कहानी:- कोरोना एक कहानी

Jun 13, 2024 - 15:28
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कहानी:-  कोरोना एक कहानी

आज विवेक विहार के सारे लोग एक ही जगह एकत्रित हुए हैं। सभी ने मास्क पहन रखे थे,और उचित दूरी बना रखी थी। विवेक विहार क्षैत्र के इंस्पेक्टर मुकुंद पांडे लोगों को समझ रहे थे, कि कल से लॉकडाउन लग रहा है। तो अपना जरूरी सामान एकत्रित कर ले। वैसे तो समाचार पत्रों ने भी यह खबर छाप दी थी।

परंतु पांडे जी अपने दायित्व के प्रति ईमानदार थे। लोग उदास और चिंतित मन से उनकी बातें सुन रहे थे। इंस्पेक्टर मुकुंद पांडे उनके दर्द को समझ भी रहे थे, पर वह कुछ नहीं कर सकते थे। एक तो यह बीमारी  ही ऐसी और ऊपर से यह सरकारी आर्डर था।

तभी उनकी नजर इसी एरिया में रहने वाले गोयल दंपति पर पड़ी, जो इन सब से अलग आज बहुत खुश नजर आ रहे थे। और अपने हाथ में मिठाई का डब्बा भी ले रखा था। कोरोना की वजह से पांडे जी का इस क्षेत्र में आना-जाना लगा रहता है।

इसलिए अब तो कईं चेहरे ऐसे थे, जिन्हें अब वह अच्छे से पहचानने लग गए थे।  लोगों  ने गोयल दंपति  को हमेशा दुखी और उदास देखा था। पर आज उनको इतना खुश देखकर पांडे जी भी मुस्कुराने लगे थे। उनकी खुशी का राज जानने के लिए जैसे ही पांडे जी उनकी तरफ मुड़े, वे दोनों लगभग दौड़ते हुए से उनके पास आ गए, और मिठाई खाने का आग्रह करने लगे थे।

इंस्पेक्टर मुकुंद पांडे  से रहा नहीं  गया  और उन्होने उनसे पूछ ही लिया कि क्या बात है? गोयल साहब कोरोना में भी बाहर की मिठाई? क्या आपको डर नहीं लगता है?

गोयल जी कुछ  जवाब देते, उससे पहले ही उनकी पत्नी बोली -"नहीं साहब यह मिठाई तो मैंने ही बनाई है। और फिर कोरोना से डर कैसा? बल्कि मैं तो यह कहती हूं, कि यह बहुत ही अच्छी बीमारी है।

मैं इसके बारे में ज्यादा तो नहीं जानती हूं, पर इतना जरूर कहूंगी कि इस बीमारी ने लोगों को अपनी मातृभूमि और अपने स्वजनों से प्रेम करना सिखाया है।" इतना बोलकर श्रीमती गोयल चुप हो गई, क्योंकि उनका गला भर आया था। और आगे वह बोल नहीं पा रही थी।

पांडे जी आश्चर्यचकित होकर गोयल जी की तरफ देखने लगे। पांडे जी कुछ पूछते उससे पहले ही गोयल जी बोलने लगे- "क्षमा करना साहब, यह खुशी के कारण बावली हो गई है, और कुछ ही बोलने लगती है। 15 वर्षों से हमारा बेटा व बहू घर आए हैं। वह अमेरिका में रहते थे। हमारी यह बुढी  आंखें उनकी एक झलक को तरस गई थी। 

परन्तु  वह अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त थे कि, हमसे बात करने का भी समय उनके पास नहीं था। पर आज वह अपने परिवार के साथ स्वदेश लौट आए हैं। क्योंकि इस बीमारी ने अमेरिका को भी जकड़ लिया है। और यह, अपने बेटे- बहू और पोते को देखकर खुशी से बावली हो गई। और सभी को लड्डू खिला रही है। पांडे जी भी उनकी खुशी में शामिल हुए और लड्डू खाने लगे।

पांडे जी मुस्कुराते हुए सोचने लगे कि सचमुच में इस महामारी के नाकारात्मक और  सकारात्मक दोनों  परिणाम सामने आ रहे हैं, तो  समझ ही नही आता की इसे क्या कहे।

ये महामारी है या वह बारिश की बूंद जिसने बंजर पड़ी जमीन पर फिर से हरियाली कर दी। इस बीमारी ने कई परिवारों को मिलाया है। इसने लोगों मे अपनी मातृभूमि से प्रेम करना व जीव-जंतु के प्रति दया करने का भाव जगाया है। पांडे जी ने मिठाई खाई और फिर से लोगों को हिदायत देकर,आज कुछ नई ऊर्जा के साथ आगे की चल दिए।

रतन खंगारोत 
समाज सेविका और लेखिका
राजस्थान प्रदेश उपाध्यक्ष 
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा 1897
शिक्षा- एम. ए.  , बी एड 
जयपुर, राजस्थान 
उपन्यास- अनछुआ दर्द
साझा काव्य संग्रह- सरफिरे परिंदे

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