यूपी विधानसभा मानसून सत्र में सपा विधायक अतुल प्रधान एक अनोखी कांवड़ लेकर पहुंचे, स्कूल और शराब दुकान की तस्वीरों के साथ सरकार पर निशाना।
Political: उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होते ही हंगामेदार रहा, जिसमें समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायकों ने योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ....
उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होते ही हंगामेदार रहा, जिसमें समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायकों ने योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ तीखा विरोध प्रदर्शन किया। इस सत्र में सपा विधायक अतुल प्रधान ने एक अनोखे अंदाज में अपनी बात रखी। वे विधानसभा परिसर में एक प्रतीकात्मक कांवड़ लेकर पहुंचे, जिसके एक तरफ सरकारी स्कूलों और बच्चों की तस्वीरें लटक रही थीं, जबकि दूसरी तरफ सरकारी शराब की दुकानों की तस्वीरें थीं। इस कांवड़ पर डॉ. भीमराव आंबेडकर और राम मनोहर लोहिया की तस्वीरें भी लगी थीं, जो सपा की विचारधारा और सामाजिक न्याय के प्रति उनके संदेश को दर्शाती थीं। अतुल प्रधान के इस अनोखे प्रदर्शन ने न केवल विधानसभा परिसर में चर्चा का माहौल बनाया, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की शिक्षा और शराब नीतियों पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। यह प्रदर्शन सपा के व्यापक विरोध का हिस्सा था, जिसमें उन्होंने शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और बाढ़ जैसे मुद्दों को उठाया।
मानसून सत्र की शुरुआत से पहले, सपा विधायकों ने विधानसभा परिसर में चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा के पास बैनर, पोस्टर और तख्तियों के साथ विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने “आप चलाएं मधुशाला, हम चलाएंगे पीडीए पाठशाला” जैसे नारे लगाए, जिसका उद्देश्य सरकार की नीतियों की आलोचना करना और शिक्षा को बढ़ावा देने की उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करना था। अतुल प्रधान की कांवड़ इस विरोध का सबसे आकर्षक हिस्सा थी, जिसने सरकार पर कटाक्ष करते हुए यह संदेश दिया कि योगी सरकार शिक्षा के बजाय शराब की दुकानों को प्राथमिकता दे रही है।
सपा के इस प्रदर्शन में अन्य विधायक, जैसे संग्राम यादव, आर.के. वर्मा, फहीम, जय प्रकाश अंचल और नफीस अहमद, भी शामिल थे, जिन्होंने बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और स्कूलों के विलय जैसे मुद्दों को उठाया। अतुल प्रधान ने अपने प्रदर्शन के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 26,012 सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया और 5,000 से अधिक स्कूलों का विलय कर दिया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। दूसरी ओर, उन्होंने दावा किया कि सरकार ने 27,000 शराब की दुकानों को लाइसेंस दिया, जिसे वे शिक्षा के प्रति सरकार की उदासीनता का प्रतीक मानते हैं। इस प्रतीकात्मक कांवड़ के जरिए उन्होंने सरकार को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से यह दिखाने का प्रयास किया कि वह बच्चों के भविष्य के बजाय शराब की बिक्री को बढ़ावा दे रही है। इस प्रदर्शन ने न केवल विधानसभा में हंगामा मचाया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा का विषय बन गया।
सपा के इस विरोध प्रदर्शन का संदर्भ हाल के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में देखा जा सकता है। 2024 के लोकसभा चुनावों में सपा ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतकर अपनी स्थिति को मजबूत किया, जिसने पार्टी को विधानसभा में अधिक आक्रामक रुख अपनाने का आत्मविश्वास दिया। सत्र से पहले सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर सरकार पर तंज कसते हुए कहा था, “मानसून ऑफर, सौ लाओ, सरकार बनाओ!” यह बयान भाजपा के भीतर कथित असंतोष और संगठन बनाम सरकार की बहस को लक्षित करता था। सपा ने इस सत्र में न केवल शिक्षा और शराब नीति, बल्कि बाढ़, कानून-व्यवस्था, किसानों की समस्याएं और वोट चोरी जैसे मुद्दों को भी उठाने की योजना बनाई थी। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। सपा का दावा है कि सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों को बंद करके या उनका विलय करके शिक्षा तक पहुंच को सीमित कर दिया है।
एक अनुमान के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में 26,000 से अधिक स्कूल बंद किए गए हैं, जिसके कारण हजारों बच्चों को लंबी दूरी तय करके स्कूल जाना पड़ता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। सपा ने अपनी “पीडीए पाठशाला” की अवधारणा के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि वह पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) समुदायों के बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता देना चाहती है।
