बिहार चुनावी हार ने तोड़ा प्रशांत किशोर का मन: जन सुराज की करारी शिकस्त पर बोले, 'नतीजों के बाद सो नहीं पाया'।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी की करारी हार ने उसके संस्थापक प्रशांत किशोर को गहरा झटका दिया है। नतीजों
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी की करारी हार ने उसके संस्थापक प्रशांत किशोर को गहरा झटका दिया है। नतीजों के बाद किशोर ने खुद माना कि यह उनकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा बड़ा सदमा है। एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि चुनाव परिणाम आने के बाद से उन्हें ठीक से नींद नहीं आई है। जन सुराज ने अपेक्षा से बहुत कम प्रदर्शन किया, जिससे किशोर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर पानी फिर गया। उन्होंने कहा, 'ईमानदारी से कहूं तो नतीजे आने के बाद मैं ठीक से सो नहीं पाया हूं। लेकिन जब तक आप हार नहीं मानते, तब तक आप हारे नहीं हैं।' यह बयान किशोर की हताशा तो दर्शाता ही है, साथ ही उनकी दृढ़ता भी दिखाता है।
बिहार चुनाव 14 नवंबर को संपन्न हुए, जहां एनडीए ने 243 सीटों में से 202 पर कब्जा जमाया। भाजपा को 89, जदयू को 85, लोक जनशक्ति पार्टी को 19, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को पांच और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को चार सीटें मिलीं। विपक्षी महागठबंधन को महज 41 सीटें हासिल हुईं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जन सुराज की रही, जो पहली बार मैदान में उतरी और 238 सीटों पर लड़ी। पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। शुरुआती गिनती में चार सीटों पर लीड दिखी, लेकिन दोपहर तक सब गायब हो गईं। एक्जिट पोल्स ने भी पार्टी को 0 से 3 सीटें ही दी थीं, जो सही साबित हुईं। वोट शेयर मात्र 3.4 प्रतिशत रहा, जो कांग्रेस से ज्यादा लेकिन लेफ्ट और एआईएमआईएम के संयुक्त से थोड़ा ही अधिक था।
प्रशांत किशोर का राजनीतिक सफर रोमांचक रहा है। 1977 में रोहतास जिले के बिक्रमगंज में जन्मे किशोर ने आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए किया। 2000 के दशक में संयुक्त राष्ट्र में काम किया, जहां उन्होंने अफ्रीका में पोलियो उन्मूलन अभियान चलाया। 2011 में भारत लौटे तो राजनीति में कदम रखा। पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को जिताया, फिर 2014 में नरेंद्र मोदी की भाजपा के लिए रणनीति बनाई। 2015 में बिहार में नीतीश कुमार-आरजेडी गठबंधन की जीत में उनकी भूमिका थी। 2019 में पश्चिम बंगाल फिर ममता के साथ, लेकिन बाद में मतभेद हो गया। 2020 में महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे को जिताया। लेकिन 2022 में उन्होंने राजनीतिक सलाहकार का काम छोड़ दिया और बिहार में जन सुराज अभियान शुरू किया।
जन सुराज अभियान की शुरुआत 2 अक्टूबर 2022 को चंपारण से हुई, जहां महात्मा गांधी ने 1917 में सत्याग्रह शुरू किया था। किशोर ने पैदल यात्रा की, जो 3000 किलोमीटर लंबी थी। उन्होंने 5500 गांवों का दौरा किया, रोज 15-20 किलोमीटर पैदल चले। धूप, बारिश और तूफान में भी रुके नहीं। यात्रा का मकसद था बिहार की समस्याओं को समझना। किशोर ने हर गांव, ब्लॉक और जिले के लिए 10 साल का विकास प्लान बनाया। शिक्षा, रोजगार, प्रवास रोकना, भूमि सुधार पर जोर दिया। उन्होंने कहा, 'बिहार को गरीबी से निकालना है, टॉप 10 राज्यों में लाना है।' यात्रा के दौरान लाखों लोगों से मुलाकात की, 1.4 करोड़ सदस्य जोड़े। 2 अक्टूबर 2024 को अभियान को राजनीतिक पार्टी बना दिया। पार्टी का प्रतीक स्कूल बैग रखा, जो शिक्षा पर फोकस दिखाता है।
