Politics: जनगणना पर सियासी घमासान, सचिन पायलट ने उठाए सरकार की मंशा पर सवाल, तेलंगाना मॉडल की वकालत।
भारत की सियासत में एक बार फिर जनगणना और जातिवार जनगणना का मुद्दा गरमाया, जब कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार की हालिया जनगणना अधिसूचना...
भारत की सियासत में एक बार फिर जनगणना और जातिवार जनगणना का मुद्दा गरमाया, जब कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार की हालिया जनगणना अधिसूचना पर तीखे सवाल उठाए। कांग्रेस महासचिव और राजस्थान के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट ने 17 जून 2025 को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि 16 जून 2025 को जारी जनगणना अधिसूचना में जातिवार जनगणना का स्पष्ट उल्लेख न होने और अपर्याप्त बजट आवंटन से सरकार की मंशा पर सवाल उठते हैं। पायलट ने तेलंगाना में कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए जातिगत सर्वेक्षण को “तेलंगाना मॉडल” के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने की मांग की और चेतावनी दी कि जाति जनगणना का हाल कहीं महिला आरक्षण विधेयक जैसा न हो, जो 2023 में पारित होने के बावजूद लागू नहीं हुआ। इस सियासी विवाद ने सोशल मीडिया से लेकर संसद तक बहस को हवा दी।
- अधिसूचना और कांग्रेस का हमला
16 जून 2025 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2027 में होने वाली भारत की 16वीं जनगणना के लिए गजट अधिसूचना जारी की। यह जनगणना 2011 की पिछली जनगणना के 16 साल बाद होगी, क्योंकि 2021 में कोविड-19 महामारी के कारण यह टल गई थी। गृह मंत्रालय ने दावा किया कि इस बार जनगणना में जातिगत गणना भी शामिल होगी, जो आजादी के बाद पहली बार होगा। अधिसूचना के अनुसार, जनगणना दो चरणों में होगी: पहला चरण 1 अक्टूबर 2026 से चार पहाड़ी राज्यों (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, और लद्दाख) में शुरू होगा, और दूसरा चरण 1 मार्च 2027 से बाकी राज्यों में। प्राइमरी डेटा मार्च 2027 तक और विस्तृत डेटा दिसंबर 2027 तक जारी होने की उम्मीद है।
हालांकि, कांग्रेस ने इस अधिसूचना में जातिवार जनगणना का स्पष्ट उल्लेख न होने पर आपत्ति जताई। सचिन पायलट ने 17 जून को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “केंद्र सरकार ने अधिसूचना में जातिगत जनगणना का जिक्र नहीं किया, जिससे भ्रम की स्थिति है। सरकार की मंशा साफ नहीं दिखती।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जनगणना के लिए आवंटित 574.80 करोड़ रुपये का बजट बेहद कम है, जबकि इस प्रक्रिया के लिए 8,000-10,000 करोड़ रुपये की जरूरत है। पायलट ने कहा, “यह वैसा ही है जैसे महिला आरक्षण विधेयक, जो 2023 में पारित हुआ, लेकिन लागू होने में वर्षों लगेंगे।”
पायलट ने तेलंगाना मॉडल को अपनाने की वकालत की, जहां कांग्रेस सरकार ने 2024 में एक विस्तृत जातिगत सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण की प्रश्नावली विभिन्न सामाजिक वर्गों के परामर्श से तैयार की गई थी, जो सामाजिक-आर्थिक स्थिति, शिक्षा, और रोजगार जैसे पहलुओं को कवर करती है। पायलट ने कहा, “तेलंगाना मॉडल पारदर्शी और समावेशी है। केंद्र को इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना चाहिए।”
- जाति जनगणना का सियासी इतिहास
जातिगत जनगणना का मुद्दा भारत की राजनीति में लंबे समय से विवादास्पद रहा है। आजादी से पहले, 1881 से 1931 तक ब्रिटिश शासन के दौरान सभी जातियों की गणना होती थी। लेकिन 1951 में स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) को छोड़कर अन्य जातियों की गणना बंद कर दी गई। 1979 में मंडल कमीशन ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की, जिसे 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने लागू किया। तब से OBC नेताओं, जैसे लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव, ने जातिगत जनगणना की मांग की, ताकि उनकी आबादी का सटीक आंकड़ा सामने आए।
2011 में मनमोहन सिंह सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) कराई, लेकिन इसके जातिगत आंकड़े कभी सार्वजनिक नहीं किए गए। कांग्रेस का दावा है कि उसने हमेशा जाति जनगणना का समर्थन किया, जबकि भाजपा ने इसे “वोट बैंक की राजनीति” करार दिया। 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और INDIA गठबंधन ने जाति जनगणना को प्रमुख मुद्दा बनाया, जिसका असर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में दिखा। राहुल गांधी ने बार-बार कहा कि जाति जनगणना “देश का एक्स-रे” है, जो सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को उजागर करेगा।