दूसरी ओर, शराब की दुकानों को लेकर सपा का आरोप है कि योगी सरकार ने शराब की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए 27,000 से अधिक शराब की दुकानों को लाइसेंस दिया है। यह दावा विवादास्पद है, क्योंकि सरकार का कहना है कि शराब की बिक्री से प्राप्त राजस्व का उपयोग विकास कार्यों के लिए किया जाता है। हालांकि, सपा ने इसे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा देने वाला कदम बताया। अतुल प्रधान की कांवड़ में शराब की दुकानों की तस्वीरें लगाना इस तर्क को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करने का एक प्रयास था। इस प्रदर्शन ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए और यह संदेश दिया कि शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकता को नजरअंदाज करके सरकार सामाजिक मूल्यों को कमजोर कर रही है। विधानसभा सत्र के पहले दिन, सपा के इस विरोध प्रदर्शन के कारण सदन में तीखी बहस देखने को मिली। विपक्षी विधायकों ने प्रश्नकाल के दौरान हंगामा किया, जिसके कारण विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना को सदन को 15 मिनट के लिए स्थगित करना पड़ा। सपा विधायकों ने बैनर और पोस्टर के जरिए सरकार पर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा नीति में विफलता का आरोप लगाया। इस दौरान सपा विधायक सचिन यादव ने भी एक अनोखा प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने काले कुर्ते पर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आत्महत्या जैसे शब्द लिखवाए थे। सत्र में सपा ने स्कूलों के विलय, बाढ़ की स्थिति और बिजली निजीकरण जैसे मुद्दों को भी जोर-शोर से उठाया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्र से पहले एक सर्वदलीय बैठक में सभी दलों से सकारात्मक चर्चा की अपील की थी। उन्होंने कहा कि यह सत्र विशेष है, क्योंकि इसमें ‘विजन डॉक्यूमेंट-2047’ पर विस्तृत चर्चा होगी, जिसमें सभी दलों के सुझावों को शामिल किया जाएगा। योगी ने जोर देकर कहा कि यह दस्तावेज किसी एक पार्टी का एजेंडा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के समग्र विकास के लिए एक साझा खाका है। हालांकि, सपा के आक्रामक रुख और अतुल प्रधान के प्रतीकात्मक प्रदर्शन ने सत्र को हंगामेदार बना दिया। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी कहा कि सरकार सभी विधेयकों पर खुलकर बहस के लिए तैयार है और विकास कार्यों और जनहित के मुद्दों पर चर्चा होगी। अतुल प्रधान का यह प्रदर्शन उनके पिछले विधानसभा सत्रों में आक्रामक रुख का हिस्सा है। इससे पहले, दिसंबर 2024 के शीतकालीन सत्र में, उन्हें विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना द्वारा “अपमानजनक भाषा” के उपयोग के लिए पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया था। उस समय उन्होंने स्वास्थ्य, अस्पतालों और दवाओं से संबंधित मुद्दों को उठाया था, लेकिन उनके भाषण के दौरान विपक्षी सदस्यों ने नारेबाजी शुरू कर दी, जिसके कारण हंगामा हुआ। अतुल प्रधान ने निलंबन के बाद कहा था कि वे स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उठा रहे थे, लेकिन सरकार उनकी आवाज दबाना चाहती है।
इस बार, अतुल प्रधान का कांवड़ प्रदर्शन न केवल प्रतीकात्मक था, बल्कि यह सपा की रणनीति का हिस्सा था, जो सरकार की नीतियों को जनता के सामने उजागर करने के लिए रचनात्मक और प्रभावी तरीके अपनाने की कोशिश कर रही है। उनकी कांवड़ ने न केवल विधानसभा में मौजूद विधायकों का ध्यान खींचा, बल्कि सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा का विषय बनी। कई लोगों ने इसे एक साहसिक कदम बताया, जो सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है, जबकि कुछ ने इसे केवल प्रचार का हथकंडा करार दिया। सपा के एक अन्य एमएलसी, आशुतोष सिन्हा, ने भी इसी सत्र में “नैतिकता का अस्थि कलश” लेकर प्रदर्शन किया था, जिसमें उन्होंने कुंभ भगदड़ में हुई मौतों के आंकड़े छिपाने का आरोप लगाया था। सपा का यह विरोध प्रदर्शन 2024 के लोकसभा चुनावों में उनकी सफलता के बाद और भी आक्रामक हो गया है। पार्टी ने हाल के वर्षों में अपनी “पीडीए” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति के तहत सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को अपने एजेंडे का केंद्र बनाया है। अतुल प्रधान का प्रदर्शन इस रणनीति का हिस्सा था, जिसमें उन्होंने शिक्षा को पीडीए समुदायों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। सपा का दावा है कि स्कूलों का बंद होना और विलय विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित समुदायों के बच्चों को प्रभावित करता है, जो पहले से ही शिक्षा तक सीमित पहुंच से जूझ रहे हैं।
दूसरी ओर, सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। योगी सरकार का कहना है कि स्कूलों का विलय संसाधनों के बेहतर उपयोग और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए किया गया है। सरकार ने यह भी दावा किया कि शराब की दुकानों से प्राप्त राजस्व का उपयोग विकास कार्यों, जैसे सड़कों, अस्पतालों और बुनियादी ढांचे के लिए किया जाता है। हालांकि, सपा का तर्क है कि यह राजस्व सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा देता है और ग्रामीण क्षेत्रों में शराब की उपलब्धता से नशाखोरी और हिंसा जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। सोशल मीडिया पर इस प्रदर्शन को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ यूजर्स ने अतुल प्रधान की रचनात्मकता की सराहना की और इसे सरकार की नीतियों पर प्रभावी कटाक्ष बताया। एक यूजर ने लिखा, “अतुल प्रधान ने कांवड़ के जरिए सरकार को उसका चेहरा दिखा दिया। शिक्षा को नजरअंदाज करके शराब को बढ़ावा देना शर्मनाक है।” वहीं, कुछ यूजर्स ने इसे केवल प्रचार का हथकंडा करार दिया और कहा कि सपा को रचनात्मक समाधान पेश करने चाहिए। इस सत्र में सपा ने बाढ़ की स्थिति को भी प्रमुखता से उठाया। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई, और सपा ने सरकार पर राहत कार्यों में लापरवाही का आरोप लगाया। हालांकि, सरकार ने दावा किया कि बाढ़ प्रभावितों को हर संभव मदद दी जा रही है, जिसमें भोजन, दूध और अन्य सुविधाएं शामिल हैं।
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