मुंबई में देह व्यापार रैकेट का पर्दाफाश- 14 वर्षीय नाबालिग का 200 पुरुषों ने किया यौन उत्पीड़न, 10 गिरफ्तार।
Mumbai : मुंबई के पालघर जिले में एक दिल दहला देने वाली घटना ने मानव तस्करी और देह व्यापार की क्रूर सच्चाई को उजागर किया है। एक 14 वर्षीय बांग्लादेशी....
मुंबई के पालघर जिले में एक दिल दहला देने वाली घटना ने मानव तस्करी और देह व्यापार की क्रूर सच्चाई को उजागर किया है। एक 14 वर्षीय बांग्लादेशी नाबालिग लड़की, जिसे तीन महीने में लगभग 200 पुरुषों द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया गया, को मीरा-भायंदर वसई-विरार पुलिस की मानव तस्करी रोधी इकाई (एएचटीयू) ने दो गैर-सरकारी संगठनों, एक्सोडस रोड इंडिया फाउंडेशन और हार्मनी फाउंडेशन, की सहायता से बचाया। यह बच्ची, जो अवैध रूप से भारत लाई गई थी, देह व्यापार के एक बड़े रैकेट का शिकार बनी थी।
पुलिस ने इस मामले में अब तक दस लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें छह बांग्लादेशी नागरिक शामिल हैं। इस नाबालिग लड़की को नायगांव, वसई में एक फ्लैट से बचाया गया, जहां उसे देह व्यापार के लिए मजबूर किया जा रहा था। पुलिस के अनुसार, यह रैकेट कई राज्यों में फैला हुआ था, और पीड़ितों को नवी मुंबई, पुणे, गुजरात, कर्नाटक और अन्य स्थानों पर भेजा जाता था। इस रैकेट का संचालन करने वालों में मुख्य आरोपी मोहम्मद खालिद अब्दुल बापरी (33) शामिल है, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इसके अलावा, जूबेर हारुन शेख (38) और शमीम गफर सरदार (39) जैसे एजेंट भी गिरफ्तार किए गए हैं, जो पीड़ितों को विभिन्न शहरों में देह व्यापार के लिए भेजने में शामिल थे। इस रैकेट में शामिल दो महिलाएं, जिनकी उम्र 32 और 33 वर्ष है, भी बांग्लादेशी नागरिक हैं और इन्हें इस नाबालिग को अवैध रूप से भारत लाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
पीड़िता ने जुवेनाइल डिटेंशन सेंटर में दिए अपने बयान में बताया कि वह स्कूल में एक विषय में फेल होने के बाद अपने सख्त माता-पिता के डर से घर से भाग गई थी। एक परिचित महिला ने उसका विश्वास जीता और उसे भारत में अवैध रूप से लाकर देह व्यापार में धकेल दिया। उसने बताया कि उसे पहले गुजरात के नडियाद ले जाया गया, जहां तीन महीने की अवधि में 200 से अधिक पुरुषों द्वारा उसका यौन उत्पीड़न किया गया। पुलिस इस दावे की जांच कर रही है, और अधिकारियों का कहना है कि पीड़िता को नशीली दवाएं दी गई थीं और उसे गर्म चम्मच से दागा गया था ताकि उसे देह व्यापार में बने रहने के लिए मजबूर किया जा सके। मानवाधिकार कार्यकर्ता माधु शंकर ने बताया कि इस तरह के मामलों में कई बार पीड़ितों को शिशु अवस्था में ही अगवा कर लिया जाता है और फिर हार्मोनल इंजेक्शन देकर उन्हें समय से पहले यौवन में धकेल दिया जाता है ताकि उन्हें देह व्यापार में इस्तेमाल किया जा सके। इस मामले ने समाज में व्याप्त गंभीर समस्याओं, जैसे मानव तस्करी, नाबालिगों का यौन शोषण और अवैध आप्रवास, को उजागर किया है। हार्मनी फाउंडेशन के अध्यक्ष अब्राहम मथाई ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए मांग की कि उन सभी 200 पुरुषों को खोजकर गिरफ्तार किया जाए, जिन्होंने इस नाबालिग का यौन उत्पीड़न किया। उन्होंने कहा कि यह लड़की अभी किशोरावस्था में भी पूरी तरह प्रवेश नहीं कर पाई थी, और उसका बचपन इन “राक्षसों” ने छीन लिया। मथाई ने यह भी बताया कि इस तरह की घटनाएं एकाकी नहीं हैं, बल्कि समाज और प्रशासन की उदासीनता का परिणाम हैं। उन्होंने सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि इस तरह के रैकेट को पूरी तरह खत्म करने के लिए कड़े कदम उठाए जाने चाहिए।