चुनाव में जन सुराज ने 243 में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। पांच सीटों पर नाम वापस लिए या उम्मीदवार गायब हो गए। पार्टी ने गैर पारंपरिक चेहरे चुने- गणितज्ञ, रिटायर्ड आईएएस, सामाजिक कार्यकर्ता, यहां तक कि एक ट्रांसजेंडर उम्मीदवार। जाति के बजाय योग्यता पर जोर दिया। किशोर ने कहा था, 'हम अर्श पर या फर्श पर आएंगे, बीच का रास्ता नहीं।' लेकिन फर्श पर आ गए। पार्टी अध्यक्ष मनोज भारती ने कहा, 'लोगों को हमारी बात समझ नहीं आई, हमने भी समझाने में चूक की।' कई उम्मीदवारों को जमानत जब्त हो गई, मतलब छह प्रतिशत वोट भी न मिले।
हार के कई कारण बताए जा रहे हैं। बिहार की राजनीति जाति पर टिकी है। एनडीए और महागठबंधन ने जातिगत समीकरण साधे। जन सुराज नया था, स्थानीय नेतृत्व की कमी रही। किशोर की आक्रामक शैली ने कुछ वोटरों को दूर किया। महिलाओं को प्रभावित करने में चूक हुई। पार्टी ने बेरोजगारी, प्रवास, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठाए, लेकिन एनडीए की कल्याण योजनाओं- पेंशन, नकद हस्तांतरण- ने वोट खींच लिए। जन सुराज ने आरोप लगाया कि सरकार ने वर्ल्ड बैंक के 14,000 करोड़ रुपये डायवर्ट कर महिलाओं को 10,000 रुपये दिए। उदय सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा, 'लगभग 40,000 करोड़ जनता के पैसे से वोट खरीदे गए। अगर ऐसा न होता, तो एनडीए का सफाया हो जाता।' जदयू ने कहा था कि अगर 25 सीटें मिलीं तो किशोर राजनीति छोड़ देंगे। 85 सीटें मिलने पर जदयू कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया।
नतीजों के बाद किशोर ने चुप्पी साध ली। 18 नवंबर को पत्रकारों से कहा, 'मैं हार की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं। लोगों का विश्वास जीतने में नाकाम रहा। 20 नवंबर को पूरे दिन मौन व्रत रखूंगा।' उन्होंने माफी मांगी और सुधार का वादा किया। किशोर ने कहा, 'यह झटका बड़ा है, लेकिन मिशन जारी रहेगा।' सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी। कुछ ने कहा, 'किशोर बिहार के लिए खतरा थे, अब चुप रहें।' दूसरे ने लिखा, 'उनकी कोशिश सराहनीय, बिहार को नई सोच की जरूरत।' एक यूजर ने कहा, 'पिछले 30 सालों में आरजेडी-जदयू-भाजपा ने बिहार को गरीब रखा, किशोर जैसा बदलाव ला सकता था।' भाजपा के अमित मालवीय ने कहा, 'जन सुराज चौथे नंबर पर रही, वोट शेयर 3.34 प्रतिशत।'
विशेषज्ञों का मानना है कि हार से सबक लेना होगा। किशोर को स्थानीय नेताओं को मजबूत बनाना पड़ेगा। जाति के साथ विकास मुद्दों को जोड़ना सीखना होगा। लेकिन पार्टी की वोट शेयर से उम्मीद बंधती है। लेफ्ट दलों से ज्यादा वोट मिले। भारत टुडे ने लिखा, 'जन सुराज मरी नहीं, अब जन्म ले रही है।' किशोर की पैदल यात्रा ने बिहार में नई बहस छेड़ी। प्रवासियों ने कहा, 'हम मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं, किशोर ने आवाज दी।' लेकिन जाति की राजनीति ने दबा दिया।
किशोर का भविष्य क्या? उन्होंने कहा, '10 साल का मिशन है। हार से घबराएंगे नहीं।' अगर वे बने रहें तो 2030 चुनाव में मजबूत लौट सकते हैं। कांशी राम की तरह पहली हार से सीख लें। बिहार को बदलाव चाहिए। राज्य अभी भी सबसे गरीब है। लोग मजदूरी के लिए दिल्ली-मुंबई जाते हैं, बिहारी कहकर अपमान सहते हैं। किशोर ने शिक्षा क्रांति, नशाबंदी हटाकर शिक्षा फंड, बुजुर्ग पेंशन का वादा किया। अगर ये लागू होते तो बिहार बदल जाता।
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