Hardoi News: SP ने 84 कोसीय परिक्रमा के 5वें पड़ाव का स्थलीय निरीक्षण किया, श्रद्धालुओं की आस्था से सज रहा परिक्रमा मार्ग

पूर्णिमा को होलिका दहन के शुभ मुर्हूत में मिश्रिख के दधीच कुंड पर सम्पन्न होती है। विशेष बात यह है कि इस परिक्रमा पथ पर पड़ने वाले 11 पड़ावों में सात पड़ाव- कोरौना, देवगवां, ...

Mar 6, 2025 - 00:22
Mar 6, 2025 - 00:23
 0  117
Hardoi News: SP ने 84 कोसीय परिक्रमा के 5वें पड़ाव का स्थलीय निरीक्षण किया, श्रद्धालुओं की आस्था से सज रहा परिक्रमा मार्ग

By INA News Hardoi.

बुधवार को एसपी नीरज कुमार जादौन ने हरदोई से होकर निकलने वाली 84 कोसीय परिक्रमा को सकुशल सम्पन्न कराने के दृष्टिगत थाना टड़ियावां क्षेत्रांतर्गत पांचवे पड़ाव स्थल साखिन गोपालपुर, द्रोणाचार्य घाट की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया एवं परिक्रमा मार्ग का भ्रमण कर संबंधित को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। सतयुगीन तीर्थ नैमिषारण्य में यह परिक्रमा प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की अमावस्या के बाद की प्रतिपदा से प्रारंभ होकर पूर्णिमा को संपन्न होती है। हिंदू धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि जो मनुष्य नैमिष तीर्थ की मोक्षदायी 84 कोसी परिक्रमा कर लेता है वह चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्त हो जाता है। डंका बजाये जाने के साथ 84 कोस (252 किलोमीटर) की एक पखवारे तक चलने वाली इस परिक्रमा का शुभारम्भ फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा को चक्रतीर्थ में डुबकी लगाकर सिद्धविनायक जी पूजा-अर्चना के साथ होता है।पूर्णिमा को होलिका दहन के शुभ मुर्हूत में मिश्रिख के दधीच कुंड पर सम्पन्न होती है। विशेष बात यह है कि इस परिक्रमा पथ पर पड़ने वाले 11 पड़ावों में सात पड़ाव- कोरौना, देवगवां, मड़रूआ, जरिगवां, नैमिषारण्य, कोल्हुआ बरेठी व मिश्रिख सीतापुर जिले में पड़ते हैं और पांच पड़ाव-हरैया, नगवा कोथावां, गिरधरपुर उमरारी व साक्षी गोपालपुर हरदोई जनपद में पड़ते हैं। ये सारे पड़ाव पार कर परिक्रमार्थियों का दल 11वें दिन महर्षि दधीचि की नगरी मिश्रिख शेष पांच दिनों में मिश्रिख तीर्थ की पंचकोसी परिक्रमा करता है।फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिकादहन से पूर्व दधीचि कुंड में स्नान व आचमन-पूजन के साथ 84 कोसी परिक्रमा संपन्न होती है। इस दल परिक्रमा में भाग लेने वाले साधु-संत व श्रद्धालु जब हाथी, घोड़ों और पैदल यात्रा करते जयकारों के साथ विभिन्न वाद यंत्रों को बजाते हुए भजन कीर्तन के साथ परिक्रमा करते हैं तथा प्रशासन व जनसामान्य द्वारा पुष्पवर्षा द्वारा अभिनन्दन किया जाता है तो इस दिव्य तीर्थ की रौनक देखते ही बनती है।

