Reels का मोह : युवाओं की दिशा या दिशा भ्रम?

Special Article: डिजिटल युग में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स ने एक नई संस्कृति को जन्म दिया है - “रील्स की संस्कृति" मात्र 15 से 30 सेकंड ....

Aug 2, 2025 - 13:28
Aug 4, 2025 - 12:42
 0  6529
Reels का मोह : युवाओं की दिशा या दिशा भ्रम?
Reels का मोह : युवाओं की दिशा या दिशा भ्रम? - दिव्यसेन सिंह “बिसेन”

✍️ दिव्यसेन सिंह “बिसेन”
(लेखक, शिक्षाविद्, करियर काउंसलर और सिविल सेवा परीक्षाओं के अनुभवी मार्गदर्शक)

डिजिटल युग में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स ने एक नई संस्कृति को जन्म दिया है - “रील्स की संस्कृति" मात्र 15 से 30 सेकंड की ये वीडियो क्लिप्स मनोरंजन से लेकर पहचान और आय तक का माध्यम बन चुकी हैं। युवा पीढ़ी की एक बड़ी संख्या अब इन रील्स को ही करियर विकल्प मानने लगी है।

पर सवाल यह है कि क्या यह दिशा युवाओं के वास्तविक भविष्य को मजबूती दे रही है, या उन्हें एक आभासी भ्रम में उलझा रही है? इंस्टाग्राम, यूट्यूब शॉर्ट्स, स्नैपचैट और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर रील्स बनाकर युवा कुछ ही दिनों में लाखों व्यूज़, फॉलोअर्स और ब्रांड्स से सहयोग प्राप्त कर लेते हैं। यह एक प्रकार की तात्कालिक सफलता है, जो युवाओं को शॉर्टकट का विकल्प देती है।

यह क्रिएटिविटी का एक रूप हो सकता है, पर जब यह स्थायी शिक्षा, कौशल विकास और करियर निर्माण की जगह लेने लगे तो यह एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।

पारिवारिक प्रोत्साहन या सामाजिक दबाव?

आश्चर्यजनक रूप से अब कई माता-पिता भी अपने बच्चों को सोशल मीडिया की इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अभिनय कक्षाओं, कैमरा सेटअप, म्यूजिक डब्स और ट्रेंडिंग डांस मूव्स पर ज़ोर दिया जा रहा है, जबकि शिक्षा को “बैकअप ऑप्शन” मान लिया गया है।

यह प्रवृत्ति न केवल बच्चों की मनोवैज्ञानिक परिपक्वता को प्रभावित कर रही है, बल्कि उन्हें अस्थिरता और तात्कालिकता की लत की ओर भी धकेल रही है।

"रील्स संस्कृति" का सबसे बड़ा संकट यह है कि यह “मेहनत की लंबी यात्रा” की जगह “तेज़ दिखावटी उड़ान” को बढ़ावा देती है।
पढ़ाई, रिसर्च, स्किल डेवलपमेंट, प्रतियोगी परीक्षाएँ या उद्यमशीलता जैसी प्रक्रियाएँ अब युवाओं को “धीमी” और “बोरिंग” लगने लगी हैं।

इससे आगे चलकर उन्हें न केवल करियर में अस्थिरता बल्कि आत्म-संदेह, मानसिक दबाव और सामाजिक असंतुलन का भी सामना करना पड़ सकता है।

रील्स इंडस्ट्री की हकीकत

 • अधिकांश सोशल मीडिया क्रिएटर्स को स्थायी आय या सुरक्षा नहीं होती।
 • प्लेटफॉर्म की एल्गोरिदम नीति कभी भी लोकप्रियता को गिरा सकती है।
 • एक सीमित प्रतिशत ही इस माध्यम से लम्बे समय तक सफल रह पाते हैं।
 • अधिकतर को मानसिक थकान, तुलना की भावना और Burnout का सामना करना पड़ता है।

चिंता : युवा किस दिशा में जा रहे हैं?

आज का युवा “Instant Gratification” की संस्कृति का शिकार हो चुका है।
वह सीखने, सहने और संघर्ष करने के बजाय, शॉर्टकट से दिखने और बिकने की ओर अग्रसर है।

यह न केवल एक पीढ़ी की उत्पादकता को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले समाज की गुणवत्ता और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालेगा।

संतुलन और समझ से इसके समाधान की आवश्यकता है - 

  1. माता-पिता और अभिभावकों को चाहिए कि वे शिक्षा और रचनात्मकता में संतुलन बनाए रखें।
    बच्चों की रूचि को दिशा दें, दबाव नहीं।
  2. शिक्षण संस्थानों को चाहिए कि वे मीडिया साक्षरता और डिजिटल नैतिकता (Digital Ethics) को पाठ्यक्रम में जोड़ें।
  3. सरकार और नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे सोशल मीडिया की जिम्मेदार उपयोगिता के लिए दिशा-निर्देश जारी करें।
  4. खुद युवाओं को समझना होगा कि लोकप्रियता से पहले ज़रूरी है पहचान, और पहचान का आधार होता है ज्ञान और आत्मबल।

रील्स को नकारा नहीं जा सकता, पर इसे जीवन का मूल आधार बना लेना एक भ्रम है। यह प्लेटफॉर्म हुनर दिखाने का माध्यम हो सकता है, पर इसका उद्देश्य शिक्षा, मूल्य, सोच और स्वाभिमान को दबाना नहीं होना चाहिए।

फिल्टर के पीछे चमक तो हो सकती है,
पर स्थायी रोशनी ज्ञान और श्रम से ही आती है।
रील्स बनाइए, पर भविष्य मत बिगाड़िए ।”

Also Read- Special On Friendship Day: मित्रता: आत्मा का व्याकरण है- डॉ. बीरबल झा

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।