अजब-गजब: एटा रेप केस- फाइनल रिपोर्ट (एफआर) दाखिल करने के लिए मांगी छह समोसों की रिश्वत, कोर्ट ने खारिज की फाइनल रिपोर्ट। 

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में एक 14 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म के मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला ...

By INA News Desk
Jul 2, 2025 - 12:56
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अजब-गजब:  एटा रेप केस- फाइनल रिपोर्ट (एफआर) दाखिल करने के लिए मांगी छह समोसों की रिश्वत, कोर्ट ने खारिज की फाइनल रिपोर्ट। 
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उत्तर प्रदेश के एटा जिले में एक 14 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म के मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला जलेसर थाना क्षेत्र से संबंधित है, जहां जांच अधिकारी पर केवल छह समोसों की रिश्वत लेकर फाइनल रिपोर्ट (एफआर) दाखिल करने का आरोप लगा है। विशेष पॉक्सो कोर्ट ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए मामले की सीधी सुनवाई का आदेश दिया है, जिससे पुलिस की लापरवाही और भ्रष्टाचार की पोल खुल गई है। 1 अप्रैल 2019 को जलेसर थाना क्षेत्र में एक 14 वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म का प्रयास हुआ। पीड़िता के पिता के अनुसार, गांव के ही युवक वीरेश ने किशोरी को गेहूं के खेत में ले जाकर यह घिनौना कृत्य करने की कोशिश की। घटना के दौरान दो चश्मदीद गवाहों के पहुंचने पर आरोपी मौके से फरार हो गया। पीड़िता के पिता ने पुलिस पर शुरू से ही एकतरफा रवैया अपनाने का आरोप लगाया। पहले तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी की, और बाद में कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही मामला दर्ज हो सका।

मामले की जांच के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। पीड़िता के पिता ने कोर्ट में दावा किया कि जांच अधिकारी ने आरोपी की समोसे की दुकान पर जाकर छह समोसे खाए और इसके बदले में मामले की जांच में जानबूझकर लापरवाही बरती। 30 दिसंबर 2024 को जांच अधिकारी ने फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी, जिसमें दावा किया गया कि कोई सबूत नहीं मिला। रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि पीड़िता ने समोसे उधार मांगने की वजह से झूठा आरोप लगाया। यह दावा कोर्ट को पूरी तरह आधारहीन और हास्यास्पद लगा। विशेष पॉक्सो कोर्ट के जज नरेंद्र पाल राणा ने 27 जून 2025 को पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को खारिज कर दिया। कोर्ट ने जांच अधिकारी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल छह समोसों की रिश्वत लेकर एक नाबालिग के साथ हुए गंभीर अपराध की जांच को कमजोर करना पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल उठाता है। कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने न तो चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज किए और न ही पीड़िता के बयान को गंभीरता से लिया। इसके चलते कोर्ट ने फाइनल रिपोर्ट को रद्द करते हुए मामले को परिवाद (सीधी सुनवाई) में बदलने का आदेश दिया।

इससे पहले, 31 अगस्त 2024 को कोर्ट ने दोबारा जांच का आदेश दिया था, लेकिन पुलिस ने फिर से वही त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट पेश की। कोर्ट के इस फैसले ने न केवल पुलिस की लापरवाही को उजागर किया, बल्कि पीड़िता और उसके परिवार के लिए न्याय की उम्मीद को भी जिंदा रखा। इस मामले ने न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया। कई संगठनों और नेताओं ने इस घटना को पुलिस भ्रष्टाचार का ज्वलंत उदाहरण बताते हुए कड़ी निंदा की। यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली और नाबालिगों के खिलाफ अपराधों से निपटने में उनकी गंभीरता पर सवाल उठाता है। एटा का यह रेप केस पुलिस व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही का एक शर्मनाक उदाहरण है। विशेष पॉक्सो कोर्ट के सख्त रुख ने पीड़िता के लिए न्याय की राह खोली है, लेकिन यह घटना समाज और प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि ऐसी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस मामले में आगे की सुनवाई और जांच अधिकारी के खिलाफ संभावित कार्रवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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