Special : स्वाधीनता आंदोलन की अमर नायक रानी विद्या देवी, जो गांधीवादी विचारधारा की प्रतीक और नारी जागरण की अग्रदूत बनीं
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अक्टूबर के महीने में महात्मा गांधी का हरदोई आगमन हुआ था। उस समय देश में स्वदेशी की गूंज थी। हरदोई के स्थानीय पार्क (जहां वर्तमान में गांधी भवन स्थापित है) में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इस सभा में विदेशी कपड़ों
भारत की पावन धरती ने जहां एक ओर महान वीरों को जन्म दिया है, वहीं दूसरी ओर ऐसी वीरांगनाओं को भी अपनी गोद में पाला है जिन्होंने अपने साहस से इस माटी का गौरव बढ़ाया है। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसी ही एक साहसी महिला थीं रानी विद्या देवी, जिन्हें लोग आदर और सम्मान से 'हरदोई की शेरनी' कहकर पुकारते थे। वह बेरुआ के राजा महेश्वर बख्श सिंह के भाई ठाकुर जंगबहादुर सिंह की धर्मपत्नी थीं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए 'स्वदेशी आंदोलन' में रानी विद्या देवी और उनकी देवरानी रानी लक्ष्मी देवी (पत्नी ठाकुर मुनेश्वर बख्श सिंह) ने बेहद सक्रिय भूमिका निभाई थी।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अक्टूबर के महीने में महात्मा गांधी का हरदोई आगमन हुआ था। उस समय देश में स्वदेशी की गूंज थी। हरदोई के स्थानीय पार्क (जहां वर्तमान में गांधी भवन स्थापित है) में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इस सभा में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करते हुए उनकी होली जलाई गई और लोगों ने खादी अपनाने का संकल्प लिया। बेरुआ की ये दोनों जांबाज महिलाएं भी इस ऐतिहासिक आंदोलन का हिस्सा बनीं। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत होकर उन्होंने अपनी अत्यंत कीमती साड़ियां अग्नि के हवाले कर दीं। इतना ही नहीं, उन्होंने देश को आजाद कराने के संकल्प के साथ अपने सोने और चांदी के सारे आभूषण महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी को सौंप दिए।
इस घटना के बाद रानी विद्या देवी पूरी तरह से देश सेवा के मार्ग पर चल पड़ीं। उन्होंने जिले के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। अपनी ओजस्वी और प्रखर नेतृत्व क्षमता के कारण उन्होंने जिले की महिलाओं को जागरूक करने और उन्हें आजादी के आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देश हित में काम करते हुए उन्हें दो बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी। उनके कुशल नेतृत्व को देखते हुए उन्हें जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष भी मनोनीत किया गया था।
देशभक्ति का यह जज्बा केवल उन तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी पुत्री तारा देवी के मन में भी देश सेवा की ऐसी लौ जली कि वह महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के साथ वर्धा आश्रम चली गईं। उन्होंने अपना पूरा जीवन आश्रम की व्यवस्था और राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया। हरदोई की इस वीर भूमि और रानी विद्या देवी के इस सर्वोच्च बलिदान को देश हमेशा गर्व के साथ याद रखेगा।
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