Special Article: महिलाओं के प्रति हिंसा का मूल कारण हैं- सामाजिक और पारंपरिक बाधाएं
यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमंते तत्र देवता:। यत्रेतास्तु ना पूजन्यते सरवासत्राफला क्रिया:। मनुस्मृति में वर्णित इस श्लोक के अनुसार हमारी भारतीय संस्कृति
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भावना वरदान शर्मा |
यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमंते तत्र देवता:। यत्रेतास्तु ना पूजन्यते सरवासत्राफला क्रिया:। मनुस्मृति में वर्णित इस श्लोक के अनुसार हमारी भारतीय संस्कृति में स्त्रियों को देवियों की संज्ञा दी जाती है और माना जाता है जहां स्त्रियों का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं और जहां स्त्रियों का सम्मान नहीं होता वहां पर प्रत्येक कार्य निष्फल हो जाता है।
लेकिन विश्व की हर संस्कृति में अच्छाइयों के साथ-साथ बुराइयां भी व्याप्त होती हैं उनमें से एक है महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा। महिलाओं के साथ हिंसा का इतिहास सदियों पुराना है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव समाज की सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों भले ही परिवर्तित होती रहती है लेकिन महिलाओं के साथ हिंसा करने की जो प्रवृत्ति है और घटनाएं हैं वह आज भी समाज में एक ऐसी बुराई के रूप में उपस्थित है जिसने महिलाओं के आगे बढ़ने के रास्तो को ना केबल बाधित कर रखा है बल्कि स्त्रियों को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से दबाया हुआ है। महिला चाहे किसी भी सांस्कृतिक पृष्टभूमि से आती हो किसी भी उम्र की हो किसी भी वर्ग से आती हो लेकिन उसे अपने जीवन में कभी ना कभी किसी न किसी रूप में हिंसा का सामना करना पड़ता है और वह केवल इसलिए कि वह एक महिला है।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा यानि कि वायलेंस अगेंस्ट वूमेन VAW, इसे जेंडर बेस्ड वायलेंस GBV या सेक्स एंड जेंडर बेस्ड वायलेंस SGBV भी कहा जाता है। आमतौर पर देखा गया है कि महिलाओं की विरुद्ध जो हिंसा होती है वह महिलाओं को सामाजिक और पारिवारिक रूप से दबाने का तरीका होता है।
कारण- इसका दो सबसे महत्वपूर्ण कारण हैं । हर क्षेत्र में शक्ति का असमान वितरण और जीवन के असमान अवसर।
शक्ति यानी अधिकार (राइट्स)।
पहला- शिक्षा
कई क्षेत्रों में अभी भी बच्चियों को बुनियादी शिक्षा से वंचित रखा जाता है या उन्हें उच्च शिक्षा लेने का अधिकार प्राप्त नहीं होता।
कार्य क्षेत्र- महिलाकर्मियो को वर्कप्लेस में समान अवसर नहीं दिए जाते और पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है। निर्णय लेने की स्वतंत्रता-उन्हें उनकी इच्छा के अनुकूल कार्य क्षेत्र चुनने की स्वतंत्रता नहीं दी जाती और कहीं भी स्वतंत्र रूप से आने जाने पर प्रतिबंध लगाया जाता है। राजनीतिक कारणों की बात करे तो आज भी स्त्रियों की संख्या निर्णायक पदो पर बहुत कम है।
