उत्तर प्रदेश मतदाता सूची विवाद: कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर उठाए गंभीर सवाल।
उत्तर प्रदेश में हाल ही में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी की गई अंतिम मतदाता सूची ने राज्य की राजनीति में एक नया विवाद
- गरीबों और मजदूरों के नाम काटे जाने का आरोप: मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई छंटनी से सियासी गलियारों में मची खलबली
- एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने का दावा: 'ब्लैक टाइगर' कहे जाने वाले जासूसी दुनिया के नायक के बाद अब लोकतंत्र के प्रहरी पर विपक्षी प्रहार
उत्तर प्रदेश में हाल ही में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद जारी की गई अंतिम मतदाता सूची ने राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता प्रमोद तिवारी ने इस सूची पर गहरी आपत्ति जताते हुए निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के दौरान उन लोगों को जानबूझकर निशाना बनाया गया है जो समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के उन गरीब मजदूरों के नाम सूची से गायब मिले हैं, जो रोजी-रोटी की तलाश में राज्य से बाहर प्रवास करते हैं। इस बड़े स्तर पर हुई छंटनी ने चुनावी निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस बार मतदाता सूची में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिले हैं। बताया जा रहा है कि लगभग 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं, जो कुल मतदाता संख्या का एक बड़ा हिस्सा है। प्रमोद तिवारी का तर्क है कि जो मजदूर साल में केवल एक बार अपने घर लौटते हैं, उन्हें 'अनुपस्थित' मानकर उनके नाम काट देना न्यायसंगत नहीं है। यह वर्ग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के अपने मौलिक अधिकार से वंचित होता दिख रहा है। उनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से उन लोगों का भरोसा चुनावी तंत्र से उठ सकता है जो पहले से ही संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे हैं।
विपक्ष के आरोपों की गंभीरता तब और बढ़ गई जब इसमें धार्मिक और सामुदायिक दृष्टिकोण को भी शामिल किया गया। कांग्रेस सांसद ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस सूची में एक विशेष धर्म और समुदाय से जुड़े मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में काटे गए हैं। उन्होंने इसे एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बताया, जिसके जरिए चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश की जा सकती है। जब किसी लोकतांत्रिक देश में मतदाता सूची के पुनर्गठन के दौरान किसी विशेष वर्ग को हाशिए पर धकेलने की बात आती है, तो वह न केवल संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक सद्भाव के लिए भी खतरा पैदा कर सकती है।
- मतदाता सूची में ऐतिहासिक छंटनी
उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं। आयोग का तर्क है कि इनमें से 46 लाख से अधिक नाम मृत व्यक्तियों के थे और लगभग 2.17 करोड़ मतदाता अपने मूल पते पर नहीं मिले। हालांकि, विपक्ष का दावा है कि इस 'शुद्धिकरण' की आड़ में पात्र मतदाताओं के अधिकारों का हनन हुआ है।
प्रमोद तिवारी ने निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर प्रहार करते हुए कहा कि आयोग ने अपनी निष्पक्षता खो दी है। उनका मानना है कि एक स्वतंत्र निकाय के रूप में आयोग की जिम्मेदारी हर पात्र नागरिक का नाम सूची में सुनिश्चित करना है, न कि भारी संख्या में नाम हटाकर जनता के बीच अविश्वास पैदा करना। विपक्षी दलों का कहना है कि प्रशासन द्वारा घर-घर जाकर किए जाने वाले सत्यापन की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव रहा। बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) पर अत्यधिक दबाव और सत्यापन के दोषपूर्ण तरीकों के कारण लाखों जीवित और पात्र मतदाताओं को सूची से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इस विवाद के बीच यह तथ्य भी सामने आया है कि मतदाता सूची से नाम हटने की जानकारी अधिकांश लोगों को तब मिली जब अंतिम सूची सार्वजनिक की गई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अल्पशिक्षित मजदूरों को इस प्रक्रिया की जटिलताओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। जब वे काम के सिलसिले में दूसरे शहरों या राज्यों में थे, तब उनके पीछे उनके नाम 'शिफ्टेड' या 'अनमैप्ड' की श्रेणी में डालकर हटा दिए गए। अब इन मतदाताओं के पास दोबारा नाम जुड़वाने के लिए बहुत कम समय बचा है, जिससे यह आशंका बलवती हो गई है कि आगामी चुनावों में मतदान प्रतिशत पर इसका व्यापक नकारात्मक असर पड़ेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मतदाता सूची का विवाद केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। सत्ता पक्ष जहां इसे सूची के 'शुद्धिकरण' और फर्जी वोटरों को हटाने की एक पारदर्शी प्रक्रिया बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे 'लोकतंत्र की हत्या' करार दे रहा है। प्रमोद तिवारी के इन बयानों ने आगामी चुनावों के लिए एक नया मोर्चा खोल दिया है, जिसमें अब डेटा और दस्तावेजों की लड़ाई सड़कों से लेकर अदालतों तक पहुंचने की संभावना है। मतदाता सूची के इस संकट ने चुनावी सुधारों की आवश्यकता पर एक नई बहस छेड़ दी है।
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