नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में जन्माष्टमी पर दी गयी 21 तोपों की सलामी, भक्तों में उत्साह।

राजस्थान के नाथद्वारा में स्थित विश्वप्रसिद्ध श्रीनाथजी मंदिर में 16 अगस्त 2025 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भव्य उत्साह के साथ मनाया ....

Aug 18, 2025 - 16:31
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नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में जन्माष्टमी पर दी गयी 21 तोपों की सलामी, भक्तों में उत्साह।
नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में जन्माष्टमी पर दी गयी 21 तोपों की सलामी, भक्तों में उत्साह।

राजस्थान के नाथद्वारा में स्थित विश्वप्रसिद्ध श्रीनाथजी मंदिर में 16 अगस्त 2025 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भव्य उत्साह के साथ मनाया गया। वल्लभ संप्रदाय की प्रधान पीठ और कृष्ण भक्तों के आस्था के प्रमुख केंद्र श्रीनाथजी मंदिर में इस अवसर पर 400 साल पुरानी परंपरा को निभाते हुए मध्यरात्रि को रसाला चौक पर 21 तोपों की गगनभेदी सलामी दी गई। इस ऐतिहासिक परंपरा ने मंदिर परिसर को भक्ति और उत्सव के रंग में डुबो दिया। हजारों भक्तों ने भजनों और जयकारों के बीच भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया, जिसने नाथद्वारा को आध्यात्मिक उल्लास का केंद्र बना दिया।

श्रीनाथजी मंदिर, जो भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप श्रीनाथजी को समर्पित है, 17वीं सदी से वैष्णव भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल रहा है। जन्माष्टमी के दिन मंदिर को फूलों, रोशनी और रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाया गया था। मध्यरात्रि में जैसे ही घड़ी ने 12 बजा, दो तोपों, जिन्हें स्थानीय भाषा में नर और मादा के नाम से जाना जाता है, के जरिए 21 बार सलामी दी गई। यह परंपरा मेवाड़ राजवंश के समय से चली आ रही है, जब मंदिर की सुरक्षा और भगवान श्रीनाथजी के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए तोपों की सलामी शुरू की गई थी। भक्तों का मानना है कि यह सलामी श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी को और भव्य बनाती है।

जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में मंगला आरती के साथ उत्सव की शुरुआत हुई। भक्तों ने मंदिर में दर्शन के लिए लंबी कतारें लगाईं और श्रीनाथजी के बाल स्वरूप को दूध, दही, मक्खन और मिश्री का भोग लगाया गया। एक विशेष परंपरा के तहत भक्त अपने साथ चावल लाए, जिन्हें पूजा के बाद तिजोरी में रखने की मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि इन चावल के दानों में श्रीनाथजी की छवि दिखाई देती है, और इन्हें तिजोरी में रखने से समृद्धि आती है। मंदिर में मटकी फोड़ की परंपरा भी हर्षोल्लास के साथ निभाई गई, जो ब्रज और मेवाड़ संस्कृति का अनूठा संगम दर्शाती है। इस दौरान भक्तों ने भजनों और कीर्तन में डूबकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण किया।

श्रीनाथजी मंदिर की यह जन्माष्टमी न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मंदिर का इतिहास 17वीं सदी से जुड़ा है, जब मुगल सम्राट औरंगजेब के समय श्रीनाथजी की मूर्ति को वृंदावन से नाथद्वारा लाया गया था। किंवदंती है कि मूर्ति को ले जा रहे रथ का पहिया सिहाड़ गांव के पास कीचड़ में फंस गया था, जिसे भगवान की इच्छा मानकर वहीं मंदिर बनाया गया। मंदिर की वास्तुकला में राजस्थानी और मुगल शैली का मिश्रण देखने को मिलता है, और यह पुष्टिमार्ग के अनुयायियों के लिए विशेष स्थान रखता है। एक अन्य मिथक के अनुसार, 1793 में मुस्लिम शासक नादिर शाह ने मंदिर पर हमला किया था, लेकिन मंदिर में प्रवेश करते ही वह अंधा हो गया और बिना लूटपाट के लौट गया।

इस जन्माष्टमी उत्सव में देश-विदेश से आए भक्तों ने हिस्सा लिया, और मंदिर परिसर भक्ति के रंग में रंग गया। मंदिर के दर्शन के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन बुकिंग की सुविधा थी, जिसके तहत सामान्य दर्शन निःशुल्क था, जबकि वीआईपी दर्शन के लिए 300 से 500 रुपये और विशेष दर्शन के लिए 1100 रुपये का शुल्क लिया गया। मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक और फिर दोपहर 3 बजे से रात 8:30 बजे तक खुला रहा।

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