सांस्कृतिक कारण - सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में रूढ़िवादी सोच के चलते महिलाओं को परंपराओं के रूप में अनेक प्रकार के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता-भारतीय सामाजिक और पारिवारिक ढांचा कुछ इस प्रकार होता है कि पुरुष बाहर जाकर कार्य करते हैं महिलाएं घर संभालती हैं.. ऐसे में स्त्री पूर्ण रूप से पुरुषों पर आर्थिक रूप से निर्भर होती है। और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ना हो पाने के कारण जीवन पर्यंत पुरुषों के अधीन रहने पर मजबूर होती है। असुरक्षा की भावना-क्योंकि सदियों से पुरुषों द्वारा महिलाओं को अधीन समझा जाता है। और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं देखने को मिलती हैं। इसलिए महिलाएं असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होकर भी प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने से वंचित रह जाती है।
इन सभी कारणों को मद्देनजर रखते हुए यह कहा जा सकता है कि सामाजिक एवं पारिवारिक तंत्र में महिला और पुरुष के बीच में व्याप्त असमानता एक महत्वपूर्ण कारण है कि महिलाओं को पुरुषों के अधीन रहना पड़ता है और हिंसा का सामना करना पड़ता है। पूरे विश्व में हर तीन में से एक महिला को अपने जीवन काल में किसी परिचित अथवा अपरिचित व्यक्ति के द्वारा दुर्व्यवहार और हिंसा का सामना करना पड़ता है। फिर चाहे वह शारीरिक हिंसा हो ,मनोवैज्ञानिक हिंसा हो या किसी भी प्रकार की हिंसा हो। जेंडर बेस्ड वायलेंस या लिंग आधारित हिंसा एक ऐसी सामाजिक समस्या है जिसमें किसी भी महिला को शारीरिक, मानसिक या यौन रूप में प्रताड़ित किया जाता है केवल इसलिए कि वह महिला है।
हिंसा के विभिन्न रूप -
अब जो लिंग आधारित हिंसा है इसके भी अनेकों प्रकार हैं- पारिवारिक हिंसा- या घरेलू हिसा
यह जो हिंसा होती है यह किसी भी महिला के पति या उसके पारिवारिक सदस्यों द्वारा या ससुराली जनों द्वारा की जाती है । जिसमें अपमान, गाली गलौज ,मारपीट ,दुर्व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न शामिल है। इसके भी अनेकों कारण है। बचपन से ही बच्चियों के साथ असमानता बेटे और बेटी में भेद भाव करना, शिक्षा के असमान अवसर, जबरन विवाह, भ्रूण हत्या, गर्भपात, गर्भावस्था के दौरान मारपीट, बाल विवाह, वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप, पारंपरिक प्रथाएं जैसे सम्मान हत्या होनर किलिंग, दहेज हिंसा और अनेकों ऐसे कारण है।
घरेलू हिंसा की बात करें तो जन्म से ही बच्चियों को परिवार में उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है ,बेटे और बेटी में भेदभाव किया जाता है, विवाह उपरांत घरेलू हिंसा प्रसव के समय शारीरिक, मानसिक ,मौखिक रुप से की जानी वाली हिंसा है। वह जबरन गर्भपात हो या दहेज हिंसा हो या परिवारजनों या जीवन साथी के द्वारा की गई हिंसा हो।
सामाजिक हिंसा- कार्यस्थल सामाजिक और सार्वजनिक क्षेत्रों में यौन उत्पीड़न, धमकी, छेड़छाड़, यौन शोषण , एसिड अटैक , बलात्कार आदि, मानवाधिकारो का उलंघन जैसे वेश्यावृति के लिए मजबूर करना, मानव तस्करी, आर्थिक शोषण आदि।
यौन हिंसा -अब बात करते हैं महिलाओं के साथ सबसे अधिक होने वाली हिंसा जो है यौन हिंसा । देखिए यौन हिंसा जो है इसमें कोई भी व्यक्ति किसी महिला का यौन शोषण करता है या उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता है। चाहे वो सार्वजनिक स्थानों पर अवांछित स्पर्श और छेड़खानी की घटना हो या नाबालिग बच्चियों और वयस्क महिला के साथ बलात्कार हो । ये सभी यौन हिंसा की श्रेणी में आते हैं। हैरानी की बात है कि आज भी बलात्कार की घटना सबसे कम रिपोर्ट किया जाने वाला अपराध है और इसके कारण है कि किसी महिला का जब बलात्कार होता है तो उस पर इतना सामाजिक और पारिवारिक दवाब होता है , उसके परिवार की ओर से, रिश्तेदारों की तरफ से और बलात्कारी की ओर से मिलने वाली धमकियां कि वह अपने साथ हुए अन्याय की रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती और कई बार तो बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद उसे वापिस भी लिया जाता है। यौन हिंसा हमेशा ही किसी पुरुष द्वारा अपनी शक्ति का प्रयोग करके विपरीत लिंग पर अत्याचार करना होता है। और यह एक ऐसी समस्या है जो विश्व के हर देश में हर संस्कृति में हर परिवेश में पाई जाती है। कई बार कुछ रूढ़िवादी मानसिकता के लोग बलात्कार पीड़िताओं को उनके साथ हो रही घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। जैसे कोई महिला रात को क्यों बाहर जा रही है या उसने अमुक तरह के वस्त्र क्यों पहने हैं ।
तो कहीं ना कहीं महिलाओं के प्रति मानसिकता आज भी यही है कि उसके साथ हो रही घटनाओं के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। आज भी विश्व के केवल एक चौथाई देशों में ही बलात्कार से संबंधित कानून लागू किए गए हैं।
सामाजिक क्षेत्रों में बाधाएं - ऐसे अनेकों विशेष पुरुष प्रधान क्षेत्र हैं जहां पर महिलाओं का प्रवेश करना असुरक्षित है यानि कि उन्हें हिंसा का सामना करना ही पड़ेगा। इसमें से एक है राजनीतिक क्षेत्र- राजनीति में महिलाओं के खिलाफ हिंसा या वायलेंस अगेंस्ट विमेन इन पॉलिटिक्स कहते हैं। जिसमें महिलाओं को शारीरिक मानसिक और मनोवैज्ञानिक रुप से हिंसा का सामना करना पड़ता है केवल इसलिए कि वह एक महिला है। और ऐसा इसलिए किया जाता है कि वे भयभीत होकर राजनीति जैसे पुरुष प्रधान क्षेत्र में प्रवेश ना करें। लेकिन अन्य बहुत से महिला हिंसा के प्रकारों की तरह इसको भी एक हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाता। और ना ही वायलेंस अगेंस्ट वूमेन इन पॉलिटिक्स के मामले पुलिस में दर्ज किए जाते हैं। पारंपरिक रुप से राजनीति को एक पुरुष प्रधान क्षेत्र माना जाता है और इसमें महिलाओं की भागीदारी करने पर आज भी कई क्षेत्रों में उन्हें धमकियां, अश्लील बातें , बदनामी जैसी शारीरिक , मानसिक और सामाजिक हिंसा की घटनाओं का सामना करना पड़ता है।
ऑनलाइन हिंसा
वर्तमान समय में महिलाओं का ऑनलाइन उत्पीड़न ,धमकियां और दुर्व्यवहार एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है। इंटरनेट का प्रयोग करने वाली लगभग सभी महिलाओं को किसी न किसी समय पर ऑनलाइन हिंसा का सामना करना पड़ता है। छोटी बच्चियों के साथ फेसबुक इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म पर अश्लील बातें, मैसेज , कमेंट्स, उनकी फोटो को एआई के साथ एडिट करके उन्हें ब्लैकमेल करना जैसी समस्याएं बड़े स्तर पर सामने आ रही हैं। महिला चाहे घरेलू हो, कामकाजी और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हो उसे घृणास्पद भाषा , ऑनलाइन महिला विरोधी बयानबाजी, ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग का शिकार होना पड़ता है । सरकार ने हाल ही में महिलाओं के साथ किए जाने वाले साइबर अपराधों के विरुद्ध सख्त कानून बनाएं हैं।
