Trending: तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर में भगवान मुरुगन की पुण्य कलश स्थापना, भक्ति और आस्था का उत्सव शुरू। 

Tamil Nadu News: तमिलनाडु के तूतीकोरिन (थूथुकुडी) जिले में स्थित तिरुचेंदूर के अरुल्मिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में 7 जुलाई 2025 को भगवान मुरुगन की पुण्य कलश...

Jul 7, 2025 - 13:03
 0  43
Trending: तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर में भगवान मुरुगन की पुण्य कलश स्थापना, भक्ति और आस्था का उत्सव शुरू। 

तमिलनाडु के तूतीकोरिन (थूथुकुडी) जिले में स्थित तिरुचेंदूर के अरुल्मिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में 7 जुलाई 2025 को भगवान मुरुगन की पुण्य कलश स्थापना (कुंभभिषेकम) का पांचवां चरण शुरू हुआ। यह आयोजन भक्तों के बीच उत्साह और आस्था का प्रतीक बन गया, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। यह मंदिर भगवान मुरुगन के छह पवित्र स्थानों (अरुपदाई वीडु) में से दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है, जो बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित है। इस आयोजन में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी, जो भगवान मुरुगन के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने के लिए दूर-दूर से आए। पुण्य कलश स्थापना एक ऐसा धार्मिक अनुष्ठान है, जो मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा को और बढ़ाता है।

  • अरुल्मिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर

तिरुचेंदूर का अरुल्मिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन (जिन्हें कार्तिकेय, सुब्रह्मण्य, शनमुख, कांदा, सेंथिलनाथन आदि नामों से भी जाना जाता है) को समर्पित एक प्राचीन हिंदू मंदिर है। यह मंदिर तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले में बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित है, जो इसे अन्य पांच अरुपदाई वीडु मंदिरों से अलग बनाता है, क्योंकि ये सभी पहाड़ियों पर स्थित हैं। तिरुचेंदूर मंदिर को जयंतीपुरम के नाम से भी जाना जाता है और यह तमिलनाडु का चौथा मंदिर है, जिसे ISO प्रमाणन प्राप्त है।

इस मंदिर का इतिहास 2,000 वर्षों से भी पुराना माना जाता है। स्कंद पुराण और तिरुमुरुगट्टुपदाई जैसे प्राचीन ग्रंथों में इस मंदिर का उल्लेख है। यह मंदिर भगवान मुरुगन की उस विजय का प्रतीक है, जिसमें उन्होंने राक्षस सूरपद्मन का वध किया था। इस घटना को हर साल स्कंद षष्ठी और सूरसंहारम उत्सव के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह समुद्र तल से नीचे है, और यह आश्चर्यजनक है कि 2004 में आए हिंद महासागर सुनामी के बावजूद यह मंदिर पूरी तरह सुरक्षित रहा। मंदिर का राजा गोपुरम 150 फीट ऊंचा है, जिसमें नौ मंजिलें हैं। यह गोपुरम लगभग 300 वर्ष पुराना है और इसे श्री देशिकमूर्ति स्वामी ने बनवाया था। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर है, और यह दो प्राकारों (प्रांगणों) में खुलता है। पहला प्राकार यालियों (पौराणिक प्राणियों) की मूर्तियों से सजा हुआ है। गर्भगृह एक गुफा में स्थित है, जहां भगवान मुरुगन की मूर्ति एक संन्यासी बच्चे के रूप में स्थापित है। मंदिर के पास नझी किनारु नामक एक पवित्र कुआं है, जिसमें समुद्र के इतने नजदीक होने के बावजूद मीठा पानी निकलता है। भक्त समुद्र में स्नान करने के बाद इस कुएं के पानी से स्नान करते हैं, जो एक धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है।

  • पुण्य कलश स्थापना: क्या है यह अनुष्ठान?

पुण्य कलश स्थापना, जिसे कुंभभिषेकम के नाम से भी जाना जाता है, एक पवित्र हिंदू अनुष्ठान है, जिसमें मंदिर के विग्रहों (मूर्तियों) और गोपुरम को विशेष मंत्रों और पूजा के साथ पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। यह अनुष्ठान मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति को नवीनीकृत करने और भक्तों के लिए सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने के लिए किया जाता है। तिरुचेंदूर मंदिर में यह आयोजन कई चरणों में होता है, और 7 जुलाई 2025 को शुरू हुआ पांचवां चरण इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अवसर पर मंदिर को फूलों, रंगोली और दीपों से सजाया गया। भक्तों की भारी भीड़ सुबह 5 बजे से ही मंदिर में उमड़ने लगी, क्योंकि मंदिर सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। पुण्य कलश स्थापना के दौरान विशेष पूजाएं, होमम, और अभिषेकम आयोजित किए गए। मंदिर प्रबंधन ने इस आयोजन को भव्य बनाने के लिए व्यापक इंतजाम किए, और भक्तों के लिए विशेष दर्शन की व्यवस्था भी की गई।

