उत्तराखंड कांग्रेस में गहराया अंतर्कलह का संकट: पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जताया दुख, पार्टी के भीतर खुद को महसूस कर रहे हैं 'अकेला'।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हाल ही में एक विशेष संवाद के दौरान राज्य में पार्टी की वर्तमान स्थिति पर अपनी गहरी चिंता

Apr 10, 2026 - 11:47
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उत्तराखंड कांग्रेस में गहराया अंतर्कलह का संकट: पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जताया दुख, पार्टी के भीतर खुद को महसूस कर रहे हैं 'अकेला'।
उत्तराखंड कांग्रेस में गहराया अंतर्कलह का संकट: पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जताया दुख, पार्टी के भीतर खुद को महसूस कर रहे हैं 'अकेला'।
  • संजय नेगी प्रकरण ने बढ़ाईं हरीश रावत की मुश्किलें: शीर्ष नेतृत्व के सामने गुहार के बावजूद नहीं मिली तवज्जो, अपनों की अनदेखी से आहत हुए दिग्गज नेता।
  • मिशन 2027 से पहले दरक रही है कांग्रेस की दीवार: गुटबाजी और भीतरघात की चुनौतियों के बीच हरीश रावत का बड़ा बयान, संगठन की कार्यशैली पर खड़े किए सवाल।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हाल ही में एक विशेष संवाद के दौरान राज्य में पार्टी की वर्तमान स्थिति पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि संगठन के भीतर एक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित हो रही है जो वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों और उनके सुझावों को नजरअंदाज कर रही है। रावत ने विशेष रूप से रामनगर के स्थानीय नेता संजय नेगी का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने नेगी को पार्टी की मुख्यधारा में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, लेकिन उनके तमाम प्रयासों को दरकिनार कर दिया गया। यह घटना न केवल एक व्यक्ति को शामिल करने तक सीमित है, बल्कि यह पार्टी के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन और गुटबाजी की एक गहरी झलक पेश करती है, जो चुनाव से पहले संगठन की एकता के दावों की पोल खोलती है।

अंदरूनी खींचतान और समितियों के गठन को लेकर रावत ने स्पष्ट किया कि उनकी व्यक्तिगत रुचि किसी पद या समिति में बने रहने की नहीं थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक मार्गदर्शक के रूप में वे केवल यह चाहते थे कि उनके उन समर्थकों और कार्यकर्ताओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले जिन्होंने जमीन पर पार्टी के लिए पसीना बहाया है। जब समितियों की घोषणा हुई और उनमें उनके करीबियों के नाम गायब मिले, तो यह उनके लिए एक बड़े झटके जैसा था। हालांकि उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि आने वाले समय में नेतृत्व अपनी भूल सुधार करेगा और संतुलन बनाने के लिए कुछ और लोगों को शामिल किया जाएगा, लेकिन वर्तमान स्थिति उनके मन में एक टीस पैदा कर रही है जो सार्वजनिक रूप से उनके बयानों के माध्यम से बाहर आ रही है।

चुनावों पर इस कलह के प्रभाव को लेकर पूछे गए सवालों पर रावत ने एक अनुभवी राजनीतिज्ञ की तरह जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस एक लोकतांत्रिक दल है और यहां वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है। उन्होंने स्वीकार किया कि कभी-कभार विवाद उत्पन्न हो जाते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि पार्टी चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं है। हालांकि, उनके स्वर में छिपी हताशा यह बताने के लिए काफी है कि यदि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल इसी तरह गिरता रहा, तो विपक्षी दलों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना चुनौतीपूर्ण होगा। उन्होंने पार्टी के भीतर बोलने की आजादी को एक सकारात्मक गुण बताया, लेकिन साथ ही यह भी माना कि अनुशासनहीनता और समन्वय की कमी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। उत्तराखंड में कांग्रेस के भीतर हमेशा से दो या तीन गुट सक्रिय रहे हैं, लेकिन हरीश रावत जैसे बड़े कद के नेता द्वारा अपनी ही पार्टी के पदाधिकारियों और प्रभारियों के खिलाफ नाराजगी व्यक्त करना यह दर्शाता है कि विवाद अब नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। विशेष रूप से कुमारी शैलजा जैसे केंद्रीय नेताओं तक बात पहुंचने के बाद भी समाधान न होना गंभीर संकेत है।

संजय नेगी के मामले में रावत की पीड़ा और भी व्यक्तिगत हो जाती है क्योंकि उन्होंने इस मुद्दे पर प्रदेश के सभी वरिष्ठ पदाधिकारियों और यहां तक कि केंद्रीय प्रभारी कुमारी शैलजा से भी व्यक्तिगत मुलाकात की थी। रावत का तर्क है कि संजय नेगी जैसे समर्पित नेताओं को बाहर रखने से पार्टी की ही ताकत कम होगी, लेकिन उनके इस आग्रह को संगठन के भीतर मौजूद उनके विरोधी खेमे ने पूरी तरह से विफल कर दिया। यह स्थिति दर्शाती है कि प्रदेश कांग्रेस में अब निर्णयों का आधार मेरिट या वरिष्ठों का सुझाव न होकर गुटीय समीकरण बन गए हैं। रावत ने साफ तौर पर कहा कि इस अनदेखी से उन्हें गहरा दुख पहुंचा है और वे इसे पार्टी के हित में नहीं मानते।

मीडिया में चल रही उन खबरों पर भी रावत ने विराम लगाने की कोशिश की जिनमें उनके करीबियों द्वारा पार्टी छोड़ने या बगावत करने की बातें कही जा रही थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके समर्थकों की भावनाओं को गलत तरीके से पेश किया गया है। उनके करीबियों ने केवल जनसमर्थन जुटाने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की बात कही थी, जिसे विद्रोह का नाम दे दिया गया। रावत ने अपने समर्थकों का बचाव करते हुए कहा कि लंबे समय तक साथ काम करने के कारण कार्यकर्ता भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं और जब उनके नेता की अनदेखी होती है, तो उनकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक होती है। इसे पार्टी छोड़ने की धमकी के बजाय एक परिवार के भीतर की नाराजगी के रूप में देखा जाना चाहिए।

राज्य की आगामी राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए रावत का यह रुख कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बन सकता है। एक तरफ भाजपा अपना किला मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय चेहरों में से एक खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है। रावत ने यह भी कहा कि वे पार्टी को जिताने के लिए प्रतिबद्ध हैं और एकजुटता की वकालत करते रहेंगे, लेकिन उनके बयानों से यह स्पष्ट है कि वे अब 'सॉफ्ट स्टैंड' लेने के मूड में नहीं हैं। वे चाहते हैं कि उनके राजनीतिक कद का सम्मान किया जाए और संगठन के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी राय को वजन दिया जाए, न कि उन्हें केवल चुनावी प्रचार का चेहरा बनाकर छोड़ दिया जाए।

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