30 अप्रैल 2025 को मोदी सरकार ने कैबिनेट बैठक में जाति जनगणना को मंजूरी दी, जिसे विपक्ष ने अपनी जीत बताया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि यह जनगणना मूल जनगणना का हिस्सा होगी और पारदर्शी होगी, क्योंकि राज्यों के सर्वेक्षणों ने भ्रम पैदा किया है।
- कांग्रेस के सवाल: देरी, बजट, और मंशा
कांग्रेस ने जनगणना में देरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2020 में जनगणना की तैयारियां अंतिम चरण में थीं, लेकिन सरकार ने इसे टाल दिया। पायलट ने पूछा, “जब 2021 में चुनाव और अन्य सर्वेक्षण हो सकते थे, तो जनगणना में छह साल की देरी क्यों?” उन्होंने यह भी कहा कि 2027 तक की समयसीमा और कम बजट से लगता है कि सरकार जानबूझकर देरी कर रही है।
कांग्रेस ने यह आशंका भी जताई कि जाति जनगणना का हाल महिला आरक्षण विधेयक जैसा हो सकता है, जो जनगणना और परिसीमन से जुड़ा होने के कारण 2029 तक लागू नहीं होगा। पायलट ने कहा, “जाति जनगणना का उद्देश्य सिर्फ जाति गिनना नहीं, बल्कि यह जानना है कि विभिन्न वर्गों की शैक्षिक, आर्थिक, और सामाजिक स्थिति क्या है।”
सोशल मीडिया पर भी कांग्रेस ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। @INCIndia ने ट्वीट किया, “जनगणना अधिसूचना में जाति का जिक्र नहीं। देश के 90% लोगों को धोखा क्यों दे रहे हैं नरेंद्र मोदी?” एक अन्य ट्वीट में उन्होंने तेलंगाना मॉडल की तारीफ की और भाजपा के मॉडल को “बंद कमरे में तैयार” बताया।
- भाजपा का पलटवार: “कांग्रेस को दृष्टिदोष”
भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अधिसूचना में जाति जनगणना शामिल है, और कांग्रेस को “दृष्टिदोष” है। प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “अगले साल से शुरू होने वाली जनगणना में जाति को शामिल किया जाएगा। कांग्रेस बेबुनियाद सवाल उठा रही है।” भाजपा ने यह भी दावा किया कि कांग्रेस ने मनमोहन सिंह सरकार में जाति जनगणना के आंकड़े जारी नहीं किए, जबकि मोदी सरकार इसे पारदर्शी तरीके से करेगी।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि राज्यों, जैसे बिहार और तेलंगाना, के सर्वेक्षण गैर-पारदर्शी थे, और केंद्र की जनगणना संवैधानिक रूप से वैध होगी। उन्होंने कांग्रेस पर “वोट बैंक की राजनीति” का आरोप लगाया।
- तेलंगाना मॉडल: क्यों है खास?
तेलंगाना में 2024 में कांग्रेस सरकार ने एक व्यापक जातिगत सर्वेक्षण किया, जिसे “तेलंगाना मॉडल” कहा जा रहा है। इसकी प्रश्नावली में जाति के साथ-साथ आय, शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक स्थिति जैसे सवाल शामिल थे। यह सर्वेक्षण विभिन्न सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों के परामर्श से तैयार किया गया, जिसे कांग्रेस पारदर्शी और समावेशी मानती है। पायलट ने कहा, “यह मॉडल समाज के सभी वर्गों की वास्तविक स्थिति दर्शाता है, और केंद्र को इसे अपनाना चाहिए।”
जाति जनगणना के आंकड़े सामाजिक-आर्थिक नीतियों, आरक्षण, और संसाधन वितरण के लिए महत्वपूर्ण होंगे। अगर OBC की आबादी 1931 के मुकाबले ज्यादा निकली, तो 27% आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग तेज हो सकती है। कांग्रेस ने पहले ही 50% आरक्षण की सीमा हटाने की बात कही है।
हालांकि, कुछ आलोचकों का मानना है कि जाति जनगणना सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दे सकती है। भाजपा ने पहले इसे “समाज को बांटने” वाला मुद्दा कहा था, लेकिन 2024 के चुनावी नुकसान के बाद उसने रुख बदला। बिहार जैसे राज्यों में, जहां 2025 के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं, यह मुद्दा क्रेडिट की जंग बन सकता है।
2027 की जनगणना और जातिवार जनगणना को लेकर शुरू हुआ सियासी घमासान भारत की सामाजिक और राजनीतिक गतिशीलता को दर्शाता है। सचिन पायलट और कांग्रेस ने अधिसूचना में स्पष्टता की कमी, कम बजट, और देरी पर सवाल उठाकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया। तेलंगाना मॉडल की वकालत और महिला आरक्षण विधेयक की तुलना ने इस मुद्दे को और गर्म कर दिया।
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