Hardoi News: बारिश ने बढ़ाई मक्का किसानों की मुश्किलें, सांडी-कन्नौज मार्ग पर सैकड़ों क्विंटल मक्का भीगने से नुकसान का खतरा
मक्का की फसल को सुखाना किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, ताकि इसे मंडी में बेचा जा सके। हालांकि, इस वर्ष रुक-रुक कर हो रही बारिश ने इस प्रक्रिया को बेहद मुश्कि....
रिपोर्ट : अभिषेक त्रिवेदी
By INA News Hardoi.
अरवल : हरदोई जिले के अरवल क्षेत्र में रुक-रुक कर हो रही बारिश ने मक्का किसानों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। सांडी से कन्नौज जाने वाले मार्ग पर सैकड़ों क्विंटल मक्का सड़क किनारे सुखाने के लिए रखी गई है, लेकिन बार-बार बारिश होने से यह भीग रही है। इससे मक्का के काले पड़ने और खराब होने का खतरा मंडरा रहा है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान की आशंका है। ग्रामीणों ने बताया कि यदि मक्का खराब हो गई, तो मंडी में इसका कोई भाव नहीं मिलेगा, जिससे उनकी मेहनत और लागत डूब सकती है।
बारिश से मक्का सुखाने में दिक्कत
मक्का की फसल को सुखाना किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, ताकि इसे मंडी में बेचा जा सके। हालांकि, इस वर्ष रुक-रुक कर हो रही बारिश ने इस प्रक्रिया को बेहद मुश्किल बना दिया है। सांडी-कन्नौज मार्ग पर उमरौली जैतपुर, लालपुर, हैदराबाद, और मंसूरपुर जैसे गांवों के किसानों की सैकड़ों क्विंटल मक्का सड़क किनारे पड़ी है। किसान दिनभर मक्का को चलाकर सुखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन बारिश के कारण यह गीली हो जाती है। मंसूरपुर के किसान संतोष और रवि शंकर ने बताया कि बारिश के कारण जितनी मक्का सूख पाती है, उससे कहीं ज्यादा गीली हो जाती है, जिससे फसल खराब होने का डर बना हुआ है।
मक्का खराब होने का खतरा और आर्थिक नुकसान
किसानों के अनुसार, गीली मक्का के काले पड़ने की आशंका है, जिससे इसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। मंसूरपुर गांव के किसान राजीव और गोविंद त्रिवेदी ने बताया कि यदि मक्का काली पड़ गई, तो मंडी में इसका कोई भाव नहीं मिलेगा।
इससे न केवल उनकी मेहनत बर्बाद होगी, बल्कि फसल में लगी लागत भी वापस नहीं मिल पाएगी। ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती में तीसरे दिन पानी देने और समय-समय पर दवाओं के छिड़काव के कारण लागत पहले ही काफी अधिक हो जाती है। ऐसे में मक्का का उचित मूल्य न मिलना किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
किसानों की बढ़ती लागत और निराशा
ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती में किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। मंसूरपुर के किसान राधा रमन मिश्रा और प्रांशु मिश्रा ने बताया कि बारिश के कारण मक्का सुखाने में हो रही दिक्कतों ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि यदि मौसम का यही हाल रहा, तो अगले साल वे मक्का की खेती करने से तौबा कर लेंगे। किसानों का कहना है कि मक्का की खेती में पहले ही पानी, उर्वरक, और दवाओं पर भारी खर्च आता है। इसके बावजूद, यदि फसल खराब हो जाए या मंडी में उचित दाम न मिले, तो यह उनके लिए आर्थिक रूप से विनाशकारी होगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में बारिश का प्रभाव
सांडी-कन्नौज मार्ग पर पड़ी मक्का न केवल स्थानीय किसानों की मेहनत का प्रतीक है, बल्कि उनकी आजीविका का आधार भी है। बारिश के कारण फसल को बार-बार ढकना और सुखाने की प्रक्रिया दोहराना किसानों के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से थकाऊ साबित हो रहा है। उमरौली जैतपुर, लालपुर, और हैदराबाद जैसे गांवों के किसानों ने बताया कि बारिश की अनिश्चितता ने उनकी नींद उड़ा दी है। कई किसानों ने मक्का को सुरक्षित रखने के लिए तिरपाल का उपयोग शुरू किया है, लेकिन बार-बार बारिश होने से यह उपाय भी पूरी तरह कारगर नहीं हो रहा।
किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि मक्का सुखाने के लिए सामुदायिक स्तर पर शेड या गोदाम जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि बारिश के मौसम में फसल को सुरक्षित रखा जा सके। इसके अलावा, मंडियों में मक्का की गुणवत्ता जांच के लिए उचित मापदंड और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनिश्चित करने की मांग भी उठ रही है। किसानों का कहना है कि यदि सरकार उनकी समस्याओं पर ध्यान दे, तो इस तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है।
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