पुलिस आयुक्त निकेत कौशिक ने आश्वासन दिया कि मीरा-भायंदर वसई-विरार पुलिस इस रैकेट को पूरी तरह उजागर करने और कमजोर किशोरों के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही है। इस मामले में पुलिस ने विभिन्न राज्यों में टीमें भेजी हैं ताकि इस रैकेट से जुड़े अन्य लोगों को पकड़ा जा सके। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम, विदेशी अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के तहत दर्ज किया गया है। मुंबई और इसके आसपास के क्षेत्रों में मानव तस्करी और देह व्यापार की समस्या लंबे समय से चिंता का विषय रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2021 के आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में POCSO अधिनियम के तहत 1,048 मामले दर्ज किए गए, जो इसे देश में दूसरा सबसे अधिक प्रभावित शहर बनाता है। इन मामलों में अधिकांश अपराधी पीड़ितों के परिचित होते हैं, लेकिन 25-30% मामलों में अपराधी अजनबी होते हैं, जो विशेष रूप से सार्वजनिक परिवहन या पड़ोस में बच्चों को निशाना बनाते हैं। गैर-सरकारी संगठन अर्पन, जो 2006 से बच्चों के यौन शोषण की रोकथाम और हस्तक्षेप के लिए काम कर रहा है, ने बताया कि मुंबई में इस साल के पहले चार महीनों में ही लगभग 400 बच्चे यौन शोषण के शिकार हुए हैं। यह संख्या 2022 में 1,157, 2021 में 1,066 और 2020 में 938 थी, जो इस समस्या की बढ़ती गंभीरता को दर्शाता है।
अर्पन की संस्थापक और सीईओ पूजा तापरिया ने बताया कि बच्चों के यौन शोषण के अपराधी दो प्रकार के होते हैं: पहला, पेडोफाइल्स, जो विशेष रूप से बच्चों को निशाना बनाते हैं, और दूसरा, रिग्रेसिव अपराधी, जो तनाव या व्यक्तिगत आघात के समय बच्चों को निशाना बनाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि 7-11 वर्ष की आयु के बच्चे अपनी बात कहने में असमर्थता के कारण सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं। तापरिया ने जोर देकर कहा कि न केवल लड़कियों, बल्कि लड़कों को भी यौन शोषण से बचाने की आवश्यकता है, और माता-पिता और शिक्षकों को इस बारे में जागरूक करना होगा। गैर-सरकारी संगठन उर्जा ट्रस्ट, जो मुंबई में यौन शोषण से बचे लोगों की मदद करता है, ने बताया कि कई बार पीड़ित बच्चियां अपने परिवारों से भागकर सड़कों पर आ जाती हैं, जहां वे और अधिक खतरे का शिकार बनती हैं। उर्जा ट्रस्ट की सह-संस्थापक दीपाली वंदना ने कहा कि समाज में लैंगिक हिंसा की व्यापकता और लोगों की उदासीनता इस समस्या को और गंभीर बनाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों को सुरक्षित माहौल प्रदान करने के लिए पुलिस, सामाजिक संगठनों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।
इस मामले ने समाज के सामने कई सवाल खड़े किए हैं। पहला, क्या हमारी व्यवस्था नाबालिगों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है? दूसरा, क्या अवैध आप्रवास और मानव तस्करी को रोकने के लिए पर्याप्त उपाय किए जा रहे हैं? और तीसरा, क्या समाज बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह समझता है? इस मामले में पुलिस की त्वरित कार्रवाई और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका सराहनीय है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि इस तरह के रैकेट को पूरी तरह खत्म करने के लिए दीर्घकालिक और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। मुंबई पुलिस ने बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए कई जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए हैं। ‘पुलिस दीदी’ पहल के तहत, पुलिस अधिकारी बच्चों को ‘गुड टच, बैड टच’ के बारे में जागरूक करने के लिए स्कूलों और कॉलोनियों में कार्यक्रम आयोजित करते हैं। डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस डी.एस. स्वामी ने बताया कि ये कार्यक्रम बच्चों को अपनी बात बेझिझक कहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। हालांकि, पूजा तापरिया ने बताया कि कई स्कूलों में काउंसलर की नियुक्ति के लिए सरकारी आदेशों का पालन नहीं हो रहा है, जिसके कारण बच्चे अपनी समस्याएं साझा करने में असमर्थ रहते हैं।
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