Sambhal: यूपी के कॉलेजों में ड्रेस कोड लागू! छात्रों-शिक्षकों ने बताया क्यों है जरूरी, हिजाब पर भी आया बड़ा बयान।
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल Anandiben Patel द्वारा स्टेट यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में ड्रेस कोड लागू करने के निर्देश के बाद
उवैस दानिश, सम्भल
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल Anandiben Patel द्वारा स्टेट यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में ड्रेस कोड लागू करने के निर्देश के बाद शिक्षा जगत में बहस तेज हो गई है। छात्र-छात्राओं से लेकर शिक्षकों तक ने इस फैसले पर अपनी राय रखी। ज्यादातर छात्रों ने इसे अनुशासन, समानता और पहचान से जोड़ते हुए स्वागत किया, जबकि हिजाब और बुर्के को लेकर भी अहम प्रतिक्रिया सामने आई।
बीएड छात्र मोहित कुमार सिंह ने राज्यपाल के फैसले को “सराहनीय कदम” बताते हुए कहा कि ड्रेस कोड किसी भी संस्थान की पहचान होता है। उन्होंने कहा कि जैसे जज, वकील और अधिकारी की अपनी वेशभूषा होती है, उसी तरह छात्रों की भी एक पहचान होनी चाहिए। उनके मुताबिक यूनिफॉर्म से यह साफ पता चलता है कि छात्र शिक्षा ग्रहण करने आया है। उन्होंने कहा कि इससे जातिगत और लिंग आधारित भेदभाव भी कम होगा। वहीं बीए फर्स्ट ईयर की छात्रा ज़ुबैर फात्मा ने कहा कि ड्रेस कोड हर छात्र के लिए जरूरी है क्योंकि इससे बच्चों के बीच समानता दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि यूनिफॉर्म का मुख्य उद्देश्य ही इक्वालिटी दिखाना है, जिससे अमीर-गरीब या अपर-मिडिल क्लास का फर्क खत्म होता है। उन्होंने छात्रों से स्कूल-कॉलेज की गाइडलाइंस और नियमों का पालन करने की अपील भी की। स्वामी दयानंद सरस्वती कॉलेज की छात्रा प्रिया रश्मी कुमारी गौतम ने कहा कि अगर सभी का ड्रेस कोड एक जैसा होगा तो लड़के-लड़कियों के पहनावे को लेकर जजमेंट खत्म होगा। उन्होंने कहा कि इससे सिविक सेंस बेहतर होगा और छात्रों में अनुशासन व विकास की भावना पैदा होगी। उधर एमजीएम पीजी कॉलेज सम्भल के पूर्व प्राचार्य प्रोफेसर आबिद हुसैन ने भी राज्यपाल के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि स्कूलों की तरह विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी ड्रेस कोड लागू होने से अनुशासन मजबूत होगा और शिक्षा का बेहतर माहौल बनेगा। हिजाब और बुर्के पर उठ रहे सवालों को लेकर प्रोफेसर आबिद हुसैन ने साफ कहा कि ड्रेस कोड का मतलब हिजाब पर रोक नहीं है। उन्होंने कहा कि सर ढकना भारतीय परंपरा का हिस्सा है और अगर कोई छात्रा हिजाब पहनकर आती है तो ड्रेस कोड उससे कहीं भी टकराव नहीं करता। राज्यपाल के इस फैसले के बाद अब प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ड्रेस कोड को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कहीं इसे अनुशासन और समानता का कदम माना जा रहा है तो कहीं धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
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