अजब गजब: घरेलू कामों के लिए पति से 2 लाख रुपये मासिक वेतन, बर्तन साफ करने, झाड़ू-पोंछा करने के लिए लेती है इतने पैसे।
हाल ही में एक खबर ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में तहलका मचा दिया। एक महिला ने दावा किया कि वह अपने पति से घरेलू कामों ....
Ajab Ghazab: हाल ही में एक खबर ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में तहलका मचा दिया। एक महिला ने दावा किया कि वह अपने पति से घरेलू कामों जैसे कपड़े धोने, बर्तन साफ करने, झाड़ू-पोंछा करने और बच्चों को खाना खिलाने के लिए हर महीने लगभग 2 लाख रुपये लेती है। इस खबर ने समाज में एक नई बहस छेड़ दी है: क्या घरेलू कामों को आर्थिक मूल्य देना चाहिए? क्या यह एक सशक्तिकरण की मिसाल है या पारिवारिक रिश्तों का व्यावसायीकरण? न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक गृहिणी ने सोशल मीडिया पर अपने अनोखे मॉडल का खुलासा किया।
इस महिला ने बताया कि वह घर पर रहकर पारंपरिक गृहिणी के सभी काम करती है, जिसमें झाड़ू-पोंछा, खाना बनाना, कपड़े धोना, बच्चों की देखभाल, और राशन की खरीदारी शामिल है। लेकिन इन कामों के लिए वह अपने पति से एक निश्चित "वेतन" लेती है। उसने हर काम के लिए अलग-अलग दरें तय की हैं, जैसे बर्तन धोने के लिए $300 (लगभग 25,599 रुपये), कपड़े धोने के लिए $140 (लगभग 11,946 रुपये), और बाथरूम की सफाई के लिए $240 (लगभग 20,478 रुपये)। इसके अलावा, बच्चों को पढ़ाने, राशन लाने, और अन्य छोटे-मोटे कामों के लिए भी अलग-अलग शुल्क हैं। कुल मिलाकर, वह अपने पति से हर महीने लगभग $2400 (लगभग 2 लाख रुपये) लेती है।
महिला का कहना है कि अगर पति इनमें से कोई काम खुद करता है, तो उस काम का शुल्क कट जाता है, जिससे पति को पैसे बचाने का विकल्प भी मिलता है। उसने यह भी कहा कि यह व्यवस्था उनके रिश्ते में पारदर्शिता और सम्मान लाती है, क्योंकि इससे उसके काम को आर्थिक मूल्य मिलता है।
- घरेलू कामों का आर्थिक मूल्य
भारतीय समाज में घरेलू कामों को अक्सर "महिलाओं का कर्तव्य" माना जाता है, और इन्हें आर्थिक रूप से महत्वहीन समझा जाता है। हालांकि, ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में महिलाएं घरेलू कामों और बच्चों की देखभाल में सालाना 10 ट्रिलियन डॉलर के बराबर का काम करती हैं, जिसका कोई भुगतान नहीं होता। भारत में, यह योगदान देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.1% है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि घरेलू काम न केवल समय और श्रम की मांग करता है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है।
इस महिला की कहानी इस सवाल को फिर से उठाती है कि क्या गृहिणियों के काम को औपचारिक रूप से वेतन के दायरे में लाना चाहिए। भारत में कई तलाक के मामलों में अदालतें गृहिणियों के घरेलू योगदान को मुआवजे के रूप में मान्यता दे चुकी हैं, लेकिन सामान्य जीवन में यह अवधारणा अभी भी नई है।
इस खबर ने सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की हैं। कुछ लोगों ने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की मिसाल बताया, क्योंकि यह घरेलू कामों को आर्थिक सम्मान देता है। एक यूजर ने लिखा, "यह एक क्रांतिकारी कदम है। गृहिणियों का काम अनदेखा किया जाता है, लेकिन यह मॉडल उनके श्रम को मूल्य देता है।" दूसरी ओर, कई लोगों ने इसे रिश्तों का "व्यावसायीकरण" करार दिया। एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, "पति-पत्नी का रिश्ता प्यार और विश्वास का होता है, न कि लेन-देन का। यह तो बीवी को नौकरानी बना देता है।"
भारत में, जहां पारिवारिक रिश्ते भावनात्मक और सामाजिक मूल्यों पर आधारित हैं, इस तरह की व्यवस्था को स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है। कई लोगों का मानना है कि घरेलू कामों के लिए पैसे लेना परिवार के भीतर विश्वास और सहयोग की भावना को कमजोर कर सकता है।
भारत में गृहिणियों की स्थिति जटिल है। एक ओर, समाज उन्हें परिवार की रीढ़ मानता है, लेकिन दूसरी ओर, उनके काम को अक्सर "काम" ही नहीं माना जाता। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय गृहिणियां औसतन 12-14 घंटे रोजाना घरेलू कामों और बच्चों की देखभाल में बिताती हैं, जो किसी पूर्णकालिक नौकरी से कम नहीं है। फिर भी, उन्हें न तो आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है और न ही सामाजिक मान्यता।
इस महिला की कहानी भारतीय गृहिणियों के लिए प्रेरणा हो सकती है, खासकर उन लोगों के लिए जो अपने काम को आर्थिक रूप से मान्यता दिलाना चाहती हैं। हालांकि, भारतीय समाज में इस मॉडल को लागू करना आसान नहीं होगा। यहां पति-पत्नी के बीच आर्थिक लेन-देन को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। साथ ही, कई परिवारों में पति की आय ही एकमात्र आय स्रोत होती है, जिससे इस तरह की व्यवस्था अव्यवहारिक हो सकती है।
- महिलाओं के लिए वैकल्पिक आय के स्रोत
इस खबर ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दे को उजागर किया है: गृहिणियों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता की आवश्यकता। भारत में कई गृहिणियां घर से काम शुरू कर रही हैं, जैसे सिलाई, खाना बनाने का व्यवसाय, या क्लाउड किचन। उदाहरण के लिए, बिहार की आंचल कुमारी ने मुख्यमंत्री उद्यमी योजना के तहत 10 लाख रुपये का लोन लेकर रेडीमेड गारमेंट्स का व्यवसाय शुरू किया, जो अब महीने में 2-3 लाख रुपये की बचत करता है।
इसी तरह, क्लाउड किचन एक लोकप्रिय विकल्प बन रहा है, जिसे 25,000 रुपये की कम लागत में शुरू किया जा सकता है। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि गृहिणियां अपने कौशल का उपयोग कर आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकती हैं, बिना अपने घरेलू कामों को व्यावसायिक बनाने के।
भारत में घरेलू कामों को आर्थिक मान्यता देने की मांग लंबे समय से उठ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में एक मामले में कहा था कि गृहिणियों के काम का आर्थिक मूल्यांकन होना चाहिए। कुछ देशों, जैसे वेनेजुएला, ने गृहिणियों को पेंशन देने की नीति लागू की है। भारत में भी इस दिशा में नीतिगत चर्चा हो सकती है, जैसे गृहिणियों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं या उनके काम को जीडीपी में शामिल करना।
यह मॉडल कई नैतिक सवाल भी उठाता है। क्या पति-पत्नी के बीच आर्थिक लेन-देन रिश्ते की गरिमा को कम करता है? क्या यह मॉडल उन परिवारों में काम कर सकता है जहां आर्थिक संसाधन सीमित हैं? साथ ही, यह सांस्कृतिक मान्यताओं को चुनौती देता है, जहां गृहिणी का काम "कर्तव्य" माना जाता है, न कि "नौकरी"।
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