महिलाओं के खिलाफ विभिन्न प्रकार की हिंसा रोकने के लिए कानूनी प्रक्रियाएं -
महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के लिए सरकार ने विशेष कानून बनाए हैं । जब बात घरेलू हिंसा की होती है तो हिंसा पति या महिला के परिवारजनों द्वारा ही की जाती है। ऐसे में न्याय पाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है । ऐसे में महिला पर बहुत सामाजिक दबाव होता है क्योंकि रहना उसे अपने परिवार के साथ होता है । भारतीय समाज में विशेष रूप से महिला का कानून की शरण में जाना परिवार से उसके विस्थापन का कारण बन जाता है। क्योंकि भारतीय संस्कृत में विवाह की संस्था को बहुत पवित्र माना जाता है और महिला पर जीवनपर्यंत दबाव होता है कि किसी भी हाल में शादी को निभाना है इसलिए महिलाएं पारिवारिक और घरेलू हिंसा को जीवन पर्यंत सहन करने के लिए मजबूर हो जाती हैं।
क़ानून के विषय में जागरूकता का अभाव -
पारिवारिक ढांचे में बाल विवाह जैसे कुछ मामलों को छोड़कर महिलाओं के साथ जो मानसिक हिंसा होती है उसका अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा जाता जैसे कि जबरन विवाह या वैवाहिक बलात्कार आदि। आज भी मैराइटल रेप को हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाता और अधिकांश देशों में इससे संबंधित कानून नहीं बनाए गए हैं। बहुत से ऐसे अपराध है जिन के खिलाफ कानून तो है लेकिन महिलाओं को उनके विषय में जानकारी नहीं है। महिलाएं यदि यौन हिंसा का शिकार होती भी है तो उसके लिए पर्याप्त सबूतों का होना जरुरी है। इस तरह की घटनाओं को मनोवैज्ञानिक हिंसा की श्रेणी में रखा जाता है।
मनोवैज्ञानिक हिंसा -किसी भी महिला को भावनात्मक और मानसिक रुप से प्रताड़ित करना चाहे वह मौखिक हो या हाव भाव द्वारा , धमकियां अपमानजनक टिप्पणियां, ईर्ष्या के चलते या उसे नियंत्रित करने , नीचा दिखाने के लिए की जाने वाली हिंसा मनोवैज्ञानिक हिंसा की श्रेणी में आती है।
सरकार द्वारा बच्चियों और महिलाओं के साथ हर प्रकार की हिंसा रोकने के लिए सख्त कानून बनाए गए हैं । 1090 और बहुत सी ऐसी हेल्पलाइन उपलब्ध हैं जिन पर संपर्क करने पर तुरंत कार्यवाही होती है और पीड़िता को न्याय एवं सुरक्षा प्रदान की जाती है। लेकिन महिलाएं व्यक्तिगत स्तर पर अपने साथ हो रही हिंसा को रिपोर्ट करने में या मदद मांगने में हिचकिचाती हैं । ऐसा करने के लिए उनका पारिवारिक सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश बाधक होता है। क्योंकि आज भी धारणा है कि यदि कोई महिला अपने साथ हो रही हिंसा के लिए पुलिस सहायता लेंगी तो उसे बदनामी का सामना करना पड़ सकता है।
घर हो या कार्यक्षेत्र उसे हर जगह कुछ पुरानी रूढ़ियों और पितृसत्तात्मक भूमिकाओं में बांधने की कोशिश की जाती है। समाज का उसके प्रति दृष्टिकोण उसे इस ढांचे में सीमित रहने के लिए बाध्य करता है। यानी कि यदि वह महिला है तो उसे विनम्र रहना है, धीरे बोलना है और उसे किसी भी गलत बात पर आवाज उठाने पर बोल्ड, बिंदास और समाज-विरोधी होने की की संज्ञा दी जाती है। ।
यही कारण है कि अपने साथ होने वाली हिंसा के बारे में विश्व में 40% से भी कम महिलाएं सहायता मांगती हैं और 10% से कम महिलाएं पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराती हैं।
