गीत - काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है....

राजपूताने का ये काफिला, वीरता की मिसाल हमारी है।

By INA News Desk
Sep 18, 2024 - 17:23
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गीत - काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है....

काफिला बढ़ रहा है

काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है,
राजपूताने का ये काफिला, वीरता की मिसाल हमारी है।
धर्म, प्रतिष्ठा और संस्कृति की जोत जलाए,
हर योद्धा के हौसले ने इतिहास की धार बनाई है।
जो कुरीतियों के विरुद्ध खड़े हैं, उनका ऋण अपार है,
अब समय है तप और त्याग का, यही हमारा उपहार है।
क्या राजा, क्या रंक, हर क्षत्रिय का मान अविचलित है,
काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है।

भीतर के विष को पहले हमें मिटाना होगा,
एकता का दीप जला, फिर से हमें जगाना होगा।
जब हम ही विषधर बन गए, तो बाहर को क्या कहें?
मद और अहंकार त्याग, अब सच्चे योद्धा बन जाएं।
संगठित होकर, फिर से बलवान हमें बनना है,
क्योंकि ये विष हम पर भारी है, इसे हर हाल में हराना है।
काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है,
राजपूताने की प्रतिष्ठा का अब समय फिर से आया है।

अपनी संतानों को हम क्यों मिटते देखें?
धर्म, समाज, संस्कृति, ये मूल हमने ही छोड़े हैं।
अब समय है इन्हें फिर से जीवित करने का,
नवपीढ़ी को अपने इतिहास से जोड़ने का।
आओ, अपने गौरव को फिर से संभालें,
क्षत्रिय धर्म की पुकार अब हमें जगाने वाली है।
काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है,
राजपूताना की संस्कृति, फिर से खड़ी हो रही है।

कुरीतियों ने हमारे धर्म को धुंधला किया है,
अहं और अकड़ ने हमें गहरी नींद में डाला है।
हम प्रभु की माला के मनके थे, बिखर गए कहीं,
अब उन मनकों को फिर से माला में पिरोना है हमें।
धर्म की रक्षा का प्रण लेकर, अपने कर्तव्य को निभाना है,
क्षत्रिय धर्म को फिर से आकाश पर ले जाना है।
काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है,
वीरता और प्रतिष्ठा की जोत, फिर से जल रही है।

जो कुरीतियों के विरुद्ध खड़े हैं, उनका योगदान अमूल्य है,
अब समय है अपनी जड़ों को फिर से पहचानने का।
तप, त्याग और धर्म के मार्ग पर चलने का,
अपनी संस्कृति को फिर से संजीवनी देने का।
काफिला बढ़ रहा है, संघर्ष अभी जारी है,
राजपूताने की विजय अब निश्चित है।

रतन खंगारोत , जयपुर

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