Special : रमज़ान की तालीम आज भी वही है... लेकिन कभी-कभी हम उसकी असल रूह को भूल जाते हैं- मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा

कहा कि इस बार एक बात ज़्यादा महसूस हुई कि इबादत के साथ दिखावे और रस्मों का चलन भी बढ़ रहा है। रमज़ान सादगी और तक़वा का महीना है, लेकिन कहीं-कहीं यह सिर्फ़ महफ़िलों और एहति

Mar 17, 2026 - 21:45
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Special : रमज़ान की तालीम आज भी वही है... लेकिन कभी-कभी हम उसकी असल रूह को भूल जाते हैं- मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा
Special : रमज़ान की तालीम आज भी वही है... लेकिन कभी-कभी हम उसकी असल रूह को भूल जाते हैं- मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा

देवबंद : मौजूदा रमज़ान और समाज में बदलती रवायतों को लेकर “INA” के संवादाता डॉक्टर शिबली इकबाल ने मशहूर आलिम-ए-दीन मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा से कुछ तीखे और अहम सवाल किए। मौलाना ने उनके जवाब शरियत की रौशनी में दिए, जो सोचने पर मजबूर करते हैं।

सवाल: आप इस्लाम के बड़े जानकारों में आते हैं! इस्लाम को गहराई और बारीकी से समझते और समझने की कोसिश करते हैं तो आपसे सबसे पहला सवाल ये हैं कि “अबके रमज़ान में आपने ऐसा क्या देखा जो पहले इस तरह कभी नज़र नहीं आया?

जवाब: इस बार एक बात ज़्यादा महसूस हुई कि इबादत के साथ दिखावे और रस्मों का चलन भी बढ़ रहा है। रमज़ान सादगी और तक़वा का महीना है, लेकिन कहीं-कहीं यह सिर्फ़ महफ़िलों और एहतिमाम तक सीमित होता दिख रहा है। मुसलमानों को चाहिए कि वह रमज़ान की रूह को समझें, सिर्फ़ उसकी शक्ल को नहीं।

सवाल: आजकल इफ्तार के नाम पर वीआईपी महफ़िलें और बड़ी-बड़ी पार्टियाँ भी दिखाई देती हैं, क्या यह रमज़ान की रूह के खिलाफ़ नहीं?

जवाब: रोज़ेदार को इफ्तार कराना बहुत बड़ा सवाब है, लेकिन शरियत यह सिखाती है कि इसमें सबसे पहला हक़ ग़रीबों और ज़रूरतमंदों का है। अगर इफ्तार का एहतिमाम दिखावे या हैसियत जताने का ज़रिया बन जाए तो हमें अपने रवैये पर दोबारा गौर करना चाहिए।

सवाल: क्या मुसलमान कहीं न कहीं रमज़ान की असल तालीम से दूर होते जा रहे हैं?

जवाब: रमज़ान की तालीम आज भी वही है जो पहले थी, लेकिन कभी-कभी हम उसकी असल रूह को भूल जाते हैं। अगर रोज़ा हमें सब्र, तक़वा और हमदर्दी नहीं सिखा रहा, तो हमें अपने आप से सवाल करना चाहिए कि हम रमज़ान से क्या हासिल कर रहे हैं।

सवाल: अगर समाज में कोई ग़लत रवायत बढ़ती नज़र आए तो उलेमा और अवाम का रवैया क्या होना चाहिए?

जवाब: शरियत हमें यह सिखाती है कि ग़लती पर हिकमत और अदब के साथ इस्लाह की बात की जाए। मक़सद किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाना होना चाहिए।

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