उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा- “सभी के रास्ते अलग, मंजिल देश हित” - एक ऐतिहासिक कदम की पूरी कहानी।
Political News: भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस खबर ने पूरे देश में हलचल....
भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस खबर ने पूरे देश में हलचल मचा दी, क्योंकि यह संसद के मानसून सत्र के पहले दिन हुआ। इस्तीफे से ठीक पहले, धनखड़ ने राजनीतिक दलों को संबोधित करते हुए कहा था, “सभी के चलने का रास्ता भले ही अलग हो, लेकिन मंजिल देश हित ही होता है।” यह बयान न केवल उनकी देशभक्ति को दर्शाता है, बल्कि उनके कार्यकाल के दौरान उनकी विचारधारा और दृष्टिकोण को भी रेखांकित करता है। धनखड़ का यह कदम इतिहास में दर्ज हो गया, क्योंकि वह कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देने वाले तीसरे उपराष्ट्रपति बन गए।
- जगदीप धनखड़ का इस्तीफा: क्या हुआ?
21 जुलाई 2025 की शाम को, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर अपने पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया। अपने पत्र में उन्होंने लिखा, “स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और चिकित्सीय सलाह का पालन करने के लिए, मैं संविधान के अनुच्छेद 67(ए) के अनुसार, तत्काल प्रभाव से भारत के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देता हूं।” धनखड़ ने अपने स्वास्थ्य को कारण बताया, खासकर मार्च 2025 में उनकी एंजियोप्लास्टी के बाद, जब उन्हें दिल्ली के एम्स में चार दिनों तक भर्ती रहना पड़ा था।
यह इस्तीफा इसलिए भी चौंकाने वाला था, क्योंकि उसी दिन वह संसद भवन में मौजूद थे और कई सांसदों के साथ चर्चा में शामिल थे। उन्होंने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव से संबंधित एक पत्र भी स्वीकार किया था, जिसमें 50 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा, उनके कार्यालय ने 23 जुलाई को जयपुर की एक आधिकारिक यात्रा की योजना भी जारी की थी। ऐसे में, उनके अचानक इस्तीफे ने कई सवाल खड़े कर दिए।
- धनखड़ का बयान: देश हित की मंजिल
इस्तीफे से ठीक पहले, धनखड़ ने संसद के मानसून सत्र के दौरान राजनीतिक दलों को संबोधित करते हुए कहा, “सभी के चलने का रास्ता भले ही अलग हो, लेकिन मंजिल देश हित ही होता है।” यह बयान उनके कार्यकाल की भावना को दर्शाता है। धनखड़ हमेशा से संसद की सर्वोच्चता और देश हित को प्राथमिकता देने की बात करते रहे। उन्होंने कई बार कहा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष को एकजुट होकर देश के लिए काम करना चाहिए। इस बयान ने सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरीं, और कई लोगों ने इसे उनकी देशभक्ति और जिम्मेदारी की भावना से जोड़ा।
- जगदीप धनखड़ का राजनीतिक सफर
जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के किठाना गांव में एक जाट किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई सैनिक स्कूल, चित्तौड़गढ़ और राजस्थान यूनिवर्सिटी से पूरी की, जहां उन्होंने कानून की डिग्री हासिल की। वकालत में सफलता के बाद, वह 1989 में राजनीति में आए और झुंझुनू से लोकसभा सांसद चुने गए। उन्होंने वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर सरकार में संसदीय मामलों के राज्य मंत्री के रूप में काम किया।
1993 से 1998 तक, वह राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। 2019 में, उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां उनके ममता बनर्जी सरकार के साथ कई बार तीखे टकराव हुए। 2022 में, उन्होंने उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को हराकर 14वें उपराष्ट्रपति का पद संभाला। उनके कार्यकाल में, उन्होंने संसद की गरिमा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर जोर दिया।
- इस्तीफे के पीछे स्वास्थ्य कारण