महिलाओं के साथ हिंसक व्यवहार करने वालों की प्रवृत्ति किसी एक विशेष वर्ग पर निर्भर नहीं करती। जिस प्रकार हिंसा के कारण और हिंसा के रूप अलग-अलग है उसी प्रकार महिलाओं के विरुद्ध हिंसा करने वाले जो पुरुष हैं वह भी हर वर्ग से आते हैं समाज के हर वर्ग में ,हर धर्म से,हर आयु के पुरूष शारीरिक, घरेलू और यौन हिंसा जैसे अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं। महिलाओं के साथ जो हिंसा होती है उसमें मुख्य रूप से पुरुष ही दोषी पाए जाते हैं।
निष्कर्ष: सामाजिक परंपराओं, रीति रिवाजों और सामाजिक अपेक्षाओं के साथ-साथ बहुत से सांस्कृतिक कारण होते हैं जिनके चलते महिलाओं को अपने विरुद्ध हो रही हिंसा को स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ता है। अधिकतर घरेलू हिंसा के मामलों में पारिवारिक मामला कहकर आपस में हल निकालने का सुझाव दिया जाता है और वे जीवनपर्यंत चिंता, अवसाद, घबराहट और मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझती रहती हैं। और उन्हें लगता है कि उस पर बात करना या उसके विरुद्ध आवाज उठाना उनकी सामाजिक छवि पर प्रश्न चिन्ह लगा देगा। यहां पर उन शारीरिक रूप से विकलांग महिलाओं के विषय में बात करना बहुत आवश्यक है जो कि अपने साथ हो रही हिंसा के विषय में बता भी नहीं सकतीं। इसलिए महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को रोकने के लिए इन कारणों पर बात करना बहुत आवश्यक है । महिलाएं और बच्चियों तब तक सुरक्षित नहीं हो सकतीं जब तक उनको एक हिंसा मुक्त वातावरण नहीं मिलता। और समाज और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास भी तब तक संभव नहीं है जब तक महिलाएं मुखर और स्वतंत्र रूप से एक सुरक्षित वातावरण में कार्य करके अपनी प्रतिभा का सदुपयोग नहीं करती।
सीता से लेकर द्रौपदी तक और नीरा से लेकर रानी लक्ष्मीबाई तक। हर युग में हर कालखंड में महिलाओं के साथ हिंसा होती आई है और वर्तमान समय में भी महिलाएं समाज में असुरक्षा की भावना के साथ जीने को विवश हैं। महिलाएं चाह कर भी उस सीमित दायरे से बाहर नहीं निकल पा रही है जहां उनकी स्वतंत्रता, उनके विचारों और उनकी प्रतिभा को समाज ने अदृश्य बेडियों में जकड़ रखा है। महिलाएं भले ही चांद पर पहुंच रही है खेल राजनीतिक चिकित्सा शिक्षा फिल्म तकनीक हर क्षेत्र में महिलाएं उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं और अपना परचम लहरा रही है। लेकिन सत्य यह है कि आज भी वह कदम कदम पर तिरस्कार और हिंसा का शिकार हो रही है। नारी की इस अन्त:पीडा को निर्मला पुतुल जी ने बहुत सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है।
तान के भूगोल से परे एक स्त्री के मन की गठन को खोलकर
कभी पड़ा है तुमने
उसके भीतर का खोलना इतिहास
अगर नहीं तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में...!
निर्मला पुतुल
इस संदर्भ में मुझे कुछ पंक्तियां और याद आ रही है -
तेरे माथे पर यह आंचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
धन्यवाद
लेखिका भावना वरदान शर्मा एक सोशल एक्टिविस्ट एवं कोलमिस्ट हैं और आगरा में रहकर साहित्यिक एवं सामाजिक क्षेत्र में अपना योगदान दे रही है।
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