डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के निर्वाचन क्षेत्र पर सबसे बड़ा असर: विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद बदली लखनऊ की राजनीतिक तस्वीर।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में उस समय हड़कंप मच गया जब निर्वाचन आयोग द्वारा जारी की गई अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों ने सभी
- उत्तर प्रदेश मतदाता सूची में ऐतिहासिक बदलाव: लखनऊ कैंट में मतदाताओं की संख्या में 34.18% की भारी गिरावट
- लखनऊ के शहरी इलाकों से गायब हुए लाखों वोटर: निर्वाचन आयोग की अंतिम सूची जारी होने के बाद उठे कई गंभीर सवाल
उत्तर प्रदेश की राजनीति में उस समय हड़कंप मच गया जब निर्वाचन आयोग द्वारा जारी की गई अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों ने सभी को चौंका दिया। राज्य की राजधानी लखनऊ के कैंट विधानसभा क्षेत्र में सबसे बड़ा उलटफेर देखने को मिला है, जहाँ मतदाताओं की संख्या में 34.18 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई है। यह निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का गढ़ माना जाता है, और इतनी बड़ी संख्या में नामों का कटना आने वाले चुनावों के लिए एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की लंबी प्रक्रिया के बाद जब अंतिम सूची सार्वजनिक हुई, तो लखनऊ के शहरी इलाकों में मतदाताओं के आधार में आई यह गिरावट चर्चा का मुख्य केंद्र बन गई है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया जो पिछले कई महीनों से चल रही थी, उसका मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिमुक्त और पारदर्शी बनाना था। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ कैंट में पहले मतदाताओं की संख्या काफी अधिक थी, लेकिन सत्यापन प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे नाम पाए गए जो या तो मृत थे या फिर लंबे समय से उस क्षेत्र में नहीं रह रहे थे। 34.18 प्रतिशत की यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक 'क्लीन-अप' ड्राइव का हिस्सा है जिसने लखनऊ की लगभग सभी विधानसभा सीटों को प्रभावित किया है। विशेष रूप से वीवीआईपी सीटों पर इस तरह का बदलाव मतदाताओं के समीकरण को पूरी तरह से बदल सकता है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की सीट, लखनऊ कैंट, हमेशा से ही भाजपा के लिए एक सुरक्षित और महत्वपूर्ण सीट रही है। लेकिन इस बार की अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या का इस कदर कम होना प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चिंता का विषय बना हुआ है। माना जा रहा है कि लखनऊ कैंट जैसे शहरी क्षेत्र में बहुत से लोग किराए पर रहते हैं या नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहरों में चले जाते हैं। आयोग के अधिकारियों ने घर-घर जाकर सत्यापन किया और पाया कि हजारों लोग अब उस पते पर मौजूद नहीं हैं। इसी आधार पर नामों को सूची से विलोपित किया गया है, जिसका सीधा असर अब वोट बैंक की गणना पर पड़ेगा।
लखनऊ की सीटों का गणित
लखनऊ जिले की नौ विधानसभा सीटों में से अधिकांश में मतदाताओं की संख्या घटी है। जहाँ ड्राफ्ट रोल के समय लखनऊ में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 39.9 लाख थी, वहीं अंतिम सूची में यह घटकर 27.9 लाख के आसपास रह गई है। अकेले लखनऊ कैंट में एक तिहाई से अधिक वोटर्स का कम होना राज्य के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी छंटनी में से एक है। इस बड़े बदलाव के पीछे आयोग ने तर्क दिया है कि पिछले कई वर्षों से मतदाता सूचियों में 'डुप्लीकेट' और 'शिफ्टेड' वोटर्स की भरमार थी। सॉफ्टवेयर के जरिए जब डेटा का मिलान किया गया, तो एक ही व्यक्ति के नाम कई जगह पाए गए। इसके अलावा, लखनऊ जैसे महानगर में पुनर्विकास परियोजनाओं और अवैध बस्तियों के हटने के कारण भी बड़ी आबादी का विस्थापन हुआ है। इन सभी कारकों ने मिलकर लखनऊ कैंट की सूची को इतना छोटा कर दिया है। हालांकि, विपक्ष इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, लेकिन आयोग का स्पष्ट कहना है कि यह केवल पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने की एक आवश्यक कवायद थी ताकि 'फर्जी वोटिंग' की संभावना को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।
प्रशासनिक स्तर पर इस कार्रवाई को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इससे मतदाता सूची अब काफी हद तक 'शुद्ध' हो गई है। लखनऊ के जिलाधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी के नेतृत्व में चली इस मुहिम में हजारों बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने हिस्सा लिया। उन्होंने उन मतदाताओं की पहचान की जो सालों पहले शहर छोड़ चुके थे लेकिन उनके नाम सूची में बरकरार थे। लखनऊ कैंट के अलावा लखनऊ मध्य, लखनऊ पूर्व और लखनऊ पश्चिम सीटों पर भी मतदाताओं की संख्या में 15 से 25 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है, लेकिन कैंट का आंकड़ा सबसे अधिक चौंकाने वाला रहा है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मतदाताओं की संख्या में इतनी बड़ी कटौती से आगामी चुनावों में जीत-हार का अंतर कम हो सकता है। जब एक तिहाई मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं, तो किसी भी उम्मीदवार के लिए अपनी पुरानी रणनीति पर कायम रहना मुश्किल हो जाता है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के लिए भी यह एक नई चुनौती होगी, क्योंकि उन्हें अब उन नए और शेष मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ को फिर से मजबूत करना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने के बाद मतदान का प्रतिशत बढ़ता है या फिर यह राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ी मुश्किल खड़ी करता है।
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