धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त, सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के बाहर आरक्षण को बताया अवैध

यह फैसला आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस पूर्ववर्ती निर्णय की पुष्टि करता है जिसमें एक ईसाई पादरी द्वारा दायर शिकायत को खारिज कर दिया गया था। संबंधित मामले में, शिकायतकर्ता ने अनुसूचित जाति औ

Mar 25, 2026 - 00:11
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धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त, सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के बाहर आरक्षण को बताया अवैध
धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त, सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के बाहर आरक्षण को बताया अवैध

  • सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित नहीं ले सकेंगे एससी/एसटी एक्ट और आरक्षण का लाभ
  • आस्था बदलते ही खत्म होंगे संवैधानिक अधिकार: शीर्ष अदालत ने धर्मांतरण के बाद जातिगत लाभ पर लगाई पूर्ण रोक

भारत की सर्वोच्च अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी संवैधानिक निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा केवल उन व्यक्तियों तक सीमित है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं। न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मंगलवार को दिए गए अपने फैसले में यह व्यवस्था दी कि यदि कोई व्यक्ति इन तीन धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म, जैसे ईसाई या इस्लाम, को अपनाता है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है, तो वह स्वतः ही अनुसूचित जाति का सदस्य होने का अपना कानूनी अधिकार खो देता है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि धर्मांतरण केवल व्यक्तिगत आस्था का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह उन सभी विशेष संवैधानिक और वैधानिक लाभों के अंत का प्रतीक है जो विशेष रूप से अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित किए गए हैं।

यह फैसला आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस पूर्ववर्ती निर्णय की पुष्टि करता है जिसमें एक ईसाई पादरी द्वारा दायर शिकायत को खारिज कर दिया गया था। संबंधित मामले में, शिकायतकर्ता ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया था, लेकिन न्यायालय ने पाया कि वह व्यक्ति कई वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था और एक चर्च में पादरी के रूप में कार्यरत था। सर्वोच्च अदालत ने माना कि चूंकि ईसाई धर्म में जातिगत भेदभाव या छुआछूत जैसी प्रथाओं को सिद्धांततः स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए धर्मांतरित व्यक्ति उस श्रेणी का हिस्सा नहीं रह सकता जिसे ऐतिहासिक रूप से इन सामाजिक बुराइयों के कारण आरक्षण और सुरक्षा प्रदान की गई थी।

न्यायालय ने अपने फैसले का आधार 'संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950' को बनाया। इस आदेश के खंड 3 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। बेंच ने कहा कि यह वैधानिक बाधा पूर्ण (Absolute) है और इसमें किसी भी प्रकार का कोई अपवाद स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति एक ही समय में ईसाई धर्म जैसे अन्य मतों का पालन करते हुए अनुसूचित जाति की सदस्यता का दावा नहीं कर सकता। यह निर्णय उन हजारों मामलों को प्रभावित कर सकता है जहां धर्मांतरण के बाद भी लोग पुराने जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

इस कानूनी व्याख्या के दौरान पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जाति प्रमाण पत्र का रद्द न होना किसी व्यक्ति को आरक्षण या सुरक्षा का हकदार नहीं बना देता। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि व्यक्ति ने किसी अन्य धर्म को अपना लिया है और वह उसकी रीति-रिवाजों का पालन कर रहा है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा उसी क्षण से समाप्त माना जाएगा। न्यायालय ने यह भी तर्क दिया कि आरक्षण और विशेष कानून उन वर्गों के उत्थान के लिए हैं जिन्होंने सदियों से हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था के भीतर सामाजिक अपमान सहा है। धर्मांतरण के माध्यम से जब कोई व्यक्ति उस व्यवस्था को त्याग देता है, तो वह उन लाभों का दावा करने की नैतिकता और वैधानिकता भी खो देता है जो उसी व्यवस्था से उत्पन्न पिछड़ापन दूर करने के लिए बनाए गए थे। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में मूल रूप से केवल हिंदू धर्म को शामिल किया गया था। बाद में 1956 में इसे संशोधित कर सिख धर्म और 1990 में बौद्ध धर्म को इसमें जोड़ा गया। ईसाई और इस्लाम को इसमें शामिल नहीं किया गया क्योंकि ये धर्म सामाजिक समानता के सिद्धांत पर आधारित माने जाते हैं।

अदालत ने यह भी विस्तार से समझाया कि यदि कोई व्यक्ति वापस अपने मूल धर्म (हिंदू, सिख या बौद्ध) में लौटता है, तो उसे एससी का दर्जा पुनः प्राप्त करने के लिए कड़े मानदंडों को पूरा करना होगा। इसके लिए केवल मौखिक घोषणा पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि स्पष्ट साक्ष्य देने होंगे कि उसने नए धर्म को पूरी तरह त्याग दिया है और उसके मूल समुदाय ने उसे पुनः स्वीकार कर लिया है। वर्तमान मामले में, चूंकि व्यक्ति पादरी के रूप में कार्यरत था और नियमित रूप से प्रार्थना सभाएं आयोजित करता था, इसलिए अदालत ने उसकी दलित पहचान को पूरी तरह खारिज कर दिया। यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि संवैधानिक लाभ और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों के अपने-अपने दायरे हैं और इन्हें एक-दूसरे के लाभ के लिए नहीं मिलाया जा सकता।

न्यायालय के इस निर्णय का व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ना तय है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां दलित समुदायों के बीच धर्मांतरण की दर अधिक है, वहां सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और चुनावी आरक्षण पर इसका सीधा असर पड़ेगा। फैसले ने यह भी साफ कर दिया है कि अनुसूचित जाति के लिए बने विशेष कानून, जैसे कि एससी/एसटी एक्ट, उन लोगों पर लागू नहीं होंगे जो अब उस श्रेणी का हिस्सा नहीं हैं। इससे झूठे मुकदमों और आरक्षण के गलत उपयोग पर लगाम लगने की उम्मीद जताई गई है। पीठ ने कहा कि समानता के अधिकार का अर्थ यह नहीं है कि जो व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर चुका है, वह भी उसी सुरक्षा का पात्र बना रहे जो केवल पीड़ितों के विशिष्ट समूह के लिए है।

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