ज प्लान की तैयारी: ट्राई ने टेलीकॉम कंपनियों के लिए जारी किया नया प्रस्ताव।
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने हाल ही में दूरसंचार उपभोक्ता संरक्षण (तेरहवां संशोधन) विनियम, 2026 का मसौदा जारी
- उपभोक्ताओं को मिलेगी जबरदस्ती के डेटा खर्च से मुक्ति: केवल कॉलिंग और एसएमएस वाले प्लान होंगे अनिवार्य
- समान वैधता और कम कीमत का नया फॉर्मूला: मोबाइल बिल घटाने के लिए नियामक प्राधिकरण ने उठाया बड़ा कदम
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने हाल ही में दूरसंचार उपभोक्ता संरक्षण (तेरहवां संशोधन) विनियम, 2026 का मसौदा जारी किया है। इस मसौदे का मुख्य उद्देश्य मोबाइल उपयोगकर्ताओं को उन सेवाओं के लिए भुगतान करने से बचाना है जिनका वे उपयोग नहीं करते हैं। वर्तमान में, अधिकांश टेलीकॉम कंपनियां अपने रिचार्ज कूपन या विशेष टैरिफ वाउचर (STV) में वॉयस कॉलिंग, एसएमएस और डेटा को एक साथ बंडल करके बेचती हैं। इसके कारण उन ग्राहकों को भी डेटा का पैसा देना पड़ता है जो केवल बुनियादी फोन या फीचर फोन का उपयोग करते हैं और जिन्हें इंटरनेट की कोई आवश्यकता नहीं होती। ट्राई ने अब यह अनिवार्य करने का सुझाव दिया है कि हर उस प्लान के साथ जिसमें डेटा शामिल है, कंपनियों को एक ऐसा वैकल्पिक प्लान भी देना होगा जिसमें केवल कॉलिंग और एसएमएस की सुविधा हो।
नियामक संस्था ने अपनी जांच में यह पाया कि पिछले कुछ समय में कंपनियों ने कुछ 'वॉयस-ओनली' प्लान पेश तो किए थे, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम थी और उनकी कीमतें भी तुलनात्मक रूप से काफी अधिक रखी गई थीं। ट्राई का मानना है कि डेटा हटाने के बाद जो लागत कम होती है, उसका लाभ सीधे ग्राहकों को मिलना चाहिए। प्रस्तावित नियमों के अनुसार, यदि कोई कंपनी 28 दिन या 84 दिन की वैधता वाला डेटा बंडल प्लान पेश करती है, तो उसे उसी समान वैधता अवधि का एक शुद्ध कॉलिंग और एसएमएस वाला प्लान भी लाना होगा। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और ग्राहकों को यह चुनने का अधिकार मिलेगा कि वे अपनी मेहनत की कमाई किस सेवा पर खर्च करना चाहते हैं। ट्राई ने इस प्रस्ताव पर सभी संबंधित पक्षों और स्टेकहोल्डर्स से 28 अप्रैल, 2026 तक अपनी राय और सुझाव मांगे हैं। इन सुझावों की समीक्षा के बाद अंतिम नियमों को अधिसूचित किया जाएगा, जिसके बाद सभी टेलीकॉम कंपनियों को अपने टैरिफ पोर्टफोलियो में बदलाव करना होगा।
इस पहल का सबसे बड़ा लाभ देश के उन करोड़ों फीचर फोन उपयोगकर्ताओं को होगा जो मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं या वरिष्ठ नागरिक हैं। ऐसे उपयोगकर्ता अक्सर इंटरनेट का उपयोग नहीं करते हैं, लेकिन बाजार में उपलब्ध कॉम्बो पैक्स की वजह से उन्हें महंगे रिचार्ज कराने पड़ते हैं। ट्राई ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि बुनियादी संचार सेवाओं को किफायती बनाना डिजिटल समावेशन के लिए जरूरी है। यदि केवल कॉलिंग और एसएमएस वाले प्लान बाजार में आते हैं, तो इनकी कीमत मौजूदा डेटा-युक्त प्लान्स की तुलना में काफी कम होने की संभावना है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के बजट पर बोझ कम होगा।
डेटा के बढ़ते चलन के बीच भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो इंटरनेट के बजाय बेहतर कॉल क्वालिटी और निरंतर कनेक्टिविटी को प्राथमिकता देता है। नियामक ने यह देखा है कि कंपनियां अक्सर अपने डेटा आधारित प्लान्स को अधिक प्रमोट करती हैं, जिससे उपभोक्ताओं के पास सीमित विकल्प रह जाते हैं। नए प्रस्ताव के तहत, कंपनियों को अब 'आनुपातिक मूल्य निर्धारण' (Proportionate Pricing) का पालन करना पड़ सकता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर किसी प्लान से इंटरनेट सेवा को हटा दिया जाता है, तो उसकी कीमत में उसी अनुपात में कटौती की जानी चाहिए ताकि ग्राहक को उसकी बचत का वास्तविक लाभ मिल सके।
दूरसंचार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के बावजूद, पिछले कुछ समय में रिचार्ज की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। ट्राई के इस नए रुख से उन लोगों को भी फायदा होगा जो डुअल सिम (दो सिम कार्ड) का उपयोग करते हैं। कई बार लोग एक सिम का उपयोग केवल इनकमिंग कॉल्स या जरूरी मैसेज प्राप्त करने के लिए करते हैं, लेकिन वर्तमान नियमों के चलते उन्हें उस सिम को चालू रखने के लिए भी भारी-भरकम डेटा पैक लेना पड़ता है। यदि केवल कॉलिंग वाले सस्ते वाउचर बाजार में आते हैं, तो सेकेंडरी सिम को चालू रखना पहले की तुलना में काफी सस्ता और आसान हो जाएगा।
नियामक ने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि कंपनियां पहले जारी किए गए निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं कर रही थीं। पूर्व में भी ऐसी कोशिशें की गई थीं कि ग्राहकों को स्टैंडअलोन वॉयस पैक दिए जाएं, लेकिन बाजार में उनकी उपलब्धता न के बराबर थी। इस बार ट्राई ने नियमों को और कड़ा करने का मन बनाया है ताकि हर 'यूनिक वैलिडिटी पीरियड' के लिए एक विकल्प मौजूद हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई 365 दिन का डेटा पैक है, तो उसी अवधि का एक नॉन-डेटा पैक भी उपलब्ध कराना होगा। इससे बाजार में एक संतुलन पैदा होगा और कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगेगी।
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