  • भक्तों की आस्था और उत्साह

7 जुलाई 2025 को तिरुचेंदूर मंदिर में भगवान मुरुगन की पुण्य कलश स्थापना के लिए हजारों भक्त एकत्र हुए। भक्तों ने समुद्र तट पर स्नान किया और नझी किनारु के पवित्र जल से स्नान कर भगवान मुरुगन के दर्शन किए। कई भक्तों ने विशेष दर्शन के लिए 100 रुपये और 200 रुपये के टिकट खरीदे, ताकि वे गर्भगृह के करीब जाकर भगवान के अभिषेकम का दर्शन कर सकें। इस आयोजन में शामिल होने वाले भक्तों का कहना था कि मंदिर का वातावरण अत्यंत शांत और आध्यात्मिक था। एक भक्त ने X पर लिखा, "तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर में पुण्य कलश स्थापना के दौरान भगवान के दर्शन का अनुभव अविस्मरणीय था। समुद्र के किनारे यह मंदिर और भी खास लगता है।" एक अन्य भक्त ने कहा, "यहां की सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति का माहौल मन को शांति देता है।"

मंदिर में शनमुखर और जयंती नाथर के रूप में भगवान मुरुगन की दो उत्सव मूर्तियां हैं, जो विशेष अवसरों पर भक्तों के दर्शन के लिए निकाली जाती हैं। पुण्य कलश स्थापना के दौरान इन मूर्तियों का विशेष अभिषेक किया गया, जिसमें भक्तों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। मंदिर के शनमुख विलासम मंडपम, जो 124 स्तंभों वाला एक भव्य हॉल है, इस आयोजन का मुख्य केंद्र रहा।

  • मंदिर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व

तिरुचेंदूर मंदिर का पौराणिक महत्व स्कंद पुराण में वर्णित है। किंवदंती के अनुसार, राक्षस सूरपद्मन ने भगवान शिव से वरदान प्राप्त कर देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया था। उसने इंद्र को कैद कर लिया और उनकी पत्नी इंद्राणी पर बुरी नजर डाली। तब भगवान शिव के पुत्र मुरुगन ने सूरपद्मन से युद्ध किया। छह दिनों तक चले इस युद्ध में मुरुगन ने सूरपद्मन को हराया और उसे दो हिस्सों में विभाजित कर दिया, जो बाद में उनके वाहन मोर और मुर्गा बन गए। इस विजय को सूरसंहारम के रूप में हर साल कार्तिक मास में मनाया जाता है। मंदिर का एक और अनोखा इतिहास 1646-1648 के बीच डच ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे से जुड़ा है। डचों ने मंदिर से शनमुखर की उत्सव मूर्ति चुरा ली थी, लेकिन समुद्र में तूफान का सामना करने के बाद उन्होंने इसे समुद्र में फेंक दिया। बाद में, भगवान मुरुगन ने एक भक्त वडमलियप्पा पिल्लई को स्वप्न में दर्शन देकर मूर्ति का स्थान बताया, जिसे 1653 में समुद्र से निकाला गया। यह कहानी मंदिर के अंदर चित्रों में दर्शायी गई है।

तिरुचेंदूर मंदिर की कई विशेषताएं इसे अनूठा बनाती हैं। यह एकमात्र अरुपदाई वीडु मंदिर है, जो समुद्र तट पर स्थित है। मंदिर के पास वल्ली गुफा है, जहां भगवान मुरुगन की पत्नी वल्ली और दत्तात्रेय की मूर्तियां हैं। भक्तों के लिए यह गुफा भी दर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर का शनमुख विलासम मंडपम और वसंत मंडपम अपनी स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध हैं।

मंदिर में पंचलिंगम की पूजा भी की जाती है, जो गर्भगृह के पास एक छोटी गुफा में स्थित हैं। भक्तों का मानना है कि यहां पूजा करने से नवग्रहों के दोष दूर होते हैं और भगवान मुरुगन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसके अलावा, मंदिर का नझी किनारु एक चमत्कार है, जहां समुद्र के इतने करीब होने के बावजूद मीठा पानी उपलब्ध है। मंदिर का प्रबंधन तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ न्यास विभाग (HR&CE) द्वारा किया जाता है। इस आयोजन के लिए मंदिर प्रबंधन ने ऑनलाइन दर्शन और पूजा बुकिंग की सुविधा भी शुरू की है। हालांकि, कुछ भक्तों ने मंदिर के आसपास व्यावसायीकरण और एजेंटों की गतिविधियों की शिकायत की है, जो विशेष दर्शन के नाम पर अधिक पैसे मांगते हैं। मंदिर प्रबंधन से अनुरोध है कि वे भीड़ प्रबंधन और पारदर्शिता को और बेहतर करें।

तिरुचेंदूर के अरुल्मिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में 7 जुलाई 2025 को शुरू हुआ पुण्य कलश स्थापना का पांचवां चरण भक्तों के लिए आस्था और भक्ति का एक अनूठा अवसर रहा। समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर न केवल अपनी पौराणिक और ऐतिहासिक महत्ता के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी आध्यात्मिक शक्ति और शांत वातावरण के लिए भी प्रसिद्ध है। भगवान मुरुगन के प्रति भक्तों की अटूट श्रद्धा और इस आयोजन में उनकी उत्साहपूर्ण भागीदारी ने इसे और भी खास बना दिया। यह मंदिर तमिल संस्कृति और आध्यात्मिकता का प्रतीक है, जो लाखों भक्तों को एकजुट करता है। भविष्य में भी ऐसे आयोजन भक्तों को भगवान मुरुगन के करीब लाने और उनकी आस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

Also Read- UK News : ईमाम हुसैन की शहादत की याद में मोहर्रम मनाया गया, गम और सब्र के इस महीने से कर्बला युद्ध का इतिहास जुडा है

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।