Pilibhit News: महिला सशक्तिकरण की अनूठी मिसाल है माधोटांडा की होली।
भारत लोक संस्कृति का देश है। यहां पर्वों का बड़ा ही महत्व रहता है। देशवासी इन पर्वों को धूमधाम से मनाते हैं इन्हीं में एक है रंगों का त्योहार ...
रिपोर्ट- कुँवर निर्भय सिंह
पीलीभीत। भारत लोक संस्कृति का देश है। यहां पर्वों का बड़ा ही महत्व रहता है। देशवासी इन पर्वों को धूमधाम से मनाते हैं इन्हीं में एक है रंगों का त्योहार होली ।भारत में खासकर हिंदुओं को होली का खास इंतजार रहता है। समाज में हमेशा पुरुषों का वर्चस्व रहा है एक समय तक महिलाएं सिर्फ घर के कामकाज तक ही सीमित रही है लेकिन हमारी परंपरा हमें बताती है कि महिलाएं पहले भी शक्तिशाली रही है जिस तरह बरसाने में होली पर महिलाएं पुरुषों पर लाठियां बजाती है और वह रंगो के बीच उन से बचते हैं। कुछ इस तरह ही उत्तर प्रदेश के भारत-नेपाल सीमावर्ती जनपद पीलीभीत के माधोटांडा रियासत में महिलाओं का होली पर एक दिन पूरी तरह से एक छत्र शासन होता है।
आज देश दुनिया में महिला सशक्तिकरण के बारे में कहा जाता है कि महिलाएं स्वावलंबी बने और अग्रणी भूमिका निभाएं। देश की आधी आबादी देश में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करें इसके लिए नित नए आयाम किए जाते हैं पर जनपद पीलीभीत का माधोटांडा गांव जहां राजे रजवाड़ों के रियासत काल से ही होली के अवसर पर महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने का युग रहा था और आज भी इस प्राचीन कालीन परंपरा के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है इतना ही नहीं यहां तो पूरा एक दिन महिला सशक्तिकरण के नाम कर दिया जाता है जिसमें गांव की छोटी सी बच्ची से लेकर गांव की वृद्ध महिला अपने इस अधिकार का जमकर उपयोग करती है यहां तक की घुंघट में रहने वाली नई नवेली दुल्हन भी घर की दहलीज से बाहर निकल कर गांव की गोरियों एवं ननंद आदि के साथ हास परिहास करती हुई अपनी टोलियों के साथ जमकर रंगबाजी करती है इस दिन बड़ा सा बड़ा ओहदेदार पुरुष भी महिलाओं के सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
होली की रिवायतेऔर परंपराओं का महत्व जानना है तो गांव चलिए यहां विविधता के लिए संस्कृति अपने ही रंग में मस्त हैं। ढोलक की थाप और हारमोनियम की रिदम पर फाग गीतों की धुन तराई में हर किसी के मन मोह लेती है। जहां देश में ब्रज ,बरसाने और अवध आदि की होली पूरी दुनिया में मशहूर है तो वहीं बरेली मंडल में भारत- नेपाल सीमावर्ती जनपद पीलीभीत जनपद के माधोटांडा रियासत की होली भी अपने आप में कुछ अलग है माधोटांडा रियासत में महिलाओं की पिचकारी की डर से कस्बे के पुरुष लोग दुबक कर जंगल या अन्य जगहों पर भाग जाते हैं कि कहीं महिलाओं के हत्थे न चढ़ जाये तो उनका बुरा हश्र हो जाएगा। यहां होली मनाने की अनूठी यह परंपरा आज भी बरकरार हैं।
होली रंगों का पर्व है यह सभी लोग भली-भांति जानते हैं देश ही नहीं विदेशों में भी होली का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है हर शहर की होली मनाने की परंपरा अलग अलग है राजे रजवाड़ों के गांव माधोटांडा में होली का पर्व बड़े ही अनोखे तरीके से मनाया जाता है यहां दो दिन होली पर जमकर रंग की बौछार होती है एक दिन यहां महिलाओं की पूर्ण सत्तात्मक सत्ता काबिज होती है इस दिन यदि कोई पुरुष धोखे से भी इनकी सत्ता में दखलअंदाजी करता है तो उनकी शामत आ जाती है
- मंदिर में एकत्र हो कर सभी महिलाएं पहले भगवान से खेलती हैं होली
माधोटांडा में दो दिन होली खेले जाने की परंपरा बहुत प्राचीन परंपरा है पहले दिन कस्बा में पुरुषों की टोलियां घर घर जाकर होली खेलती हैं और दूसरे दिन कस्बा की महिलाएं रानी सुंदर कुंवरि के पति राजा जयसिंह द्वारा निर्मित प्राचीन ठाकुरद्वारा मंदिर माधव मुकंद महाराज में एकत्र होकर सबसे पहले श्री राधाकृष्ण, सीताराम के साथ रंग खेलती फिर अन्य देवी-देवताओं को भी रंग गुलाल लगाकर आशीर्वाद लेने के बाद आपस में एक दूसरे के साथ रंग खेलने की शुरुआत करती हैं और उसके बाद घर घर जाकर महिलाओं की टोलियां लोगों को रंगों में सराबोर कर देती हैं अगर इस दिन कोई भी पुरुष धोखे से महिलाओं के हत्थे चढ़ जाता है तो उसका बुरा हश्र हो जाता है ।
- माधोटांडा के राजघरानों से शुरू हुई थी यह परंपरा
दो दिन होली की शुरुआत के पीछे कस्बा के बुजुर्गों का कहना है की माधोटांडा रजवाड़े के शाही परिवारों के पुरुष पहले दिन आपस में होली खेलते थे और दूसरे दिन अपने लाव लश्कर के साथ जंगल में शिकार को रवाना हो जाते थे पूरा गांव महिलाओं के लिए छोड़ दिया जाता था जिससे महिलाएं जी भर कर आपस में होली खेल सके। आज भी यहां बुजुर्गों की बनाई इस परंपरा का पालन किया जा रहा है।
- शाम को होलिका स्थल पर महिलाएं करती है पूजा- प्रेम और सौहार्द की मिसाल भी पेश करती है गांव की महिलाएं
होली रंगों का त्योहार है प्रकृति की तरह हमारे मनोभाव और भावनाओं के भी अनेक रंग होते हैं होली के दिन हमारे जीवन को भी उत्साह और प्रेम के रंगों से खिल जाना चाहिए इसकी जीती जागती मिसाल गांव की महिलाएं पेश करती हैं दिनभर रंग खेलने के बाद गांव की सभी महिलाएं होलिका स्थल पर पहुंचकर पूजा अर्चना करती है पूजा अर्चना के बाद एक दूसरे से गले मिलकर होली की शुभकामनाएं देते हुए यह सिद्ध करती है होली प्रेम और सौहार्द का त्यौंहार है यह ना कोई छोटा और बड़ा होता है और ना किसी में किसी भी प्रकार की दुर्भावना व्याप्त होती है रंगों की फुहार की तरह सभी जाति वर्ग की महिलाएं एक दूसरे से दिल खोल कर आशीर्वाद देती और लेती है। हजारों की संख्या में एक ही स्थल प्रेम और सौहार्द के साथ मौजूद महिलाओं को देखकर ऐसा लगता है कि विधाता ने महिला सशक्तिकरण के इस दिन की दृश्य को स्वयं अपने हाथों से रचा हो जो परंपरा के रूप में आज भी समाज में बरकरार है
- जंगल एवं पिकनिक स्पॉट की ओर डर कर कूच कर जाते हैं पुरुष
ब्रज, बरसाना आदि में जहां कई दिनों तक होली खेले जाने की परंपरा है वही जनपद के माधोटांडा में दो दिन होली खेले जाने की परंपरा यहां पहले दिन पुरुष और दूसरे दिन महिलाएं होली खेलती है दूसरे दिन गांव के अधिकांश पुरुष महिलाओं की डर की वजह से जंगल की ओर कूच कर जाते हैं और यदि कोई पुरुष इनकी रंग खेलने की आजादी में दखलंदाज़ी करता है तो उसकी जमकर कर रंगों से धुलाई की जाती है। छुटकारा पाने के लिए फगुआ देना पड़ता है।
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