धनखड़ ने अपने इस्तीफे में स्वास्थ्य कारणों को प्रमुख वजह बताया। मार्च 2025 में, उन्हें हृदय संबंधी समस्याओं के कारण एम्स में भर्ती किया गया था, जहां उनकी एंजियोप्लास्टी हुई थी। हालांकि, वह बाद में स्वस्थ होकर लौटे थे, लेकिन सोमवार को उनके अचानक इस्तीफे ने कई लोगों को हैरान कर दिया। कुछ विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या यह केवल स्वास्थ्य कारण था, या इसके पीछे कोई और वजह थी।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “वह पूरे दिन संसद में थे। सिर्फ एक घंटे में ऐसा क्या हो गया कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा?” इसी तरह, शिवसेना (यूबीटी) नेता आनंद दुबे ने कहा कि मानसून सत्र के पहले दिन इस्तीफा देना चिंताजनक है।
धनखड़ के इस्तीफे ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दिया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर लिखा, “इस अप्रत्याशित इस्तीफे में जो दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा है। पीएम मोदी धनखड़ को मन बदलने के लिए मनाएं। यह राष्ट्रहित में होगा, खासकर कृषक समुदाय के लिए।” रमेश का इशारा धनखड़ की जाट समुदाय से नाता और किसानों के प्रति उनकी संवेदनशीलता की ओर था।
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने व्यक्तिगत दुख जताते हुए कहा, “मैं उनके इस्तीफे से खुश नहीं हूं। हमारे बीच विचारधाराओं में मतभेद थे, लेकिन कोई कड़वाहट नहीं थी।” कुछ विपक्षी नेताओं ने धनखड़ की हाल की गतिविधियों पर सवाल उठाए, जैसे उनकी मल्लिकार्जुन खड़गे और अरविंद केजरीवाल से मुलाकात। कुछ ने इसे बीजेपी के साथ मतभेद के रूप में देखा।
बीजेपी और एनडीए के नेताओं ने धनखड़ के स्वास्थ्य की कामना की, लेकिन नए उपराष्ट्रपति के लिए कोई आधिकारिक नाम अभी तक सामने नहीं आया। कुछ रिपोर्ट्स में जदयू सांसद और राज्यसभा उपसभापति हरिवंश का नाम संभावित उम्मीदवार के रूप में उभरा है। हरिवंश अब राज्यसभा के कार्यवाहक सभापति होंगे, क्योंकि संविधान में कार्यवाहक उपराष्ट्रपति का प्रावधान नहीं है।
संविधान के अनुच्छेद 68 के अनुसार, उपराष्ट्रपति के पद की रिक्ति को 60 दिनों के भीतर भरना होगा। चुनाव में लोकसभा और राज्यसभा के सभी सदस्य वोट डालते हैं, और आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत एकल संक्रमणीय मत का उपयोग होता है। एनडीए की राज्यसभा में बहुमत को देखते हुए, अगला उपराष्ट्रपति संभवतः उनके गठबंधन से होगा।
- धनखड़ के विवादास्पद बयान
धनखड़ अपने कार्यकाल में कई बयानों के लिए चर्चा में रहे। जनवरी 2023 में, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मूल संरचना सिद्धांत पर सवाल उठाया, जिसे विपक्ष ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताया। उन्होंने कहा था, “अगर संसद के बनाए कानूनों को अदालत रोकती है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।” इसके अलावा, उन्होंने सुनियोजित धर्मांतरण और सनातन धर्म की रक्षा पर भी बयान दिए, जो विवादास्पद रहे।
धनखड़ का इस्तीफा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला, यह संसद के मानसून सत्र के दौरान हुआ, जो पहले से ही कई मुद्दों पर गरम था। दूसरा, उनके इस्तीफे ने विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का मौका दिया। कुछ लोग इसे बीजेपी के आंतरिक मतभेदों से जोड़ रहे हैं, खासकर क्योंकि धनखड़ ने हाल ही में विपक्षी नेताओं से मुलाकात की थी।
सोशल मीडिया पर भी इस बयान और इस्तीफे की खूब चर्चा हुई। एक यूजर ने लिखा, “धनखड़ जी का बयान देश हित की भावना को दर्शाता है, लेकिन उनका अचानक इस्तीफा समझ से परे है।” कुछ ने इसे बीजेपी की रणनीति से जोड़ा, सुझाव देते हुए कि यह बिहार जैसे राज्यों में राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश हो सकती है।
जगदीप धनखड़ का उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा एक ऐतिहासिक घटना है, जिसने न केवल राजनीतिक हलकों में, बल्कि आम लोगों के बीच भी चर्चा छेड़ दी। उनका बयान, “सभी के चलने का रास्ता भले ही अलग हो, लेकिन मंजिल देश हित ही होता है,” उनकी देशभक्ति और संवैधानिक जिम्मेदारी को दर्शाता है। हालांकि, उनके अचानक इस्तीफे ने कई सवाल खड़े किए हैं, जिनका जवाब शायद समय के साथ मिले। संविधान के तहत अब जल्द ही नए उपराष्ट्रपति का चुनाव होगा, और यह देखना दिलचस्प होगा कि यह पद किसे सौंपा जाता है। धनखड़ का कार्यकाल भले ही छोटा रहा, लेकिन उनकी बेबाकी और देश हित की सोच हमेशा याद की जाएगी।
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