दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया पीएम मोदी की डिग्री खुलासे का आदेश, निजी जानकारी मानते हुए CIC के निर्देश को खारिज किया। 

Politics: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से संबंधित

By INA News Desk
Aug 26, 2025 - 15:13
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दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया पीएम मोदी की डिग्री खुलासे का आदेश, निजी जानकारी मानते हुए CIC के निर्देश को खारिज किया। 
दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया पीएम मोदी की डिग्री खुलासे का आदेश, निजी जानकारी मानते हुए CIC के निर्देश को खारिज किया। 
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दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शैक्षणिक डिग्री निजी जानकारी है, और इसे केवल जनहित के लिए सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। इस मामले में दिल्ली यूनिवर्सिटी ने CIC के आदेश को चुनौती दी थी, जिसके बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। यह मामला 2016 में शुरू हुआ, जब RTI कार्यकर्ता नीरज शर्मा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से 1978 के बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) के सभी छात्रों के रिकॉर्ड की जानकारी मांगी थी। यह वही साल है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी BA की डिग्री हासिल की थी। नीरज ने अपनी RTI याचिका में सभी छात्रों के नाम, रोल नंबर, पिता का नाम, और अंकों की जानकारी मांगी थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट्रल पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर (CPIO) ने इस अनुरोध को यह कहकर खारिज कर दिया कि यह तीसरे पक्ष की जानकारी है, जिसे RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। इसके बाद नीरज ने CIC में अपील की, और 21 दिसंबर 2016 को CIC ने दिल्ली यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि वह 1978 के BA पास करने वाले सभी छात्रों के रजिस्टर की जांच की अनुमति दे।

CIC ने अपने आदेश में कहा था कि विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक संस्था है, और डिग्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक दस्तावेजों का हिस्सा है। CIC का तर्क था कि छात्रों की शैक्षणिक जानकारी, चाहे वह वर्तमान हो या पूर्व छात्रों की, सार्वजनिक डोमेन में आती है। इस आदेश के खिलाफ दिल्ली यूनिवर्सिटी ने 2017 में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की। यूनिवर्सिटी ने तर्क दिया कि छात्रों की जानकारी गोपनीय होती है और इसे विश्वास के आधार पर रखा जाता है। यूनिवर्सिटी ने यह भी कहा कि इस तरह की जानकारी का खुलासा करने से सभी विश्वविद्यालयों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि उनके पास करोड़ों छात्रों की डिग्री और निजी जानकारी होती है। 23 जनवरी 2017 को दिल्ली हाई कोर्ट ने पहली सुनवाई में ही CIC के आदेश पर रोक लगा दी। इस मामले में सुनवाई लंबे समय तक चली, और 27 फरवरी 2025 को कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। 25 अगस्त 2025 को जस्टिस सचिन दत्ता ने 175 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक रिकॉर्ड, जैसे डिग्री और मार्कशीट, निजी जानकारी के दायरे में आते हैं। जस्टिस दत्ता ने स्पष्ट किया कि “जनता के लिए रुचिकर होना” और “जनहित में होना” दो अलग-अलग चीजें हैं। उन्होंने कहा कि केवल इसलिए कि कोई जानकारी किसी सार्वजनिक व्यक्ति से संबंधित है, इसका मतलब यह नहीं कि उसकी निजता के अधिकार खत्म हो जाते हैं।

जस्टिस दत्ता ने अपने फैसले में कहा कि RTI एक्ट का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना है, न कि सनसनीखेज जानकारी या जिज्ञासा को बढ़ावा देना। कोर्ट ने यह भी बताया कि विश्वविद्यालय का अपने छात्रों के प्रति गोपनीयता का कर्तव्य होता है, जैसे कि डॉक्टर-मरीज या वकील-क्लाइंट के रिश्ते में होता है। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसी जानकारी का खुलासा बिना ठोस जनहित के किया गया, तो इससे अनावश्यक मांगें बढ़ सकती हैं, जो जिज्ञासा या सनसनीखेज मकसदों से प्रेरित हो सकती हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में तर्क दिया कि RTI के तहत जानकारी मांगने का अधिकार असीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि निजता का अधिकार जानकारी के अधिकार से ऊपर है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के पुट्टस्वामी मामले में कहा था। मेहता ने यह भी बताया कि यूनिवर्सिटी के पास 1978 में नरेंद्र मोदी की BA डिग्री का रिकॉर्ड मौजूद है, और वह इसे कोर्ट को दिखाने के लिए तैयार है। हालांकि, उन्होंने जोर दिया कि इस जानकारी को “अजनबियों” के लिए सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। मेहता ने कहा कि ऐसी जानकारी का खुलासा करने से प्रचार या राजनीतिक मकसदों से प्रेरित अनुरोध बढ़ सकते हैं।

RTI याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री जैसे सार्वजनिक व्यक्ति की शैक्षणिक जानकारी जनहित में हो सकती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय पहले भी डिग्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करते थे, जैसे कि नोटिस बोर्ड, वेबसाइट, या अखबारों के माध्यम से। हालांकि, कोर्ट ने उनके तर्क को खारिज करते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी की याचिका को स्वीकार कर लिया। इस मामले ने राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचाई। आम आदमी पार्टी (AAP) और अन्य विपक्षी दलों ने पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाए थे। 2016 में तत्कालीन दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से उनकी डिग्री की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए थे। कांग्रेस ने भी इस फैसले पर प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस के संचार प्रमुख जयराम रमेश ने X पर लिखा, “यह समझ से परे है कि प्रधानमंत्री की डिग्री की जानकारी को पूरी तरह गुप्त क्यों रखा जा रहा है, जबकि अन्य स्नातकों की जानकारी हमेशा सार्वजनिक रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि RTI एक्ट में 2019 में किए गए संशोधनों का मकसद ऐसी जानकारी को रोकना था।

यह विवाद केवल दिल्ली यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं रहा। 2023 में गुजरात हाई कोर्ट ने भी एक समान CIC आदेश को रद्द किया था, जिसमें गुजरात यूनिवर्सिटी को नरेंद्र मोदी की 1983 की MA डिग्री की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था। उस मामले में भी कोर्ट ने शैक्षणिक रिकॉर्ड को निजी जानकारी माना था। दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले ने निजता और पारदर्शिता के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण पेश किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि RTI एक्ट का मकसद सार्वजनिक हित को बढ़ावा देना है, लेकिन इसका दुरुपयोग जिज्ञासा या सनसनीखेज मकसदों के लिए नहीं किया जा सकता। इस फैसले से उन लोगों को राहत मिली है, जो मानते हैं कि निजी जानकारी की गोपनीयता बरकरार रखी जानी चाहिए। हालांकि, इस फैसले ने कुछ सवाल भी खड़े किए हैं। कई लोगों का मानना है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की शैक्षणिक योग्यता जनहित में हो सकती है, खासकर अगर वह उनकी पात्रता से जुड़ी हो। लेकिन कोर्ट ने कहा कि चूंकि BA डिग्री प्रधानमंत्री के पद के लिए कोई अनिवार्य शर्त नहीं है, इसलिए इसे सार्वजनिक करने का कोई जनहित नहीं है।

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