Politics News: निशिकांत दुबे (Nishikant Dube) का सनसनीखेज आरोप- इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) सरकार ने 1968 में रन ऑफ कच्छ की 828 वर्ग किमी जमीन पाकिस्तान को सौंपी।
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद निशिकांत दुबे (Nishikant Dube) ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) और कांग्रेस पार्टी पर एक सनसनीखेज...
24 मई 2025 को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद निशिकांत दुबे (Nishikant Dube) ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) और कांग्रेस पार्टी पर एक सनसनीखेज आरोप लगाकर राजनीतिक हलचल मचा दी। उन्होंने दावा किया कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की जीत के बावजूद, इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सरकार ने 1968 में गुजरात के रन ऑफ कच्छ का 828 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पाकिस्तान को सौंप दिया। यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, और इस दावे ने न केवल ऐतिहासिक विवाद को फिर से जीवित कर दिया, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और नेतृत्व के मुद्दे पर तीखी बहस को जन्म दिया। दुबे के इस बयान ने कांग्रेस और बीजेपी के बीच एक नया सियासी विवाद खड़ा कर दिया है।
- निशिकांत दुबे (Nishikant Dube) का आरोप
निशिकांत दुबे (Nishikant Dube), जो झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद हैं, ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए यह दावा किया। उन्होंने लिखा, "आज की कहानी बहुत दर्दनाक है। @INCIndia पार्टी ने 1965 का युद्ध जीतने के बाद गुजरात के रन ऑफ कच्छ का 828 वर्ग किलोमीटर पाकिस्तान को 1968 में दे दिया। भारत-पाकिस्तान मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले गए, यूगोस्लाविया के वकील अली बाबर को मध्यस्थ बनाया। पूरी संसद ने इसका विरोध किया, लेकिन इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) 'आयरन लेडी' थीं, उन्होंने डर के मारे हमारा हिस्सा नीलाम कर दिया।"
दुबे ने अपने दावे का समर्थन करने के लिए एक दस्तावेज का हवाला दिया, जिसमें दावा किया गया कि यह फैसला संयुक्त राष्ट्र के तहत एक अंतरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल के बाद लिया गया था। उन्होंने इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) को 'आयरन लेडी' कहकर तंज कसा और आरोप लगाया कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुककर भारत की जमीन पाकिस्तान को सौंप दी। यह बयान कांग्रेस की उस छवि पर हमला है, जिसमें वह इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) को एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में प्रस्तुत करती है, खासकर 1971 के युद्ध में उनकी भूमिका के लिए।
- रन ऑफ कच्छ विवाद: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रन ऑफ कच्छ, गुजरात के कच्छ जिले में स्थित एक दलदली और बंजर क्षेत्र है, जो भारत और पाकिस्तान की सीमा पर है। यह क्षेत्र लंबे समय से दोनों देशों के बीच विवाद का विषय रहा है, खासकर सिर क्रीक के आसपास। 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध से पहले, अप्रैल-मई 1965 में रन ऑफ कच्छ में दोनों देशों की सेनाओं के बीच छोटे स्तर का सशस्त्र संघर्ष हुआ था। युद्ध के बाद, दोनों देशों ने इस क्षेत्र के सीमा विवाद को सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को स्वीकार किया।
1968 में, संयुक्त राष्ट्र के तहत एक अंतरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल ने भारत-पाकिस्तान पश्चिमी सीमा मामले की सुनवाई की। इस ट्राइब्यूनल ने फैसला सुनाया कि विवादित क्षेत्र का लगभग 90% हिस्सा भारत को मिलेगा, जबकि शेष 10%, यानी करीब 828 वर्ग किलोमीटर, पाकिस्तान को दिया जाएगा। यह फैसला ऐतिहासिक दावों और दस्तावेजों के आधार पर लिया गया था, जिसमें सिर क्रीक के आसपास की सीमा को स्पष्ट करने की कोशिश की गई थी। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच तनाव को कम करना और सीमा विवाद को स्थायी रूप से सुलझाना था।
- दुबे के आरोपों का विश्लेषण
