नमामि गंगे: भारत का बढ़ा मान, स्टॉकहोम वर्ल्ड वॉटर वीक में नदी संरक्षण के लिए ‘नमामि गंगे’ को दुनिया ने सराहा। 

New Delhi: नदियाँ और जल संसाधन सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, और इनका पुनर्जीवन राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। नदी पुनर्जीवन

By INA News Desk
Aug 27, 2025 - 18:06
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नमामि गंगे: भारत का बढ़ा मान, स्टॉकहोम वर्ल्ड वॉटर वीक में नदी संरक्षण के लिए ‘नमामि गंगे’ को दुनिया ने सराहा। 
भारत का बढ़ा मान, स्टॉकहोम वर्ल्ड वॉटर वीक में नदी संरक्षण के लिए ‘नमामि गंगे’ को दुनिया ने सराहा। 
हाइलाइट्स
  • गंगा के विस्तृत प्रवाह वाले प्रदेश के रूप में उत्तर प्रदेश नमामि गंगे कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र रहा
  • वाराणसी में रिवरफ्रंट, कानपुर में सीवेज शोधन संयंत्रों तथा छोटे एवं मझौले नगरों में सामुदायिक भागीदारी पहलों ने अभियान को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया
  • विशेषज्ञों ने की भावुक अपील-शहर अब केवल उपभोक्ता नहीं, नदी बेसिन के सक्रिय संरक्षक बनें
  • 40 हज़ार करोड़ से गंगा पुनर्जीवन की ऐतिहासिक पहल, जन आंदोलन बना नमामि गंगे अभियान
  • हाइब्रिड एन्यूटी से लेकर सोलर एसटीपी तक नई तकनीक ने बढ़ाया भरोसा

नई दिल्ली/लखनऊ। नदियाँ और जल संसाधन सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, और इनका पुनर्जीवन राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। नदी पुनर्जीवन और जल संरक्षण में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की अग्रणी पहलों ने इसे वैश्विक जल संवाद में एक प्रमुख आवाज बना दिया है। इस वर्ष स्टॉकहोम वर्ल्ड वॉटर वीक में इसकी भागीदारी भारत की बढ़ती भूमिका को उजागर करती है, जो जल संबंधी वैश्विक चुनौतियों के समाधान में अहम योगदान दे रही है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल वॉटर इंस्टीट्यूट (SIWI) द्वारा वर्ष 1991 से आयोजित यह प्रतिष्ठित आयोजन अब वैश्विक नीति निर्धारकों, वैज्ञानिकों, उद्योग विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए सबसे प्रभावशाली मंच बन चुका है। 

गंगा के विस्तृत प्रवाह वाले प्रदेश के रूप में उत्तर प्रदेश नमामि गंगे कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र रहा है। वाराणसी में रिवरफ्रंट विकास, कानपुर में सीवेज शोधन संयंत्रों की स्थापना तथा छोटे एवं मझौले नगरों में सामुदायिक भागीदारी आधारित पहलें इस अभियान को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रही हैं।

इस प्रतिष्ठित सम्मेलन का केंद्र बिंदु बना "नदी शहरों की पुनर्कल्पना: जलवायु-संवेदी और बेसिन-केंद्रित शहरी विकास", जिसमें राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG), राष्ट्रीय शहरी कार्य संस्थान (NIUA) और जर्मन विकास सहयोग (GIZ) ने मिलकर नेतृत्व किया। इस सत्र में विशेषज्ञों ने जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण की चुनौतियों के बीच, नदी-केंद्रित विकास ही शहरों को टिकाऊ और सुरक्षित बना सकता है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक श्री राजीव कुमार मित्तल ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि नमामि गंगे मिशन ने भारत में नदियों के पुनरुद्धार के लिए एक ऐतिहासिक नीतिगत बदलाव की नींव रखी है। उन्होंने बताया कि इस मिशन के तहत अब तक 40 हजार करोड़ रुपये का भारी निवेश किया जा चुका है, जो गंगा और उसकी सहायक नदियों को उनके प्राचीन रूप में पुनः स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि नमामि गंगे मिशन एक जीवित उदाहरण है, जो यह साबित करता है कि जब आधुनिक तकनीक और नवाचार का संगम होता है, तो नदियों को पुनः जीवनदायिनी बनाने में सफलता प्राप्त की जा सकती है। 

उन्होंने बताया कि मिशन के अंतर्गत की गई पहलें, जैसे हाइब्रिड एनीटी मॉडल आधारित एसटीपी, सोलर पावर्ड ट्रीटमेंट प्लांट और मृदा जैव प्रौद्योगिकी, वैश्विक मानकों को स्थापित करने में योगदान दे रही हैं। श्री मित्तल ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस कार्यक्रम को एक विशाल जन आंदोलन में बदला गया है, जिसके सकारात्मक परिणाम अब सामने आ रहे हैं। वैश्विक सहयोगों की अहमियत को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि विश्व बैंक, जीआईजेड, सी-गंगा, नीदरलैंड्स और डेनमार्क का सहयोग नदी विज्ञान, जल सुरक्षा और प्रबंधन में उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

सम्मेलन में विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण की समस्याओं का हल केवल नदी-बेसिनों के संरक्षण और प्रबंधन में ही छुपा है। इस संदर्भ में भारत की 'नमामि गंगे' पहल को आदर्श उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसे अन्य देशों के लिए अनुकरणीय माना गया। प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती, आर्द्रभूमि संरक्षण और जलवायु-स्मार्ट शहरी विकास जैसे कदमों ने इस मिशन को वैश्विक स्तर पर प्रेरणा का स्रोत बना दिया है।

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अब समय आ गया है जब शहरों को केवल उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि नदी-बेसिनों के सक्रिय संरक्षक के रूप में कार्य करना होगा। जलवायु परिवर्तन के दौर में नदियों का संरक्षण अनिवार्य बन चुका है और इसके लिए नदी-केंद्रित शहरी विकास को अपनाना होगा।

सत्र के समापन में यह महत्वपूर्ण संदेश सामने आया – जब शहर मिलकर काम करेंगे और सीमा पार सोचेंगे, तो नदियों को बचाया जा सकता है और उन्हें समृद्ध भी किया जा सकता है। यही स्थिरता और समृद्धि का वास्तविक आधार होगा, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करेगा।

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