Barabanki News: सपा पर दलित और पसमांदा मुस्लिम उत्पीड़न का आरोप, वसीम राईन ने अखिलेश यादव से आत्ममंथन करने को कहा
पसमांदा मुस्लिम समुदाय, जो कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 85% हिस्सा है, के साथ भी सपा पर भेदभाव का आरोप लगाया गया। राईन ने दावा किया कि आजाद भारत में पहली प.....
By INA News Barabanki.
बाराबंकी: उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर समाजवादी पार्टी (सपा) और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) पर गंभीर आरोपों की बौछार हुई है। ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसीम राईन (Wasim Rain) ने सपा सरकार के दौरान दलितों और पसमांदा मुस्लिम समुदाय के कथित उत्पीड़न को लेकर तीखा हमला बोला है। राईन ने अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) से अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में हुए कथित “कुकृत्यों” का आत्ममंथन करने और दलित-पसमांदा समाज के साथ हुई नाइंसाफी पर शर्मिंदगी महसूस करने की बात कही। यह बयान बाराबंकी में सपा और विपक्षी दलों के बीच चल रही तीखी राजनीतिक जंग को और हवा दे सकता है।
वसीम राईन (Wasim Rain) ने अपने बयान में सपा सरकार के कार्यकाल (2012-2017) को दलित और पसमांदा मुस्लिम समुदाय के लिए उत्पीड़न का दौर करार दिया। उन्होंने दावा किया कि अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के मुख्यमंत्री रहते हुए दलित समाज के साथ व्यापक अन्याय हुआ। राईन ने हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद सैकड़ों दलित समीक्षा अधिकारियों की नियुक्ति रुकवाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “लाखों दलित अधिकारियों को डिमोट करके कर्मचारी बनाना क्या दलित उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं आता? उत्तर प्रदेश का दलित समाज इसे कभी नहीं भूलेगा।”
पसमांदा मुस्लिम समुदाय, जो कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 85% हिस्सा है, के साथ भी सपा पर भेदभाव का आरोप लगाया गया। राईन ने दावा किया कि आजाद भारत में पहली पसमांदा मोबलिंचिंग की घटना सपा शासनकाल में हुई, जिसे उन्होंने “पसमांदा उत्पीड़न मॉडल” का नाम दिया। उन्होंने कहा कि यह मॉडल अब अन्य राज्यों में भी फैल चुका है। राईन ने मुजफ्फरनगर दंगों (2013) का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इन दंगों में पसमांदा समुदाय को भारी नुकसान हुआ, जबकि सैफई में सपा के जश्न का आयोजन किया गया।
राईन ने सपा पर पसमांदा मुस्लिम समुदाय को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि सपा ने आज तक किसी पसमांदा मुस्लिम को राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण मंच पर प्रतिनिधित्व नहीं दिया। उन्होंने कहा, “पसमांदा समाज को सिर्फ वोट लेने के लिए इस्तेमाल किया गया। अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) की सरकार में इस समुदाय का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक शोषण चरम पर था।”
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राईन ने अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) को नसीहत दी कि वे दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपने शासनकाल की नीतियों और कारनामों की समीक्षा करें। उन्होंने कहा, “कभी अपनी झूठ की राजनीति से फुर्सत मिले तो अपने कुकृत्यों का आत्ममंथन कर लें। पसमांदा और दलित समाज के साथ की गई नाइंसाफी को याद करें और थोड़ा शर्मिंदगी महसूस करें।”
वसीम राईन (Wasim Rain) का यह बयान उत्तर प्रदेश में सपा और भाजपा के बीच चल रही तीखी राजनीतिक बयानबाजी के बीच आया है। हाल ही में सपा के सोशल मीडिया हैंडल से उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी का मामला गरमाया हुआ है, जिसके बाद भाजपा ने सपा पर आक्रामक हमले तेज कर दिए हैं। राईन का बयान इस सियासी जंग को और गहरा सकता है, क्योंकि यह न केवल सपा की नीतियों पर सवाल उठाता है, बल्कि दलित और पसमांदा समुदाय जैसे बड़े वोट समूहों की भावनाओं को भी छूता है।
मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि इन दंगों ने उत्तर प्रदेश की सियासत को लंबे समय तक प्रभावित किया था। राईन का यह दावा कि सपा ने दंगों के बाद पसमांदा समुदाय की अनदेखी की और सैफई में उत्सव मनाया, सपा की छवि को और नुकसान पहुंचा सकता है।
उत्तर प्रदेश में दलित और पसमांदा मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक और सामाजिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। दलित समुदाय राज्य की आबादी का लगभग 21% हिस्सा है और कई क्षेत्रों में निर्णायक वोटर के रूप में उभरता है। वहीं, पसमांदा मुस्लिम समुदाय, जो मुख्य रूप से पिछड़े और शोषित वर्गों से आता है, मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा होने के कारण हर राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण है। राईन का यह बयान इन दोनों समुदायों की नाराजगी को उजागर करता है, जो सपा के लिए आगामी चुनावों में चुनौती बन सकता है।
सपा ने अभी तक वसीम राईन (Wasim Rain) के इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि, पार्टी के प्रवक्ता अक्सर ऐसे आरोपों को “राजनीति से प्रेरित” बताकर खारिज करते रहे हैं। सपा नेताओं का कहना रहा है कि उनकी पार्टी ने हमेशा दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के लिए काम किया है। मुजफ्फरनगर दंगों के मामले में सपा पहले भी दावा कर चुकी है कि उसने दंगों को नियंत्रित करने और पीड़ितों की मदद के लिए तत्काल कदम उठाए थे।
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