Noida Protest and Voilence : 300 गिरफ्तारियों और 7 एफआईआर के बीच अब 'मास्टरमाइंड' की तलाश, औद्योगिक शांति के लिए कड़े कदम
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में प्रशासन की शिथिलता को लेकर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उनके निर्देश पर गठित हाई-लेवल कमेटी ने अब तक की जांच में यह पाया है कि यदि समय रहते श्रमिकों के शुरुआती असंतोष को गंभीरता से लेकर वार्ता की
- नोएडा हिंसा के पीछे की सुलगती चिंगारी: खुफिया तंत्र की नाकामी और चार दिन की वह अनसुनी आहट
- प्रशासनिक चूक या सोची-समझी साजिश: व्हाट्सएप ग्रुपों के मायाजाल में कैसे फंसा औद्योगिक शहर और जल उठा नोएडा
नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में सोमवार को जो भयावह मंजर देखने को मिला, वह केवल एक दिन के आक्रोश का परिणाम नहीं था। इस भीषण हिंसा और आगजनी की नींव पिछले चार दिनों से गुपचुप तरीके से रखी जा रही थी। शहर के फेज-2 और होजरी कॉम्प्लेक्स जैसे इलाकों में श्रमिक अपनी मांगों को लेकर छोटे-छोटे समूहों में एकत्रित हो रहे थे, लेकिन स्थानीय पुलिस और खुफिया विभाग इस सुलगती चिंगारी को भांपने में पूरी तरह विफल रहे। जहां एक ओर श्रमिक वेतन वृद्धि और श्रम कानूनों के पालन की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे, वहीं दूसरी ओर कुछ असामाजिक तत्वों ने इस शांतिपूर्ण विरोध को हिंसक मोड़ देने की तैयारी कर ली थी। प्रशासन की सुस्ती का ही नतीजा था कि सोमवार सुबह तक यह आंदोलन एक हिंसक ज्वालामुखी बनकर फूटा, जिसने 350 से अधिक फैक्ट्रियों को अपनी चपेट में ले लिया।
शुरुआती जांच और साक्ष्यों से यह स्पष्ट हो रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम की स्क्रिप्ट 7 मुख्य व्हाट्सएप ग्रुपों के जरिए लिखी गई थी। इन ग्रुपों में हजारों की संख्या में लोगों को जोड़ा गया और उन्हें लगातार भड़काऊ संदेश भेजे जा रहे थे। चौंकाने वाली बात यह है कि इन ग्रुपों में न केवल वेतन विसंगति पर चर्चा हो रही थी, बल्कि बकायदा उन औद्योगिक इकाइयों की सूची साझा की गई थी जिन्हें निशाना बनाया जाना था। पुलिस की साइबर सेल ने अब इन डिजिटल पदचिह्नों को खंगालना शुरू कर दिया है, जिससे संकेत मिलते हैं कि कुछ बाहरी 'हैंडलर्स' इस पूरी भीड़ को रिमोट कंट्रोल से संचालित कर रहे थे। जिस समय पुलिस नाकों पर तैनात थी, उस समय उपद्रवी गलियों और वैकल्पिक रास्तों का उपयोग कर रहे थे, जो उनके पास पहले से मौजूद सटीक योजना को दर्शाता है। जांच में यह भी पाया गया है कि उपद्रवियों के पास हमले के लिए पहले से ही पत्थरों और पेट्रोल की बोतलों का स्टॉक मौजूद था। भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने बकायदा हेलमेट पहन रखे थे और वे पुलिस के साथ आमने-सामने के टकराव के लिए तैयार होकर आए थे। यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इसे महज एक 'गुस्सैल भीड़' की कार्रवाई नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह औद्योगिक शांति को भंग करने का एक सुनियोजित प्रयास था।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में प्रशासन की शिथिलता को लेकर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उनके निर्देश पर गठित हाई-लेवल कमेटी ने अब तक की जांच में यह पाया है कि यदि समय रहते श्रमिकों के शुरुआती असंतोष को गंभीरता से लेकर वार्ता की गई होती, तो शायद इस स्तर की तबाही को टाला जा सकता था। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट आदेश दिए हैं कि इस मामले में न केवल उपद्रवियों, बल्कि उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए जिन्होंने खुफिया इनपुट को नजरअंदाज किया। अब तक की कार्रवाई में 300 से अधिक लोगों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है और उनके विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट के तहत सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार ने संकेत दिए हैं कि जिन संपत्तियों का नुकसान हुआ है, उसकी वसूली भी दोषियों से ही की जाएगी।
औद्योगिक इकाइयों में हुई तोड़फोड़ का दायरा इतना बड़ा था कि सेक्टर 57 से लेकर सेक्टर 85 तक शायद ही कोई बड़ी कंपनी बची हो जिसे नुकसान न पहुंचा हो। उपद्रवियों ने फैक्ट्रियों के गेट तोड़कर अंदर प्रवेश किया और वहां मौजूद कंप्यूटर सिस्टम, मशीनरी और तैयार माल को क्षतिग्रस्त कर दिया। 150 से अधिक वाहनों को आग के हवाले करने की घटना ने उद्यमियों के मन में गहरा डर पैदा कर दिया है। कई औद्योगिक संगठनों ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि यदि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो वे अपनी इकाइयां अन्य राज्यों में स्थानांतरित करने पर विचार कर सकते हैं। यह स्थिति उत्तर प्रदेश की 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की छवि के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है, जिससे निपटने के लिए प्रशासन अब एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। जांच में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया है कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश के वेतनमान में लगभग 6,000 रुपये का अंतर है। हरियाणा में जहां न्यूनतम वेतन अधिक है, वहीं नोएडा के श्रमिक लंबे समय से समान वेतन की मांग कर रहे थे। इस जायज मांग को साजिशकर्ताओं ने एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और श्रमिकों की भावनाओं को भड़काकर उन्हें कानून हाथ में लेने के लिए उकसाया। प्रशासन अब श्रम विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर एक ऐसा ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रहा है जिससे भविष्य में संवाद की कमी न रहे। वर्तमान में, नोएडा के सभी संवेदनशील चौराहों पर पीएसी की कई कंपनियां और रैपिड एक्शन फोर्स तैनात की गई है ताकि किसी भी तरह की संभावित पुनरावृत्ति को रोका जा सके।
What's Your Reaction?









