धार्मिक मान्यताओं का हवाला और संवैधानिक तर्क: 'वंदे मातरम्' की पंक्तियों को लेकर वारिस पठान ने दी सफाई, कहा- सम्मान है पर शिर्क मंजूर नहीं।

इंदौर में हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान 'वंदे मातरम्' को लेकर हुए हंगामे ने राजनीतिक रंग ले लिया है, जिसके बाद वारिस पठान ने स्पष्ट

By INA News Desk
Apr 10, 2026 - 11:53
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धार्मिक मान्यताओं का हवाला और संवैधानिक तर्क: 'वंदे मातरम्' की पंक्तियों को लेकर वारिस पठान ने दी सफाई, कहा- सम्मान है पर शिर्क मंजूर नहीं।
धार्मिक मान्यताओं का हवाला और संवैधानिक तर्क: 'वंदे मातरम्' की पंक्तियों को लेकर वारिस पठान ने दी सफाई, कहा- सम्मान है पर शिर्क मंजूर नहीं।
  • 'वंदे मातरम्' विवाद पर वारिस पठान का बड़ा बयान: आस्था और राष्ट्रगीत के बीच वैचारिक टकराव, जबरन गायन पर उठाए सवाल।
  • इंदौर से उठी विवाद की लहर: राष्ट्रीय प्रतीकों के गायन पर एआईएमआईएम नेता की तीखी प्रतिक्रिया, इस्लाम और राष्ट्रगीत पर छिड़ी नई बहस।

इंदौर में हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान 'वंदे मातरम्' को लेकर हुए हंगामे ने राजनीतिक रंग ले लिया है, जिसके बाद वारिस पठान ने स्पष्ट किया कि उनकी आस्था केवल एक ईश्वर यानी अल्लाह में है। उन्होंने अपने वक्तव्य में इस बात पर जोर दिया कि इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार, एक मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत कर सकता है और किसी अन्य की वंदना करना 'शिर्क' की श्रेणी में आता है। पठान का तर्क है कि 'वंदे मातरम्' के कुछ अंश धार्मिक रूप से उन लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं जो एकेश्वरवाद में दृढ़ विश्वास रखते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे और उनके समुदाय के लोग राष्ट्रगीत का पूरा सम्मान और आदर करते हैं, लेकिन गायन के मामले में धार्मिक सीमाओं का पालन करना उनकी प्राथमिकता है।

वारिस पठान ने अपनी दलीलों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं और यह विश्वास इस्लाम की बुनियाद है। उनके अनुसार, 'वंदे मातरम्' की कुछ पंक्तियों का अर्थ किसी भूमि या वस्तु की देवी के रूप में पूजा करने जैसा प्रतीत होता है, जो इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है। नेता का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ हर नागरिक को अपनी पसंद के अनुसार धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदान की गई है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध जाकर किसी विशेष गीत या नारे को बोलने के लिए विवश करना लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन माना जाना चाहिए।

इस विवाद की जड़ें इंदौर के उस घटनाक्रम में हैं जहाँ एक परिषद की बैठक या सार्वजनिक सभा के दौरान कुछ सदस्यों द्वारा राष्ट्रगीत गाने से मना करने पर हंगामा हुआ था। वारिस पठान ने इस संदर्भ में कहा कि जबरन किसी से कोई बात कहलवाना राष्ट्रभक्ति का पैमाना नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि देश के प्रति वफादारी दिल में होती है और इसे केवल एक गीत गाने से साबित करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, देश का संविधान राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान दिखाने की बात तो करता है, लेकिन इसे अनिवार्य रूप से गाने के लिए किसी को बाध्य करने का कोई कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूर्व के कुछ फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी राष्ट्रगीत या गान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, तो उसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

धार्मिक कट्टरता और राष्ट्रवाद के बीच चल रही इस रस्साकशी पर वारिस पठान ने यह भी जोड़ा कि 'वंदे मातरम्' का ऐतिहासिक महत्व है और वे इसके योगदान को कमतर नहीं आंक रहे हैं। हालांकि, वे इसे एक धार्मिक चश्मे से भी देखते हैं जहाँ इबादत और सम्मान के बीच का अंतर स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जब देश में बेरोजगारी, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं जैसे बड़े मुद्दे मौजूद हैं, तो बार-बार ऐसे भावनात्मक मुद्दों को उठाकर समाज में ध्रुवीकरण करने का प्रयास क्यों किया जाता है। उनके अनुसार, राष्ट्रभक्ति कार्यों में दिखनी चाहिए, न कि केवल प्रतीकात्मक प्रदर्शनों में।

समाज के एक वर्ग का मानना है कि 'वंदे मातरम्' स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और इसे गाने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसके विपरीत, वारिस पठान जैसे नेताओं का कहना है कि भारत की विविधता ही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है और यहाँ अलग-अलग धर्मों के लोगों की अपनी विशेष मान्यताएं हैं। पठान ने इस बात को मजबूती से रखा कि इस्लाम में अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत करना सबसे बड़ा पाप माना जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे देश के कानून का पालन करने वाले नागरिक हैं, लेकिन अपनी धार्मिक पहचान और विश्वासों के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते।

विवाद के गहराने के बाद, प्रशासनिक हलकों में भी इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल का पालन कैसे सुनिश्चित किया जाए। वारिस पठान के बयानों ने इस बात को और अधिक हवा दे दी है कि क्या राष्ट्रगीत का गायन अनिवार्य होना चाहिए या स्वैच्छिक। उनका कहना है कि जो लोग इस गीत को गाना चाहते हैं, वे स्वतंत्र हैं, लेकिन जो अपनी धार्मिक वजहों से ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें निशाना बनाना अनुचित है। यह स्थिति सामाजिक समरसता के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है, विशेषकर इंदौर जैसे संवेदनशील और सक्रिय राजनीतिक क्षेत्रों में।

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