  • सर्वप्रथम महर्षि दधीच ने की थी नैमिष की 84 कोसी परिक्रमा

नैमिषारण्य की 84 कोसी परिक्रमा अपने आप में अत्यंत अद्भुत है। इस परिक्रमा की कथा महर्षि दधीच के देहदान से जुड़ी है। कहा जाता है अपनी अस्थियों का बलिदान देने से पूर्व महर्षि दधीच ने तीनों ऋणों से मुक्त होने और मोक्ष की कामना से त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु व महेश) और साधु संन्यासियों के साथ सर्वप्रथम इस तीर्थ क्षेत्र की चौरासी कोसीय परिक्रमा की थी। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार सतयुग के उपरांत त्रेतायुग में रावण वध के कारण भगवान राम को जब ब्रह्म हत्या का पाप लगा था तो कुलगुरु वशिष्ठ के कहने पर उन्होंने नैमिषारण्य की चौरासी कोसी परिक्रमा कर तीर्थ में स्नान कर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पायी थी। वहीं महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में भी उल्लेख मिलता है कि महाभारत युद्ध के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा इस तीर्थ की चौरासी कोसी परिक्रमा कर यहां हजारों वर्ष तक कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न को स्वयं महादेव शिव ने इस तीर्थ को ‘धर्मारण्य’ के रूप में प्रसिद्ध होने का वरदान दिया था।

Also Read: Maha Kumbh 2025: महाकुम्भ में नाविक को मिला कुबेर का खजाना, 45 दिनों में 30 करोड़ रुपये कमाए, CM योगी ने सुनाई सक्सेस स्टोरी

नैमिषराण्य तीर्थ के 84 कोसीय परिक्रमा पथ के प्रमुख तीर्थस्थलों में चक्रतीर्थ सरोवर, श्री सिद्धि विनायक धाम, व्यासपीठ, सूत गद्दी, मनु-सतरूपा तपस्थली, श्रीराम की अश्वमेघ यज्ञशाला, आदि गंगा गोमती घाट, हनुमान गढ़ी, पाण्डव किला, प्राचीन भूतेश्वर मन्दिर, हत्याहरण तीर्थ (ब्रह्म सरोवर),पंच प्रयाग, दशावतार मंदिर, मां ललितादेवी धाम और मिश्रिख का दधीचि कुंड हैं। इसके साथ ही ऋषियों, संतों व अवतारी सत्ताओं की इस पावन भूमि पर साधु-संतों व महंतों के सैकड़ों आश्रम हैं। बड़ी संख्या में जिनके अनुयायी इस परिक्रमा यात्रा में शामिल होने के लिए फाल्गुन मास में यहां जुटते हैं। इनमें ब्रह्मलीन स्वामी श्रीनारदानंद महाराज का आश्रम विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहां आज भी वैदिक युगीन प्राचीन आश्रम पद्धति से बच्चों को शिक्षा दी जाती है।पंचप्रयाग सरोवर के किनारे पुराणकालीन अक्षयवट नामक वृक्ष है। यहां का ललितादेवी धाम मां दुर्गा के 108 सिद्धपीठों में शुमार है। इसके साथ ही गोवर्धन महादेव, क्षेमकाया देवी, जानकी कुंड के साथ ही अन्नपूर्णा, धर्मराज मंदिर तथा विश्वनाथजी का भी मंदिर है जहां पिण्डदान भी होता है। पौराणिक आख्यानकों के अनुसार जो व्यक्ति संपूर्ण परिक्रमा न कर सके वह यदि मिश्रित तीर्थ में पांच दिनों तक पंचकोसी परिक्रमा करेगा तो उसे पुण्य का लाभ मिलेगा। ललिता देवी मंदिर के प्रधान पुजारी एवं कालीपीठ के संस्थापक जगदंबा पुजारी ने बताया कि एक पौराणिक आख्यानक के अनुसार महर्षि दधीचि के अस्थिदान में आए सभी देवों एवं तीर्थगणों ने चक्र गिरे स्थान से चौरासी कोस की परिधि में अपना विश्राम स्थल बनाया था। भगवान श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के समय यही चौरासी कोसी परिक्रमा यज्ञ की सफलता हेतु की गई थी। 

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow