Hardoi : हरदोई सनबीम स्कूल विवाद- 'अभद्रता' बनाम 'अति-कार्रवाई', क्या सियासी रसूख और एससी-एसटी एक्ट की ढाल बन रहा है यह मामला?
मामले ने उस समय तूल पकड़ा जब इस विवाद को राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने हाथों-हाथ लिया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने स्कूल परिसर में पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन किया। हालांकि, अब समाज का एक प्रबुद्ध
- 'शट-अप' के शोर में दबा नैसर्गिक न्याय, प्रिंसिपल पर दलित उत्पीड़न के मुकदमे ने शहर के प्रबुद्ध वर्ग को किया सोचने पर मजबूर
- शिक्षा के मंदिर में हंगामा या सुनियोजित प्रहार? रसूखदार परिवार की बहू ममता मिश्रा के समर्थन और विरोध में बंटा सोशल मीडिया
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में स्थित सनबीम पब्लिक स्कूल का प्रकरण अब महज एक स्कूल और अभिभावक के बीच की कहासुनी नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने जहां अभिभावक के प्रति सहानुभूति की लहर पैदा की, वहीं प्रशासन द्वारा प्रिंसिपल ममता मिश्रा पर की गई कानूनी कार्रवाई, विशेषकर एससी-एसटी एक्ट (दलित उत्पीड़न) के तहत मामला दर्ज होने ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। शहर के कैनाल रोड स्थित इस विद्यालय की नींव एक ऐसे परिवार से जुड़ी है, जिसका हरदोई के कानूनी इतिहास में बड़ा नाम रहा है। बार एसोसिएशन हरदोई के प्रथम अध्यक्ष स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद मिश्रा के इस ऐतिहासिक आशियाने को उनकी पौत्र वधू ममता मिश्रा ने एक विद्यालय का रूप दिया था। लेकिन आज वही आशियाना और ममता मिश्रा कानूनी पचड़ों और सामाजिक ट्रायल के केंद्र में हैं। विवाद की शुरुआत एक अभिभावक नीलम वर्मा के साथ हुई तीखी बहस से हुई, जिसमें प्रिंसिपल द्वारा 'ब्लडी फूल' और 'गंवार' जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, जिसे किसी भी सभ्य समाज में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
मामले ने उस समय तूल पकड़ा जब इस विवाद को राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने हाथों-हाथ लिया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने स्कूल परिसर में पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन किया। हालांकि, अब समाज का एक प्रबुद्ध वर्ग इस विरोध के तरीके पर सवाल उठा रहा है। सोशल मीडिया पर कर्मवीर सिंह चौहान जैसे स्थानीय लोगों ने आवाज उठाई है कि यदि प्रिंसिपल का व्यवहार अनुचित था, तो उन पर विभागीय या विधिक कार्रवाई मर्यादित तरीके से भी हो सकती थी। लेकिन स्कूल के भीतर छोटे बच्चों की मौजूदगी में नारेबाजी करना और दबाव बनाकर गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराना क्या न्यायसंगत है? चर्चा इस बात की है कि क्या एक महिला प्रिंसिपल को 'शट-अप' कहने की सजा एससी-एसटी एक्ट के रूप में मिलनी चाहिए? क्या इस कानूनी प्रावधान का उपयोग किसी के व्यक्तिगत अहंकार को संतुष्ट करने या किसी प्रतिष्ठित परिवार की छवि धूमिल करने के लिए किया जा रहा है?
प्रिंसिपल ममता मिश्रा के समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने आवेश में आकर जो कुछ कहा, उसके लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी भी मांग ली थी। कानून का एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि 'दंड अपराध की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए'। हरदोई के प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि 'ककड़ी के चोर को कटार से नहीं मारा जाना चाहिए'। अभद्र भाषा का प्रयोग निश्चित रूप से गलत है और इसके लिए विभागीय जांच और आर्थिक दंड जैसे प्रावधान पर्याप्त हो सकते थे, लेकिन इसे सीधे तौर पर जातिगत उत्पीड़न से जोड़कर जेल भेजने की तैयारी करना मामले को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग देने जैसा प्रतीत होता है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि क्या ममता मिश्रा की पहचान केवल एक अपराधी के तौर पर की जाएगी, जबकि वह एक ऐसे परिवार से आती हैं जिसने शहर को दर्जनों वकील और शिक्षित नागरिक दिए हैं?
क्या रहा है भीड़तंत्र का दबाव?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिला प्रशासन ने बिना किसी गहरी निष्पक्ष जांच के केवल प्रदर्शनकारियों की भीड़ और सोशल मीडिया के दबाव में आकर आनन-फानन में एससी-एसटी एक्ट जैसी संगीन धाराएं लगा दीं। क्या पुलिस ने यह जांचने की कोशिश की कि क्या वास्तव में वहां जातिगत अपमान की मंशा थी या यह केवल फीस और कॉपी-किताब के विवाद में उपजा क्षणिक आवेश था?
इस विवाद में विद्यार्थी परिषद और कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी जांच के घेरे में है। आरोप है कि 'नारी वंदन' का नारा देने वाले लोग एक महिला प्रिंसिपल के सम्मान का ध्यान रखना भूल गए। स्कूल के भीतर जिस तरह से प्रदर्शन किया गया, उसे कई लोग 'गुंडई' की संज्ञा दे रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या विद्यार्थी परिषद को कानून हाथ में लेने का अधिकार है? प्रिंसिपल ममता मिश्रा के पक्ष में खड़े लोगों का कहना है कि वह किसी नेता के दरबार में हाजिरी नहीं लगातीं और न ही चंदा देती हैं, इसलिए उन्हें निशाना बनाना आसान हो गया। यदि किसी अभिभावक को स्कूल की नीतियों से समस्या थी, तो वह विधिवत शिकायत कर सकते थे या अपने बच्चे का दाखिला कहीं और करा सकते थे, लेकिन किसी के घर और कार्यस्थल पर जाकर इस तरह का अपमान करना किसी भी सूरत में लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।
वहीं, दूसरी ओर अभिभावकों का पक्ष भी अपनी जगह मजबूत है। संदीप अग्रवाल जैसे अभिभावकों का मानना है कि निजी स्कूलों में 'कमीशनखोरी' और 'जबरन खरीदारी' का जो तंत्र विकसित हो गया है, वह मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ रहा है। नीलम वर्मा जैसी साधारण पृष्ठभूमि की महिला जब अपने बच्चे के भविष्य का सपना लेकर स्कूल पहुंचती है और वहां उसे 'गंवार' कहकर दुत्कारा जाता है, तो वह चोट सीधे आत्मसम्मान पर लगती है। विरोधियों का कहना है कि यदि वीडियो वायरल न होता, तो शायद प्रशासन कभी भी स्कूल की चौखट तक नहीं पहुंचता। लेकिन विवाद का असली मोड़ यहीं है—क्या एक गलत को दूसरे गलत से ठीक किया जा सकता है? अभद्र भाषा के बदले गंभीर आपराधिक मुकदमा दर्ज कराना क्या भविष्य में एक खतरनाक नजीर पेश नहीं करेगा?
क्या इस मामले को मिला राजनैतिक मोड़
इस मामले में जिस तरह से विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के लोग कूदे हैं, उससे साफ झलकता है कि मुद्दा अब शिक्षा या सम्मान का नहीं, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई बन गया है। एससी-एसटी एक्ट का प्रयोग इसे एक जातिगत रंग देकर समाज को बांटने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
बीएसए की जांच टीम ने विद्यालय में अन्य खामियां भी पाई हैं और डीवीआर कब्जे में लिया है। विभागीय कार्रवाई अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन जिस तरह से इस प्रकरण को 'मीडिया ट्रायल' का शिकार बनाया गया, उसने ममता मिश्रा के साथ-साथ वहां काम करने वाली अन्य महिला शिक्षकों को भी मानसिक तनाव में डाल दिया है। स्कूल परिसर में घुसकर अराजकता फैलाने वालों पर भी कार्रवाई की मांग उठ रही है। समाज का एक बड़ा हिस्सा अब यह महसूस कर रहा है कि मामले को शांत कर न्यायोचित समाधान निकालना चाहिए, न कि इसे प्रतिशोध की आग में झोंकना चाहिए। किसी के जीवन भर की कमाई और प्रतिष्ठा को एक मिनट के वीडियो के आधार पर इस तरह कुचलना कि उस पर 'दलित उत्पीड़न' का ठप्पा लग जाए, कानूनी विशेषज्ञ इसे 'नैसर्गिक न्याय' के विरुद्ध मान रहे हैं।
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