निशिकांत दुबे (Nishikant Dube) का आरोप ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है, लेकिन इसमें उनकी अपनी व्याख्या और राजनीतिक रंग शामिल है। ट्राइब्यूनल का फैसला दोनों देशों की सहमति से लिया गया था, और यह उस समय भारत की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा था। इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को स्वीकार किया, क्योंकि यह युद्ध के बाद शांति स्थापित करने का एक तरीका था। हालांकि, दुबे ने इसे 'डर' और 'नीलामी' के रूप में प्रस्तुत किया, जो इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की छवि को कमजोर करने का प्रयास है।
दुबे ने यह भी दावा किया कि संसद ने इस फैसले का विरोध किया था, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं दिया कि विरोध कितना व्यापक था या इसका स्वरूप क्या था। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, ट्राइब्यूनल का फैसला भारत के लिए ज्यादातर अनुकूल था, क्योंकि 90% क्षेत्र भारत के पास रहा। फिर भी, दुबे ने इस 10% क्षेत्र के हस्तांतरण को राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया।
- कांग्रेस और बीजेपी के बीच तीखा विवाद
दुबे का यह बयान उस समय आया है, जब कांग्रेस अपनी पूर्व नेता इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की विरासत को राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत नेतृत्व के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। हाल ही में, कांग्रेस ने अपने मुख्यालय के बाहर "इंदिरा होना आसान नहीं" और "इंडिया मिसेज इंदिरा" जैसे नारे लगाए थे। इसके जवाब में, दुबे ने न केवल 1968 के रन ऑफ कच्छ मुद्दे को उठाया, बल्कि 1991 के एक अन्य समझौते का भी जिक्र किया, जिसमें भारत और पाकिस्तान ने सैन्य गतिविधियों की जानकारी साझा करने पर सहमति जताई थी। उन्होंने इसे भी कांग्रेस की 'पाकिस्तान के साथ साठगांठ' के रूप में प्रस्तुत किया।
कांग्रेस ने अभी तक दुबे के इन आरोपों का औपचारिक जवाब नहीं दिया है, लेकिन पार्टी ने पहले उनके बयानों को "गलत जानकारी" पर आधारित बताया है। उदाहरण के लिए, 1991 के समझौते को लेकर कांग्रेस ने कहा था कि यह शांतिकाल के लिए था और इसका ऑपरेशन सिंदूर जैसे हाल के सैन्य अभियानों से कोई संबंध नहीं है।
दुबे का यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा और ऐतिहासिक फैसलों को लेकर एक नई बहस को जन्म दे सकता है। रन ऑफ कच्छ का मुद्दा संवेदनशील है, क्योंकि यह भारत-पाकिस्तान संबंधों और सीमा विवादों से जुड़ा है। यह क्षेत्र आज भी सिर क्रीक के कारण विवाद का विषय बना हुआ है। दुबे का यह दावा कि इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने 'डर' के कारण जमीन सौंपी, कांग्रेस की छवि को कमजोर करने का प्रयास है, खासकर उस समय जब बीजेपी और कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर तीखी बयानबाजी चल रही है।
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सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ा है। कुछ यूजर्स ने दुबे के दावे का समर्थन किया, जबकि अन्य ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों का गलत चित्रण बताया। एक यूजर ने लिखा, "1965 की जीत के बाद भी जमीन देना शर्मनाक था। कांग्रेस को जवाब देना चाहिए।" वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा, "यह फैसला अंतरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल का था, इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने नहीं, बल्कि दोनों देशों ने इसे स्वीकार किया था।"
निशिकांत दुबे (Nishikant Dube) का यह आरोप कि इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सरकार ने 1968 में रन ऑफ कच्छ की 828 वर्ग किलोमीटर जमीन पाकिस्तान को सौंप दी, ऐतिहासिक तथ्यों और राजनीतिक रणनीति का मिश्रण है। हालांकि 1968 का ट्राइब्यूनल फैसला एक कूटनीतिक कदम था, जिसे भारत और पाकिस्तान दोनों ने स्वीकार किया था, दुबे ने इसे इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की कमजोरी के रूप में प्रस्तुत किया है। यह बयान कांग्रेस और बीजेपी के बीच चल रही सियासी जंग का हिस्सा है, जिसमें दोनों पार्टियां राष्ट्रीय सुरक्षा और नेतृत्व के मुद्दे पर एक-दूसरे पर निशाना साध रही हैं।
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