संविधान संशोधन विधेयक के खारिज होने पर हुमायूं कबीर का प्रहार; बोले- 'बहुमत के अहंकार में मनमानी कर रही सरकार।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी बेबाक बयानबाजी के लिए पहचाने जाने वाले आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के संस्थापक
- AJUP संस्थापक ने हिंदू राष्ट्र की कोशिशों पर जताई चिंता, कहा- "संविधान को बदलने का प्रयास सफल नहीं होने देगी जनता"
- सोनिया गांधी की पहल को किया याद, कबीर का दावा- "एक विचारधारा विशेष को थोपने की कोशिश भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ"
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी बेबाक बयानबाजी के लिए पहचाने जाने वाले आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के संस्थापक और लोकसभा चुनाव 2026 के उम्मीदवार हुमायूं कबीर ने संसद में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के गिर जाने पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने इस घटनाक्रम को देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक चुनौतीपूर्ण संकेत बताया है। कबीर ने कहा कि जिस प्रकार लोकसभा में महत्वपूर्ण संशोधनों को खारिज किया गया, वह यह दर्शाता है कि वर्तमान सत्ता पक्ष केवल अपने हितों और अपनी विशिष्ट विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। उनके अनुसार, यह स्थिति केवल संसद की नहीं, बल्कि उस संवैधानिक भावना की हार है जो देश के हर नागरिक को समानता और न्याय का अधिकार देती है। हुमायूं कबीर ने अपने संबोधन में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा अतीत में की गई पहलों का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक समय था जब महिला आरक्षण और संविधान को अधिक समावेशी बनाने के लिए सोनिया गांधी ने गंभीर प्रयास किए थे, लेकिन राजनीतिक बाधाओं और सर्वसम्मति के अभाव के कारण वे प्रयास अपने तार्किक अंत तक नहीं पहुंच पाए। कबीर का तर्क है कि तब से लेकर अब तक, प्रगति की गति अत्यंत सीमित रही है। उन्होंने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में केवल सत्ता का केंद्रीकरण हुआ है, जबकि असल लोकतांत्रिक सुधार हाशिए पर चले गए हैं।
लोकसभा में विधेयक के खारिज होने के तकनीकी और राजनीतिक पहलुओं पर बात करते हुए कबीर ने सत्ता पक्ष की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार अपनी प्रचंड बहुमत की शक्ति का उपयोग जनकल्याण के बजाय अपनी 'मनमानी' को थोपने के लिए कर रही है। हुमायूं कबीर के अनुसार, संसदीय गरिमा को दरकिनार कर केवल उन नीतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है जो एक विशेष राजनीतिक एजेंडे को पुष्ट करती हों। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि बहुमत का उपयोग केवल विपक्ष की आवाज दबाने और महत्वपूर्ण विधेयकों को कमजोर करने के लिए किया जाएगा, तो देश के आम नागरिक का न्यायपालिका और विधायिका से विश्वास डगमगा सकता है। एजेयूपी नेता ने एक और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि परदे के पीछे से देश के बुनियादी ढांचे यानी संविधान को बदलने की साजिश रची जा रही है। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि कुछ शक्तियां भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र से हटाकर 'हिंदू राष्ट्र' बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं। कबीर ने कड़े शब्दों में कहा कि भारत की विविधता और इसकी बहुलतावादी संस्कृति ही इसकी असली ताकत है, और इसे किसी एक धार्मिक रंग में रंगने की कोशिश कभी सफल नहीं होगी। उनके अनुसार, बाबा साहब अंबेडकर द्वारा रचित संविधान देश के हर धर्म और संप्रदाय को सुरक्षा प्रदान करता है, और इसे बदलने का कोई भी प्रयास देश की एकता और अखंडता के लिए घातक साबित होगा।
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक और संसदीय गणित
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 मुख्य रूप से लोकसभा की सीटों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) और सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव से जुड़ा था। अप्रैल 2026 में हुए मतदान के दौरान, यह विधेयक सदन में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह संशोधन क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ सकता है, जिसके बाद सरकार को इसे वापस लेना पड़ा या यह खारिज हो गया।
हुमायूं कबीर ने भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि शायद अब समय आ गया है जब देश को एक ऐसी वैकल्पिक सरकार की आवश्यकता है जो समावेशी हो। उन्होंने कहा कि यदि कोई ऐसी सरकार सत्ता में आती है जो वास्तव में संविधान की मूल भावना का सम्मान करती हो, तभी देश में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। कबीर का मानना है कि वर्तमान सरकार के तहत प्रगति की उम्मीद करना बेमानी है क्योंकि उनकी प्राथमिकताएं जनहित के बजाय वैचारिक वर्चस्व स्थापित करना है। उन्होंने आगामी चुनावों को संविधान को बचाने की लड़ाई करार दिया और जनता से अपील की कि वे देश के भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय लें। पश्चिम बंगाल की राजनीति में अल्पसंख्यक हितों की आवाज उठाने वाले कबीर ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी (AJUP) और उनके समर्थक किसी भी कीमत पर संविधान के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि संसद में जो कुछ भी हुआ, वह इस बात का सबूत है कि सरकार संवाद के बजाय टकराव की राजनीति में विश्वास रखती है। हुमायूं कबीर ने कहा कि वह जमीन पर उतरकर लोगों को इस बात के लिए जागरूक करेंगे कि कैसे धीरे-धीरे संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, यह लड़ाई केवल एक विधेयक की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के स्वरूप की है।
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