भारतीय सिनेमा के ‘शो मैन’ का रसूख भी पड़ गया था फीका, जब FTII के निदेशक गिरीश कारनाड ने ठुकरा दी थी राज कपूर की सिफारिश

भारतीय रंगमंच, साहित्य और समानांतर सिनेमा के इतिहास में ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता नाटककार, अद्वितीय अभिनेता और कुशल

Jun 10, 2026 - 13:19
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भारतीय सिनेमा के ‘शो मैन’ का रसूख भी पड़ गया था फीका, जब FTII के निदेशक गिरीश कारनाड ने ठुकरा दी थी राज कपूर की सिफारिश
भारतीय सिनेमा के ‘शो मैन’ का रसूख भी पड़ गया था फीका, जब FTII के निदेशक गिरीश कारनाड ने ठुकरा दी थी राज कपूर की सिफारिश
  • सिद्धांतों और नियमों से समझौता न करने वाले महान नाटककार की पुण्यतिथि पर विशेष, संस्मरणों के पन्नों से बाहर आया ऐतिहासिक प्रसंग
  • नीली आंखों वाले युवक के आवेदन के साथ लगे थे कई दिग्गज निर्माताओं के अनुशंसा पत्र, पर प्रतिभा के तराजू पर अडिग रहे बहुमुखी प्रतिभा के धनी कारनाड

भारतीय रंगमंच, साहित्य और समानांतर सिनेमा के इतिहास में ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता नाटककार, अद्वितीय अभिनेता और कुशल फिल्म निर्देशक गिरीश कारनाड का नाम एक ऐसे स्तंभ के रूप में स्थापित है, जिन्होंने कभी भी अपने जीवन में नैतिक मूल्यों और प्रशासनिक सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। आज के दिन यानी 10 जून को देश इस महान रचनाकार को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रहा है, जिन्होंने भारतीय कला जगत को एक नई और प्रगतिशील दिशा दी थी। गिरीश कारनाड केवल अपनी साहित्यिक कृतियों जैसे 'ययाति', 'तुगलक' और 'हयवदन' के लिए ही नहीं जाने जाते थे, बल्कि उनके भीतर एक बेहद ईमानदार और सख्त प्रशासक भी छिपा हुआ था। उनके इसी मजबूत व्यक्तित्व की गवाही देता है उनका वह प्रसिद्ध संस्मरण, जब वे फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII) पुणे के निदेशक के पद पर तैनात थे और उन्होंने हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े नाम यानी राज कपूर की एक बेहद खास सिफारिश को बिना किसी झिझक के पूरी तरह से खारिज कर दिया था। इस घटना ने उस दौर में फिल्म जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों को अचंभित कर दिया था क्योंकि तब 'शो मैन' राज कपूर की बात को टालने का साहस पूरी इंडस्ट्री में किसी के पास नहीं माना जाता था।

गिरीश कारनाड का जन्म 19 मई 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में हुआ था और उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान ही बौद्धिक श्रेष्ठता साबित कर दी थी, जब उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से प्रतिष्ठित रोड्स स्कॉलर के रूप में चुना गया था। वहां से पढ़ाई पूरी कर भारत लौटने के बाद उन्होंने कन्नड़ साहित्य और भारतीय रंगमंच को 'नागमंडल' और 'उत्सव' जैसी फिल्मों व नाटकों से समृद्ध किया। वर्ष 1974-75 के दौरान जब भारतीय सिनेमा अपने बदलाव के दौर से गुजर रहा था, तब गिरीश कारनाड को पुणे स्थित फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII) का निदेशक नियुक्त किया गया था। इस प्रतिष्ठित संस्थान के मुखिया के तौर पर उनके सामने अभिनय और निर्देशन के क्षेत्र में आने वाले देश भर के सर्वश्रेष्ठ युवाओं को चुनने की बड़ी जिम्मेदारी थी। इसी दौरान संस्थान के भीतर एक ऐसा अनूठा वाकया पेश आया जिसने यह सिद्ध कर दिया कि कारनाड के लिए कलात्मक प्रतिभा और योग्यता ही एकमात्र कसौटी थी, न कि किसी बड़े बैनर का नाम या रसूख।

इस ऐतिहासिक और बेहद दिलचस्प प्रसंग का विस्तृत वर्णन गिरीश कारनाड द्वारा मूल रूप से कन्नड़ भाषा में लिखे गए उनके संस्मरणों में मिलता है, जिसका बाद में अंग्रेजी में अनुवाद हुआ और हिंदी में यह बहुचर्चित कृति 'खेल-खेल में बीता जीवन' नाम से पाठकों के बीच आई। इस किताब के पन्नों के अनुसार, उन दिनों संस्थान में अभिनय पाठ्यक्रम (एक्टिंग कोर्स) के लिए नए छात्रों के दाखिले की प्रक्रिया चल रही थी और देश भर से आए सैकड़ों आवेदकों का साक्षात्कार लिया जा रहा था। इसी बैच में दिलीप धवन नाम का एक युवा भी शामिल था, जिसकी शारीरिक बनावट और रूप-रंग बेहद आकर्षक था। नीली आँखों और एक पारंपरिक हीरो जैसे चेहरे वाले इस युवक को लेकर संस्थान के कुछ प्रोफेसर काफी आशान्वित थे, लेकिन जब साक्षात्कार का मुख्य चरण शुरू हुआ, तो चयन समिति के सामने उसकी वास्तविक कलात्मक प्रतिभा उस स्तर की नहीं पाई गई जो संस्थान के उच्च मानकों के अनुकूल हो।

सिफारिशों का भारी वजन और योग्यता की कसौटी किसी भी बड़े संस्थान में जब किसी रसूखदार नाम की सिफारिश आती है, तो प्रशासनिक तंत्र पर एक अदृश्य दबाव बन जाता है। इस मामले में भी आवेदक के पास फिल्म उद्योग के सबसे बड़े साम्राज्य की अनुशंसा थी। लेकिन गिरीश कारनाड जैसे दूरदर्शी मार्गदर्शक के लिए किसी भी संस्थान की साख उसके नियमों की निष्पक्षता से तय होती थी, न कि बाहरी दुनिया के रसूख से।

साक्षात्कार के समय जब युवक में कोई विशेष या असाधारण अभिनय प्रतिभा दिखाई नहीं दी, तो चयन समिति के अधिकांश सदस्य उसे उस वर्ष के मुख्य बैच में रखने के पक्ष में नहीं थे। हालांकि, संस्थान के वरिष्ठ प्रोफेसर तनेजा ने उस लड़के के पक्ष में दाखिले के लिए काफी प्रतिवाद किया और दलीलें दीं क्योंकि उस उम्मीदवार के आवेदन पत्र की पृष्ठभूमि बहुत असाधारण थी। वास्तव में, दिलीप धवन के आवेदन पत्र के साथ भारतीय फिल्म उद्योग के करीब तेरह सबसे प्रमुख और दिग्गज फिल्म निर्माताओं के मजबूत सिफारिश-पत्र संलग्न थे, जिनमें सबसे प्रमुख और वजनदार अनुशंसा-पत्र खुद राज कपूर के हाथों से लिखा हुआ था। प्रोफेसर तनेजा का मानना था कि यदि इतने सारे वरिष्ठ और सम्मानित फिल्म निर्माताओं की लिखित अनुशंसा को सीधे तौर पर खारिज किया जाता है, तो इसे फिल्म जगत के उन दिग्गजों का अपमान माना जा सकता है जो संस्थान को लगातार अपना सहयोग देते आए हैं।

इस जटिल प्रशासनिक और कूटनीतिक स्थिति से बचने के लिए प्रोफेसर तनेजा ने निदेशक गिरीश कारनाड को बीच का रास्ता निकालते हुए एक व्यावहारिक सलाह दी कि यदि इस लड़के को सीधे तौर पर मुख्य सूची में दाखिला नहीं दिया जा सकता, तो कम से कम इसे प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में ग्यारहवें स्थान पर तो रखा ही जा सकता है। इसी बीच, संस्थान के उप-निदेशक सी.वी. गोपाल ने भी इस मामले में अपनी प्रशासनिक राय साझा करते हुए कारनाड को चेतावनी भरे लहजे में आगाह किया था। उनका कहना था कि संस्थान को या तो इस लड़के को पूरी तरह से स्वीकार कर लेना चाहिए या फिर पूरी दृढ़ता से अस्वीकार कर देना चाहिए, क्योंकि प्रतीक्षा सूची में ग्यारहवें स्थान पर रखने जैसा अव्यवस्थित और अस्पष्ट नियम लागू करने से संस्थान के भीतर एक गलत परंपरा शुरू हो सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि लड़के का नाम केवल आंतरिक फाइलों में रहने दिया जाए और बाहर जाकर किसी भी तरह की औपचारिक घोषणा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

गिरीश कारनाड ने अपने सहयोगियों की तमाम आशंकाओं, कूटनीतिक दबावों और राज कपूर जैसे महान फिल्मकार के रसूख को पूरी तरह दरकिनार करते हुए योग्यता के नियमों को ही सर्वोपरि माना। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उस आवेदन को खारिज करने का साहसिक फैसला लिया जो पूरी तरह से सिफारिशों के दम पर संस्थान में प्रवेश पाना चाहता था। कारनाड का यह स्पष्ट मानना था कि FTII जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में केवल और केवल वास्तविक प्रतिभा, अभिनय की समझ और कला के प्रति समर्पण को ही प्रवेश का आधार बनाया जाना चाहिए, न कि फिल्म इंडस्ट्री के बड़े नामों के पत्रों को। उनका यह कड़ा और निष्पक्ष फैसला इस बात का प्रमाण था कि वे अपने सिद्धांतों के आगे किसी भी प्रकार के 'शो मैन' के रुतबे से कतई नहीं घबराते थे। इस फैसले के बाद फिल्म जगत में उनके इस सख्त और आदर्शवादी रुख की लंबे समय तक चर्चा होती रही।

81 वर्ष की दीर्घायु में 10 जून 2019 को बेंगलुरु में अंतिम सांस लेने वाले गिरीश कारनाड आज भले ही हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन कला और प्रशासन के क्षेत्र में उनके द्वारा स्थापित किए गए ये उच्च मानदंड आज भी प्रासंगिक हैं। उनका पूरा जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक सच्चा कलाकार और लेखक केवल अपनी रचनाओं से ही महान नहीं बनता, बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने अपने नैतिक आचरण से भी अपनी महानता को सिद्ध करता है। राज कपूर की सिफारिश को ठुकराने का यह प्रसंग आज की युवा पीढ़ी और कला जगत के नीति-निर्धारकों के लिए एक बड़ी सीख है कि संस्थाओं की गरिमा को बनाए रखने के लिए रसूख के आगे घुटने टेकने के बजाय नियमों और ईमानदारी के मार्ग पर चलना कितना आवश्यक है।

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