Sitapur : राष्ट्रीय वन दिवस पर चिंता - वनों की कटाई से पर्यावरण और जीवन खतरे में

प्राचीन ग्रंथों में पूरे देश में 9 अरण्यों का जिक्र है, जिसमें सीतापुर के नैमिषारण्य का भी उल्लेख है। यह अरण्य कई जिलों तक फैला हुआ था। वैदिक काल में लोग वृक्षों की पूजा करते थे। आज भी बरगद, पीपल और

Mar 21, 2026 - 22:34
 0  2
Sitapur : राष्ट्रीय वन दिवस पर चिंता - वनों की कटाई से पर्यावरण और जीवन खतरे में
Sitapur : राष्ट्रीय वन दिवस पर चिंता - वनों की कटाई से पर्यावरण और जीवन खतरे में

सीतापुर। राष्ट्रीय वन दिवस सिर्फ गोष्ठी, सेमिनार या छोटे कार्यक्रमों का दिन नहीं है, बल्कि वनों के प्रति प्रेम, जागरूकता और संकल्प का महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिन मनुष्य के वनों के प्रति कर्तव्य की याद दिलाता है। आजादी के समय देश का लगभग 33 प्रतिशत भू-भाग वनों से ढका था। लेकिन अंधाधुंध कटाई से वन क्षेत्र बहुत कम हो गया है। वर्तमान में भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण लगभग 25 प्रतिशत है, जिसमें वन आवरण करीब 21.76 प्रतिशत है। यह पर्यावरण संतुलन के लिए चिंताजनक है। प्राचीन ग्रंथों में पूरे देश में 9 अरण्यों का जिक्र है, जिसमें सीतापुर के नैमिषारण्य का भी उल्लेख है। यह अरण्य कई जिलों तक फैला हुआ था। वैदिक काल में लोग वृक्षों की पूजा करते थे। आज भी बरगद, पीपल और नीम जैसे वृक्षों की पूजा होती है। लोग इनमें देवताओं का वास मानते हैं और पत्ते तोड़ने से पहले विनती करते हैं।

लेकिन प्लाईवुड कारखानों और आरा मशीनों के आने से लकड़ी उद्योग बन गई। लकड़कट्टों और वन माफियाओं ने हरे-भरे वृक्षों पर आरा चलाया। फलदार, छायादार और उपयोगी वृक्ष कट गए। जहां कभी घने आम, जामुन, इमली के बाग थे, वहां अब कंक्रीट के जंगल या कृषि भूमि बन गई। वन क्षेत्र भी सिकुड़ रहे हैं। मछरेहटा के धनधारी जंगल में अब सिर्फ कांटेदार झाड़ियां बची हैं। ग्राम सकरारा में वन भूमि पर अवैध कब्जे हो रहे हैं, लेकिन वन विभाग के अधिकारी चुप हैं।

सीतापुर में तंबौर क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्लाईवुड कारखाने हैं। शहर के आसपास भी कई कारखाने और आरा मशीनें चल रही हैं। प्रतिदिन हजारों क्विंटल लकड़ी की खपत होती है। फर्नीचर, दरवाजे और जलौनी लकड़ी के लिए वृक्ष कट रहे हैं। वनों की कटाई से वन्य जीव अब बस्तियों में आने लगे हैं, जिससे मनुष्य और जीवों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। बड़े वृक्ष कटने से पक्षियों का आवास छिन गया। हरियल कबूतर, गिद्ध, सफेद चील जैसे पक्षी विलुप्तप्राय हो गए। तोता, कठफोड़वा, नीलकंठ, उल्लू जैसे पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है। कई पक्षी प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं। वन विभाग लाखों पौधे लगाने का दावा करता है, लेकिन कितने बचते और पनपते हैं, इसकी सच्चाई जांच की जरूरत है। अगर सत्यापन हो तो दावे झूठे साबित हो सकते हैं।

Also Click : Sambhal : सम्भल में ईद की नमाज के बाद विरोध प्रदर्शन, काली पट्टी बांधकर जताया गुस्सा

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow