बारामती उपचुनाव में कांग्रेस ने खेला दांव, सुनेत्रा पवार के खिलाफ आकाश मोरे चुनौती देने को तैयार।
बारामती, जिसे दशकों से पवार परिवार का अभेद्य किला माना जाता रहा है, वहां इस बार परिस्थितियां काफी बदली हुई हैं। जनवरी 2026 में एक दुखद
- महाविकास अघाड़ी में पड़ी दरार? शरद पवार और उद्धव ठाकरे के समर्थन के बावजूद कांग्रेस ने उतारा अपना प्रत्याशी
- अजीत पवार की विरासत और सहानुभूति की लहर के बीच आकाश मोरे की एंट्री, रोचक हुआ सियासी समीकरण
बारामती, जिसे दशकों से पवार परिवार का अभेद्य किला माना जाता रहा है, वहां इस बार परिस्थितियां काफी बदली हुई हैं। जनवरी 2026 में एक दुखद विमान हादसे में अजीत पवार के निधन के बाद यह विधानसभा सीट रिक्त हुई थी। महायुति गठबंधन की ओर से अजीत पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार को उम्मीदवार बनाया गया है। सहानुभूति और पारिवारिक विरासत के आधार पर यह माना जा रहा था कि सुनेत्रा पवार के लिए यह रास्ता आसान होगा, लेकिन कांग्रेस द्वारा आकाश मोरे के नाम की घोषणा ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। कांग्रेस का यह कदम सीधे तौर पर उस परंपरा को चुनौती देता दिख रहा है जिसमें किसी नेता के निधन के बाद उसके परिवार के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने का शिष्टाचार निभाया जाता रहा है।
राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर दिख रही असहमति की है। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा (SP) ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे अजीत पवार के सम्मान में इस सीट पर अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करेंगे। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी इस उपचुनाव को निर्विरोध कराने के संकेतों का समर्थन किया था। इसके बावजूद, कांग्रेस आलाकमान ने मल्लिकार्जुन खड़गे की सहमति से आकाश मोरे के नाम पर मुहर लगा दी। यह निर्णय दर्शाता है कि कांग्रेस बारामती में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने और एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
आकाश मोरे कोई नया चेहरा नहीं हैं; वे पूर्व एमएलसी विजयराव मोरे के पुत्र हैं और कांग्रेस के एक समर्पित कार्यकर्ता माने जाते हैं। पेशे से वकील आकाश मोरे ने इससे पहले 2014 के विधानसभा चुनाव में भी अजीत पवार के खिलाफ चुनाव लड़ा था। हालांकि उस समय वे अपनी जमानत नहीं बचा पाए थे, लेकिन पार्टी ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया है। मोरे का संबंध धनगर समुदाय से है, जिसकी बारामती निर्वाचन क्षेत्र में अच्छी-खासी आबादी है। कांग्रेस की रणनीति साफ तौर पर स्थानीय जातीय समीकरणों को साधने और उन मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की है जो पवार परिवार के वर्चस्व से हटकर विकल्प तलाश रहे हैं।
आकाश मोरे की कड़ी शर्त
उम्मीदवारी की घोषणा के बाद आकाश मोरे ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अजीत पवार की दुर्घटना को कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। उन्होंने चुनौती दी कि यदि राज्य सरकार इस हादसे के संबंध में केस दर्ज करती है, तो वे तुरंत अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे। उनका यह बयान सीधे तौर पर सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है।
दूसरी ओर, सुनेत्रा पवार ने इस चुनाव को निर्विरोध संपन्न कराने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रयास किए थे। उन्होंने महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे से फोन पर बात कर समर्थन मांगा था। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी विपक्षी दलों से अपील की थी कि वे महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति का सम्मान करें और इस उपचुनाव में सुनेत्रा पवार का विरोध न करें। हालांकि, कांग्रेस ने इन अपीलों को दरकिनार करते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का फैसला किया। सुनेत्रा पवार के लिए यह पहली विधानसभा चुनावी जंग होगी, जबकि वे वर्तमान में राज्यसभा की सदस्य हैं।
बारामती का चुनावी इतिहास हमेशा से पवार परिवार के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। 1967 से शरद पवार ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और उनके बाद अजीत पवार ने लगातार आठ बार यहाँ से जीत दर्ज की। 2019 के चुनाव में अजीत पवार ने 1.65 लाख वोटों के रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी। लेकिन हालिया लोकसभा चुनावों में पवार परिवार के भीतर जो फूट दिखी, उसने यहाँ की जनता को भी बांट दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सुप्रिया सुले ने सुनेत्रा पवार को इसी क्षेत्र में मात दी थी। अब विधानसभा उपचुनाव में सुनेत्रा पवार के सामने अपनी साख बचाने और पति की विरासत को आगे बढ़ाने की बड़ी जिम्मेदारी है।
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